अब्दुल कलाम की जीवनी (Missile Man) Abdul Kalam Biography in Hindi

-: अब्दुल कलाम बचपन :-

अबुल पाकिर जैनुलआब्दीन  अब्दुल कलाम जिन्हें हम प्यार से एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से भी जानते हैं का जन्म 15 अक्टूबर 1931 में , रामेश्वरम  में  हुआ | रामेश्वरम  एक द्वीप है जो अब्दुल कलाम के जन्म के समय तत्कालीन मद्रास राज्य के अंतर्गत आता था, आज  इस राज्य का नाम तमिलनाडु है | एपीजे अब्दुल कलाम के पिता का नाम जैनुलआब्दीन था , वे   एक  नाविक थे जो तीर्थ यात्रियों को मंदिर तक पहुंचाने का कार्य करते थे| कलाम साहब की  मां का नाम आशिमा था| अब्दुल कलाम बचपन से ही हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक थे|

जैसा कि हम जानते हैं कि उनका जन्म रामेश्वरम में हुआ, जो कि हिंदुओं का बहुत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है|  यहां का मशहूर शिव मंदिर  नन्हे अब्दुल कलाम के घर से केवल 10 मिनट की दूरी पर था|अब्दुल कलाम अपनी आत्मकथा में इस बात का वर्णन करते हैं कि उनके बचपन की सबसे महत्वपूर्ण यादों में से एक याद यह भी है कि रामेश्वरम  मंदिर के महंत लक्ष्मण शास्त्री उनके पिता के सबसे करीबी दोस्तों में से एक थे कलाम  आगे यह भी बताते हैं कि दोनों व्यक्ति शाम को बैठते और अपने अपने धर्म की बात करते हैं बिना किसी द्वेष के साथ, बिना किसी लड़ाई के साथ|

कलाम के जीवन के शुरुआती सालों में उन्होंने अपने पिता को तो 3 साल लगातार मेहनत करके एक नाव बनाते हुए देखा ,फिर 1 दिन रामेश्वरम के तट में एक  भयंकर साइक्लोन आया जिसने उनकी नाव को पूरी तरह नष्ट कर दिया । कलाम के शुरुआती जीवन की   यह पहली असफलता थी परंतु कलाम के पिता ने अगले ही दिन  पुरानी नाव के  नष्ट हो जाने का दुख किए बिना नई  नाव बनाने का प्रयास आरंभ कर दिया जिसने कलाम को यह सिखाया की असफलताओं से निराश ना हो कर सफलता के रास्ते में आगे बढ़ें, सफलता लगातार प्रयास करते रहने से ही मिलेगी|अब्दुल कलाम ने अपनी पहली कमाई इमली के बीजों को बेचकर की थी, वह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि पता नहीं किस कारण दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इमली के बीजों की मांग बहुत ज्यादा बढ गई थी इसलिए वह दिनभर इमली के बीज इकट्ठे करते और इन्हें बेचने जाते थे उनकी पहली कमाई 1 आना  थी|

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बचपन में अब्दुल कलाम के तीन परम मित्र थे पहले तो रामानंद शास्त्री, जो रामेश्वरम मंदिर के महंत पक्षी लक्ष्मण शास्त्री के पुत्र थे, दूसरे  अरविंदन और तीसरे शिव प्रकाशन| आपने ध्यान दिया अब्दुल कलाम के तीनों मित्र ब्राह्मण परिवार से आते थे| आज के माहौल में जहां टीवी से लेकर  समाचार पत्र तक , हिंदू मुसलमान में विद्वेष फैलाने में  दिन रात लगे हुए हैं वहीं इन चार मासूम बच्चों को देखकर एहसास होता है कि  कि  तब का भारत कितना सहिष्णु भारत था |

हमने तब के भारत में धार्मिक सहिष्णुता की बात तो कर ली है परंतु तब के भारत में भी आज के जैसे भारत वाले लोग मौजूद थे हम इसको अब्दुल कलाम की जीवन की  अगली महत्वपूर्ण घटना से समझते हैं| जैसा कि हम बता ही चुके हैं कि रामानंद शास्त्री अब्दुल कलाम के परम मित्र थे क्योंकि दोनों ही पढ़ाई में बहुत ही अच्छे थे तब के शिक्षकों ने इन्हें आगे बिठाया था., तभी रामेश्वर के स्कूल में एक नए शिक्षक आएं उन्हें यह बात बिल्कुल सहन नहीं हुई कि एक मुस्लिम बालक एक हिंदू ब्राह्मण के साथ सामने बैठा है उन्होंने अब्दुल कलाम को उठकर पीछे जाने का आदेश दिया| अब्दुल कलाम को इस बात से कोई बुरा नहीं लगा और वे  चुपचाप उठकर पीछे चले गए परंतु उनके मित्र रामानंद शास्त्री यह देख कर रोने लगे,और रोते-रोते अपने घर चले गए|

अब्दुल कलाम तो अब्दुल कलाम थे उन्होंने घर जाकर भी इसकी शिकायत नहीं की परंतु रामानंद शास्त्री ने अपने पिता जो कि रामेश्वरम मंदिर के महंत थे को यह सब बताया, तब लक्ष्मण शास्त्री ने तुरंत स्कूल के इस नए शिक्षक को बुलावा भेजा और उन्हें बच्चों के दिल में धार्मिक विद्वेष फैलाने के लिए अच्छी डांट लगाई|  लक्ष्मण शास्त्री यहीं नहीं रुके उन्होंने इस नए शिक्षक को दो  विकल्प दिए पहला विकल्प या तो वे बालक अब्दुल कलाम से माफी मांगे या तो वे सुबह ही रामेश्वरम छोड़कर चले जाए| शिक्षक ने अब्दुल कलाम से अपनी गलती के लिए माफी मांगी और अब्दुल कलाम को वापस अपनी कक्षा में सामने की जगह मिल गई| आज के  इस माहौल में जहां चारों ओर धर्म के नाम  पर विद्वेष फैलाया जा रहा है ऐसा लगता है कि काश  लक्ष्मण शास्त्री यहां होते जो लोगों  को डांट कर धर्म के नाम पर जहर   फैलाने से रोकते|

-: युवा अब्दुल कलाम :-

अब्दुल कलाम ने सेंट जोसेफ कॉलेज से बीएससी की डिग्री प्राप्त की, अब तक अब्दुल कलाम को इस बात का एहसास हो चुका था कि फिजिक्स में उनका मन नहीं लगता ,वे इंजीनियरिंग फील्ड में जाना चाहते हैं|  उस समय दक्षिण भारत में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी( एमआईटी)  इंजीनियरिंग का सबसे प्रसिद्ध कॉलेज था यहां पर दाखिला पाना अत्यंत कठिन था| अब्दुल कलाम ने मद्रास इंस्टिट्यूट टेक्नोलॉजी में  दाखिले के लिए आवेदन कर दिया और एंट्रेंस एग्जाम में अच्छे  नंबर  लाकर वे यहाँ  एडमिशन पाने लायक भी  बन गए, परंतु  मुश्किलें तो कलाम के जीवन का एक हिस्सा थी तो यहां भी एक नई  मुश्किल को आना ही था| अब्दुल कलाम को पता चला कि इस कॉलेज की फीस लगभग ₹1000 है जो कि उस समय के भारत में बहुत बड़ी रकम थी, अब्दुल कलाम के पिता ने बहुत कोशिश की पर इस रकम को इकट्ठा नहीं कर पाए इस समय उनकी बहन  जोहरा  सामने आई और उन्होंने अपने गहने गिरवी रख कर कलाम के लिए ₹1000 का बंदोबस्त किया,  जब अब्दुल कलाम को अपने जीवन में पहली तनखा मिली तो उन्होंने सबसे पहले अपनी बहन के गिरवी गहनों को छुड़ाया| एमआईटी जॉइन करने के कुछ ही दिनों के भीतर अब्दुल कलाम को स्कॉलरशिप मिल गई|  एमआईटी के कैंपस के अंदर दो पुराने  एयरक्राफ्ट रखे थे,जिनका उपयोग छात्रों को  इनकी  कार्यप्रणाली को समझाने के लिए किया जाता था| अब्दुल कलाम हमेशा इन विमानों के प्रति आकर्षित  रहे| इसीलिए इंजीनियरिंग के पहले वर्ष के पश्चात जब अब्दुल कलाम को अपनी ब्रांच का चयन करना था तो उन्होंने एयरनोटिकल इंजीनियरिंग को चुना|

-: कलाम का पहला प्रोजेक्ट :-

अब्दुल कलाम के  कोर्स खत्म होने के पश्चात प्रोजेक्ट वाले वर्ष में, उन्हें एवं उनके तीन मित्रों को एक अटैक एयरक्राफ्ट डिजाइन करने का प्रोजेक्ट दिया गया, और इसमें उनके डिजाइन टीचर थे प्रोफेसर श्रीनिवासन जो कि उस वक्त एमआईटी के डायरेक्टर भी थे| इन चारों ने जब अटैक  एयरक्राफ्ट के सभी पहलुओं को डिजाइन करके डॉक्टर श्रीनिवासन के समक्ष प्रस्तुत किया, श्रीनिवासन इससे संतुष्ट नहीं थे उन्होंने कहा कि आप लोगों का परफॉर्मेंस इस प्रोजेक्ट में अच्छा नहीं है, अब्दुल कलाम एवं उनके साथियों ने इसके कई कारण बताने का प्रयास किया परंतु डॉक्टर श्रीनिवासन ने  उनकी एक बात न सुनी|

तब अब्दुल कलाम ने डॉक्टर  श्रीनिवासन से 1 हफ्ते का समय मांगा जिसमें  वह इस एयरक्राफ्ट की सारी गलतियों को सुधार लेंगे, डॉक्टर श्रीनिवासन ने गुस्से के साथ कहा कि मैं तुम्हें एक हफ्ते का समय नहीं  दे सकता तुम्हारे पास केवल 3 दिन है अगर इन 3 दिनों में तुम सारी गलतियां नहीं सुधारते हो तो मैं तुम्हारी स्कॉलरशिप बंद कर दूंगा| अब्दुल कलाम अपने कमरे में पहुंचकर अपने प्रोजेक्ट को सुधारने में  लग गए, उन्होंने खाना भी नहीं खाया और रात भर इस पर कार्य करते रहे इसी समय उन्हें यह दिखाई दिया कि कॉलेज की मेस  से एक व्यक्ति लगातार उन पर नजर रखे हुआ है, यह कोई और नहीं  डॉक्टर श्रीनिवासन थे, कुछ देर पश्चात श्रीनिवासन अब्दुल कलाम के कमरे में आए और उनके द्वारा किए गए कार्य की प्रगति देखी, इसे देखकर बहुत ही खुश हुए उन्होंने अब्दुल कलाम से कहा कि वैसे तो तुम्हारा मॉडल पहले भी काफी अच्छा था परंतु मैं जानता था कि तुम इससे कहीं बेहतर कर सकते हो, और मैं तुम्हें इमरजेंसी में कैसे कार्य करते हैं यह सिखाना चाहता था इसीलिए मैंने तुम्हें एक हफ्ते की जगह  3 दिन का समय दिया और  स्कॉलरशिप का  डर दिखाया |

एमआईटी के शिक्षक अब्दुल कलाम को कितना पसंद करते थे इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब साल के अंतिम दिन उस वर्ष विदा होने वाले बैच  के शिक्षकों के साथ फोटो खिंचाई  जानी थी  तो अब्दुल कलाम छात्रों के साथ में न  बैठकर शिक्षकों के साथ बैठे थे क्योंकि शिक्षकों ने उन्हें अपने साथ बैठने के लिए आदेश दिया था|

-: पहली नौकरी :-

जैसा कि अब तक हम जान ही चुके हैं कि एपीजे अब्दुल कलाम अत्यंत ही प्रतिभाशाली छात्र थे| वह चाहते तो कोई भी नौकरी तुरंत कर सकते थे परंतु वे सही मौके का इंतजार कर रहे थे ऐसे में उनके सामने दो  मौके आए पहला था एयरफोर्स में नौकरी का मौका, और दूसरा था डायरेक्टर ऑफ टेक्निकल डिपार्टमेंट एंड प्रोडक्शन जो कि उस समय रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आता था में नौकरी का मौका| डॉ कलाम ने दोनों ही जगह आवेदन दिया एवं दोनों ही जगह इंटरव्यू दिया| हम इस बात का अंदाजा ऊपर लिखी बातों से लगा सकते हैं कि डॉक्टर कलाम एयर फोर्स में जाना चाहते थे और हम जैसा कि पहले ही जानते हैं कि डॉक्टर कलाम  की जिंदगी हमेशा मुश्किलों से भरी हुई थी|  उनके पास  दो  खत पहुंचे पहला ख़त डायरेक्टर ऑफ टेक्निकल डिपार्टमेंट एंड प्रोडक्शन के यहाँ से जो यह कह रहा था कि उन्हें वहां नौकरी मिल गई थी, वही दूसरा खत एयरफ़ोर्स से था जो यह कह रहा था कि वह एयरफ़ोर्स  के लिए उपयुक्त नहीं है| डॉक्टर कलाम को पहली जगह नौकरी लगने की इतनी खुशी नहीं थी जितना उन्हें एयर फोर्स में मौका न मिलने का दुख था| एयर फोर्स में 25 के बैच में से 8 लोगों को चुना था एवं डॉक्टर कलाम का नंबर 9वां था | डॉ कलाम अपने रिजेक्शन से अत्यंत ही दुखी थे वह कुछ सवालों की तलाश में जैसे तैसे ऋषिकेश पहुंच गए वहां गंगा स्नान करने के पश्चात उन्होंने शिवानंद आश्रम की तरफ रूख किया|

डॉक्टर कलाम जब आश्रम में बैठे हुए थे तो स्वामी शिवानंद ने उन्हें अपने पास बुलाया और पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है, डॉक्टर कलाम अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि जब उन्होंने स्वामी शिवानंद को अपना नाम बताया तो मुस्लिम नाम होने के बाद भी शिवानंद पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा उन्होंने  डॉ कलाम  से पूछा कि तुम्हारे दुख का कारण क्या है, डॉक्टर कलाम इस बात से अचंभित थे क्योंकि उन्होंने अभी तक तो ऐसा  कुछ कहा ही नहीं था जिससे यह पता चले कि उन्हें किसी प्रकार का दुख था, परंतु स्वामी जी उनसे उनके दुख का कारण पूछ रहे थे| जब कलाम ने उनको अपनी सारी कहानी बतायी तो स्वामी जी ने कहा कि  तुम्हारी आत्मा शुद्ध है  तुम जब कभी सच्चे मन  से किसी चीज की कामना करोगे तो वह तुम्हें अवश्य ही मिलेगी| अगर  तुम्हें अपना भविष्य उड़ने वाली चीजों में दिखाई देता है तो एक न एक दिन तुम्हारा भविष्य तुम्हें वही लेकर जाएगा| स्वामी जी की बात कितनी सही थी आगे चलकर यही अब्दुल कलाम भारत के लिए तरह-तरह की मिसाइलें बनाने वाला था| इन सब बातों से खुश होकर अब्दुल कलाम ने वापस लौटकर  डीटीडी एंड पी की नौकरी ज्वाइन कर ली जहां उन्हें अपनी पहली तनख्वाह  ₹250  रुपए प्राप्त हुई|

 -: कलाम के शुरुआती प्रोजेक्ट :-

हवरक्राफ्ट :- कलाम का नौकरी में सबसे पहला प्रोजेक्ट हावर क्राफ्ट बनाने का था| हावरक्राफ्ट  एक ऐसा  विमान होता है जो हवा में तो नहीं उड़ता परंतु जमीन पर भी नहीं रहता अर्थात जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर चलता है| उनको इस प्रोजेक्ट के लिए तब के रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मैनन से काफी तारीफ मिली|

हर बार की तरह अब्दुल कलाम ने अपने इस प्रोजेक्ट को काफी कम  समय में पूरा कर लिया परंतु सरकार की तरफ से इस ओर कुछ ध्यान नहीं दिया गया|  इन्हीं सब के चलते कलाम काफी मायूस हो गए परंतु एक दिन उनके हावर क्राफ्ट को देखने एक मेहमान आया, इस पर सवारी करने के पश्चात उन्होंने कलाम से कई सवाल किए इस मेहमान का नाम था प्रोफेसर एम जी के मेनन, एमजीके मेनन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के डायरेक्टर थे| उनके जाने के एक हफ्ते के पश्चात डॉ अब्दुल कलाम को एक पत्र मिला जिसमें इंडियन कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च {INCOSPAR}  से रॉकेट इंजीनियर  के पद के लिए इंटरव्यू का बुलावा आया| उनका इंटरव्यू लेने वाले तीन व्यक्ति थे प्रोफेसर एम जी के मेनन ,  डॉक्टर सर्राफ जोकि एटॉमिक एनर्जी कमिशन के डिप्टी सेक्रेटरी थे एवं तीसरे व्यक्ति थे डॉक्टर विक्रम साराभाई|  विक्रम साराभाई अब्दुल कलाम के जीवन के शुरुआती दिनों में उनके टीचर की जगह लेने वाले थे, डॉक्टर कलाम उन्हें और डॉक्टर सतीश धवन को अपनी  काफी सारी सफलताओं का श्रेय देते हैं| वैसे तो इंटरव्यू के पश्चात उन्हें एक हफ्ते रुकने के लिए कहा गया परंतु अगले ही दिन उन्हें उनका अपॉइंटमेंट लेटर मिल गया|  अब्दुल कलाम जिसे  एयरफ़ोर्स  में नहीं लिया गया था आज फिर से आसमान की दुनिया में लौट चुके थे एक रॉकेट इंजीनियर  के तौर पर| डॉ कलाम को कुछ समय के बाद INCOSPAR  की ओर से नासा में काम करने के लिए लेंगली  रिसर्च सेंटर  जोकि हेमटन  वर्जिनियां में स्थित था भेजा गया |यहां उन्होंने 6 महीने तक काम किया|

पीएसएलवी एवं  एसएलवी -3 :-कलम नेपीएसएलवी एवं   एसएलवी -3 के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की  आप में से कुछ लोग शायद पीएसएलवी को नाम से ना जानते हो पर इसके काम से जरूर जानते होंगे, पी एस एल वी  का पूरा नाम पेलोड  सेटेलाइट लॉन्चिंग व्हीकल है यह एक तरह का लॉन्चिंग व्हीकल है जो विभिन्न तरह के सेटेलाइट को उनकी कक्षा में स्थापित करने के लिए जाना जाता है|  वैसे तो पीएसएलवी के द्वारा अंतरिक्ष में पहुंचाए गए सैटेलाइट की संख्या बहुत ज्यादा है परंतु इसके दो सबसे प्रमुख कार्य तो आप जानते ही होंगे पहला है चंद्रयान  एवं दूसरा है मंगलयान| वहीं एसएलवी-3  का वर्तमान वर्जन है जीएसएलवी अर्थात जिओ सैटेलाइट लॉन्चिंग व्हीकल|

स्माइलिंग बुद्धा :- स्माइलिंग बुद्धा उस प्रोजेक्ट का कोड नेम था जिसके अंतर्गत भारत ने राजस्थान के पोखरण में अपना पहला परमाणु विस्फोट किया था| स्माइलिंग बुद्धा के कर्ता-धर्ता डॉ राजा रमन्ना ने कलाम को इसके लिए आमंत्रित किया था| यही एपीजे अब्दुल कलाम लगभग 23 वर्ष पश्चात भारत के दूसरे परमाणु  परीक्षण के दौरान भी उपस्थित रहने वाले थे|

प्रोजेक्ट  डेविल :- प्रोजेक्ट डेविल का उद्देश्य जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल बनाना था जोकि लिक्विड  ईंधन से चलती हो| वैसे तो यह प्रोजेक्ट असफल रहा परंतु इसी प्रोजेक्ट के    दौरान प्राप्त हुए ज्ञान का उपयोग डॉ अब्दुल कलाम ने पृथ्वी मिसाइल के विकास के लिए किया|

प्रोजेक्ट वैलीअंट :- यह प्रोजेक्ट भी प्रोजेक्ट डेविल की तरह एक अन्य प्रोजेक्ट था जो 1974 में बंद कर दिया गया परंतु इस के दौरान प्राप्त हुए ज्ञान का उपयोग डॉक्टर कलाम एवं अन्य वैज्ञानिकों ने पृथ्वी एवं   अग्नि  जैसी मिसाइल बनाने में किया| यह बात ध्यान रखने योग्य है कि अग्नि एक इंटर कॉन्टिनेंटल मिसाइल है|

मिसाइल मैन का जन्म -: जैसा कि आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं कि डॉक्टर कलाम के द्वारा डायरेक्ट किए जाने वाले दो  प्रोजेक्ट बीच में ही बंद कर दिए गए थे इसी कारण उस समय की केबिनेट ने डॉक्टर कलाम के अंतर्गत आने वाले अन्य प्रोजेक्ट को पैसा देने से मना कर दिया परंतु इंदिरा गांधी का डॉक्टर कलाम पर विश्वास कम नहीं हुआ था इसीलिए उन्होंने,  डॉ कलाम  और उनके प्रोजेक्ट के लिए सीक्रेट फंड की व्यवस्था की| इस बार डॉक्टर कलाम ने  एक अलग तरह की नीति अपनाई इससे पहले डॉक्टर कलाम एक-एक कर मिसाइल बनाना चाहते थे वही इस बार उन्होंने एक साथ कई सारी अलग-अलग तरह की मिसाइल बनाने की योजना को अमल में लाने का निर्णय लिया| मिसाइल मैन डॉ कलाम की इसी योजना के अंतर्गत भारत को पृथ्वी जैसी मिसाइल मिली जोकि मध्यम दूरी की मिसाइल है वहीं इसी योजना के अंतर्गत अग्नि मिसाइल बनी जो कि  एक इंटरकॉन्टिनेंटल  मिसाइल है. अब इस बात का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि आज भी इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइल रखने वाले देशों की गिनती आप अपनी उंगलियों में कर सकते हैं|

भारत का Missile Man अपने वातावरण से जुड़ा हुआ था इसी बात से पता चलता है कि एक बार डीआरडीओ में उनके कार्यकाल के दौरान  जब कैंपस की सुरक्षा के लिए किसी ने इस बात की सलाह दी कि दीवारों के ऊपरी हिस्से में कांच लगा दिया जाए जैसे कि अन्य सुरक्षा वाली इमारतों में लगाए जाते हैं तो डॉक्टर कलाम ने इसके लिए सख्त तौर पर मना कर दिया उन्होंने कहा कि ऐसा करने से पक्षियों के पैर में चोट लग सकती है और  वह इस के सख्त खिलाफ हैं| जब किसी जर्नलिस्ट्स को यह पता चला तो उन्होंने डॉक्टर कलाम से पूछा कि एक तरफ तो आप मिसाइल बनाते हैं जिससे हजारों लोग मारे जाएंगे वहीं दूसरी तरफ आप पक्षियों के पैरों की चिंता करते हैं तो डॉक्टर कलाम ने कहा कि मिसाइल हमारे सुरक्षा के लिए हैं यह ठीक वैसे ही हैं कि अगर आपके  दुश्मन को अगर इस बात का ज्ञान है कि आपके पास भी अस्त्र मौजूद हैं जिनके द्वारा आप उसका नाश कर सकते हैं तो वह आपके तरफ पहले कदम उठाएगा ही नहीं और अगर उठाएगा तो उससे सुरक्षा के लिए यह मिसाइल है परंतु अपनी तरफ से ऐसा कोई कार्य करना जो भगवान के द्वारा बनाए गए किसी भी जीव को नुकसान पहुंचाता है सही नहीं है|

पोखरण 2 :- डॉ एपीजे अब्दुल कलाम 1993 से लेकर 1999 तक के प्रधानमंत्रियों के लिए  चीफ  साइंटिफिक एडवाइजर के रोल में थे इसी दौरान उन्होंने भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण के लिए पूरी  तैयारी पर ध्यान दिया एवं डॉक्टर चिदंबरम के साथ  मिलकर 1998 में  भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण को अंजाम दिया|

-; राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम :-

के आर नारायणन के राष्ट्रपति काल के  खत्म होने के पश्चात एपीजे अब्दुल कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति बने| राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए उनके सामने कैप्टन लक्ष्मी सहगल थी जिन्हें हराकर उन्होंने 25 जुलाई 2002 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली उनका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 तक चलने वाला था|

राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को तब की जनता ने पीपल्स प्रेसिडेंट का  तमगा दिया| ऐसा उनके कार्यों से पता चलता है कि राष्ट्रपति रहते हुए भी एपीजे अब्दुल कलाम हमेशा जमीन से जुड़े रहे| उन्हें पीपल्स प्रेसिडेंट कहने के वैसे तो कई कारण थे पर इस विषय में कई किस्से मशहूर है उनमें से कुछ इस तरह से हैं|

एक बार जब रामेश्वरम से एपीजे अब्दुल कलाम का परिवार कुछ दिनों के लिए राष्ट्रपति भवन में रहने आया तो डॉक्टर कलाम ने उनके रहने का खर्च खुद वहन किया जबकि  उन्हें इस बात का पूरा अधिकार था कि वह अपने परिवार को वहां रख सकते थे बिना कोई पैसा लिए परंतु डॉक्टर कलाम ने इसे सही नहीं समझा और उनके रहने का पूरा खर्च खुद ही ग्रहण किया|

एक बार राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जब त्रिवेंद्रम गए तो वहां पर उन्हें राजभवन में ठहराया गया और प्रोटोकॉल के अनुसार राजभवन के मेहमान को अपने साथ दो और लोगों को ले जाने का अधिकार था ऐसे में उन्होंने त्रिवेंद्रम में जूते साफ करने वाले एक व्यक्ति को बुलाया और एक छोटे से चाय नाश्ते वाले होटल के मालिक को  बुलाया| डॉक्टर कलाम जब त्रिवेंद्रम मे एक  साइंटिस्ट के रूप में काम कर रहे थे तब उनकी इन दोनों से काफी अच्छी दोस्ती थी डॉक्टर कलाम राष्ट्रपति बनने के बावजूद भूले नहीं और जब त्रिवेंद्रम राज भवन  गए तो  उन्हें अपने साथ राजभवन ले गए |

वैसे तो साफ सुथरी छवि वाले प्रेसिडेंट कलाम विवादों से काफी दूर रहते थे परंतु उनके राष्ट्रपति पद से हटने के बाद कुछ विवाद सामने आए जिनमें पता चला कि उनका कोई हाथ ही नहीं था| उनमें से एक था डॉ सुब्रमण्यम स्वामी के द्वारा यह कहना कि  सोनिया गांधी प्रधानमंत्री  बनना  चाहती थी परंतु डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जो उस समय राष्ट्रपति थे उन्हें यह कह कर मना कर दिया कि अगर वह प्रधानमंत्री बनने की कोशिश करेंगी तो वे उन्हें शपथ नहीं दिलाएंगे. इसी कारण सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को अपनी जगह शपथ दिलाई| जब डॉक्टर कलाम को डॉ सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा फैलाए जा रहे इस असत्य के बारे में पता चला तो उन्होंने  बकायदा इस बात को मीडिया से बांटा कि अगर सोनिया गांधी चाहती तो वे प्रधानमंत्री बन सकती थी और अगर मैं प्रधानमंत्री बनने के लिए  दावा करती तो डॉक्टर कलाम उन्हें खुशी खुशी शपथ दिलाते| अर्थात उनके राष्ट्रपति काल के दौरान कोई  विवाद नहीं रहा यह विवाद केवल कुछ लोगों के मन में था|

-: राष्ट्रपति पद के पश्चात कलाम :-

कलाम कभी थकने वाले नहीं थे ना ही कभी रुकने वाले थे राष्ट्रपति पद से  हटने के बाद भी उन्होंने काम करना  बंद नहीं किया आप इस बात का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि वे राष्ट्रपति पद से हटने के बाद इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट शिलांग के विजिटिंग प्रोफेसर थे, इसके साथ ही साथ भी इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट अहमदाबाद एवं सीनियर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट इंदौर के विजिटिंग प्रोफेसर भी थे |

भारत का यह सिपाही 27 जुलाई 2015 को  83 वर्ष की उम्र में इस देश  एवं दुनिया को छोड़ कर चला गया|

डॉ कलाम को मिले पुरस्कारों के बारे में हम अंत में बात करते हैं क्योंकि उन्होंने कभी इन्हें  महत्ता नहीं दी | डॉ कलाम को 1981 में पद्म भूषण से नवाजा गया| डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को 1990 में पद्म विभूषण मिला | डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को 1997 में भारत रत्न मिला| हम केवल इन्हीं तीन पुरस्कारों की बात कर रहे हैं क्योंकि यह भारत सरकार द्वारा दिए गए थे अगर हम उन्हें मिले सारे पुरस्कारों की बात करने लगे तो हम लिखते लिखते थक जाएंगे और आप पढ़ते पढ़ते| उम्मीद करते हैं कि उपरोक्त लेख  ज्ञान वर्धन का कार्य करेगा और अगर आपको इस लेख से कोई भी शिक्षा लेनी है तो भारत की एकता और अखंडता के प्रति हिंदू मुस्लिम भाईचारे के प्रति डॉ कलाम के समर्पण को समझने की कोशिश कीजिएगा|

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