Akbar History In Hindi – अकबर का इतिहास जन्म – मृत्यु और पत्नी के बारे में जानकारी।

Akbar history – अकबर महान (1542-1605) एक प्रसिद्ध मुग़ल (Mughal या Moghul) शासक था जिसे भारत में मुग़ल साम्राज्य की वास्तविक स्थापना का श्रेय दिया जाता है। मुग़ल सम्राट बाबर ने भले ही भारतीय उपमहाद्वीप में 1526 में मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी हो लेकिन वह अकबर महान ही था, जिसने मुग़ल साम्राज्य को एक राजनैतिक शक्ति के रूप में पहचान दिलाई। अपनी सैन्य, प्रशासनिक, राजनैतिक, धार्मिक और आर्थिक नीतियों की उच्च क्षमताओं के कारण Akbar (अकबर) मुग़ल सम्राटों में सर्वाधिक महान सम्राट के रूप जाना जाता है। Indian Sub continent ( भारतीय उपमहाद्वीप) में मुग़लों के एकछत्र राज्य को स्थापित करने में Akbar को कई क्षेत्रीय रजनीतिक शक्तियों से लड़ना पड़ा। किन्तु अकबर ने बारी-बारी सभी राजाओं को परास्त कर के मुग़ल साम्राज्य को 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत की सबसे बड़ी शक्ति बना दिया। 1556 की पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू को परास्त करने के बाद अकबर ने अगले 49 वर्षों तक भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया। अकबर सूफी संत Salim Chisti –(सलीम चिस्ती) का अनुयायी था।

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अकबर एक संक्षिप्त परिचय : AKBAR :- A BRIEF INTRODUCTION

मुग़ल बादशाह अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 के दिन उमरकोट, राजपूताना (वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत) में हुआ था। बादशाह अकबर जिन्हे अबू अल-फत, जलाल-उद-दीन और अकबर जैसे नामों से भी जाना जाता है, मुग़ल सम्राटों में सबसे प्रभावशाली बादशाह थे। अकबर का वास्तविक नाम Muhammed -मुहम्मद था। किन्तु अकबर नाम उनकी महानता के साथ जुड़ गया और इतिहास में उन्हे इसी नाम से अधिक जाना जाता है। बादशाह अकबर हिंदुस्तान में दूसरे मुग़ल बादशाह नासिर अल-दीन हुमायूं (Humayun) के पुत्र थे। अकबर की माता का नाम हमीदा बानो बेगम था। अकबर के जन्म के समय हुमायूँ शेर शाह सूरी के हाथों 1540 में पराजित होकर निर्वासन का जीवन व्यतीत कर रहा था। ऐसे में अकबर के रूप में एक पुत्र के जन्म ने हुमायूँ को काफी प्रसन्नता प्रदान की। Akbar भारत में मुग़ल शासन की नींव रखने वाले प्रथम मुग़ल शासक बाबर का पौत्र (नाती) था। अकबर Turk Mongol-तुर्क-मंगोल से संबंध रखने वाले तिमुर वंश का वंशज था। अकबर के साथ साथ सभी मुग़ल सम्राट और वंशज Sunni (सुन्नी) इस्लाम के मनाने वाले थे। हालांकि अपने शासन काल के बाद के दिनों में अकबर ने दीन-ए-इलाही (Din-i-Ilahi) नाम से एक नई धार्मिक नीति स्थापित करने की कोशिश अवश्य की, किन्तु वह सफल नहीं हो सकी। अकबर का बचपन काबुल में बीता था। 14 वर्ष की उम्र में अकबर का पहला विवाह हुमायूँ के वफादार भाई हिंदाल मिर्ज़ा की पुत्री रुकइया सुलतान बेगम के साथ Jalandhar (जालंधर) में हुआ था। इससे पहले हुमायूँ के भाई हिंदाल मिर्ज़ा की मृत्यु 1551 में हुमायूँ के लिए कमरान मिर्ज़ा की सेना से लड़ते हुए हुई थी।

Afghan (अफगान) शासक शेर शाह सूरी (Sher Shah Suri) से पराजित होने के बाद भी हुमायूँ ने भारत में मुग़ल शासन फिर से स्थापित करने का प्रयत्न नहीं छोड़ा। इसी क्रम में अंततः 1555 में हुमायूँ ने अपने विश्वास पात्र बैरम खान के साथ मिलकर दिल्ली और आगरा को दोबारा मुग़लों के लिए जीत लिया। इस जीत के साथ ही India में मुग़ल शासन की नयी शुरुआत हुई और हुमायूँ को फिर से भारत में Mughal साम्राज्य बनाने का मौका मिला।

बादशाह अकबर के शासन की शुरुआत

1555 में हुमायूँ ने दोबारा हिंदुस्तान में अपना शासन स्थापित तो कर लिया था किन्तु वह मुग़ल शासन को राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित नहीं कर पाया। दिल्ली पर अपनी दोबारा जीत के केवल 6 महीनों बाद ही हुमायूँ की 24 जनवरी 1556 में मृत्यु हो गयी। हुमायूँ दिल्ली में अपनी पुस्तकालय की सीढ़ीयों से उतरते समय गिर गया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी।

1556 में अपने पिता हुमायूँ की मृत्यु के समय अकबर की उम्र केवल 13 वर्ष की थी। हुमायूँ की मृत्यु के समय अकबर बैरम खान के साथ काबुल में अभियान पर था। ऐसे में अकबर के लिए पूरे मुग़ल साम्राज्य पर शासन करना कठिन था। उस समय हुमायूँ के विश्वासपात्र और अकबर के शिक्षक बैरम खान ने 1556 से लेकर 1560 तक अकबर के संरक्षक के रूप में कार्य किया। 14 फ़रवरी 1556 के दिन अकबर ने हुमायूँ के उत्तराधिकारी के रूप में मुग़ल शासक की पदवी ग्रहण की। मुग़ल शहंशाह बनने के समय अकबर (Akbar) की उम्र सिर्फ 14 वर्ष की थी। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि बादशाह बनने के समय अकबर के अधीन मुग़ल शासन में केवल Kabul (काबुल), कंदहार और दिल्ली तथा पंजाब के कुछ हिस्से ही थे। अगले 5 वर्षों तक अकबर के नाम पर Bairam Khan (बैरम खान) ने Mughal शासन के सभी Decisions किए और शासन-प्रशासन को अपने हाथ में रखा। इस समय में बैरम खान को मुग़ल साम्राज्य का “वकील” और वजीर नियुक्त किया गया था और उसने वकील के रूप में सभी फैसले लिए। इससे अकबर के संरक्षक के रूप में Bairam Khan (बैरम खान) को अभिजात वर्ग से सामना नहीं करना पड़ा। किन्तु बैरम खान के संरक्षण के काल में बैरम खान ने सत्ता का स्वयं उपयोग करना अधिक उचित समझा। इस कारण वश अभिजात वर्ग का जो भी व्यक्ति Bairam Khan का आलोचक था उसे उसने या तो जेल में दाल दिया या पद से हटा दिया। इतना ही नहीं वे कुलीन जो Bairam Khan (बैरम खान) के लिए दिक्कत उत्पन्न कर सकते थे उन्हे हिंदुस्तान से बाहर काबुल भेज दिया गया। इस प्रकार कुछ समय तक बैरम खान ने मुग़ल साम्राज्य के दरबार और अपने प्रतिद्वंदियों पर पूर्ण नियंत्रण रखा। किन्तु कुछ ही समय बाद वास्तविक शक्ति मुग़ल कुलीनों के हाथ में चली गयी। कुलीन या अभिजात वर्ग के लोगों ने Bairam Khan के प्रभुत्व और नियंत्रण को एक सीमित मात्रा में ही स्वीकार किया था। बैरम खान ने Akbar के संरक्षक के रूप में Akbar की तीक्ष्ण बुद्धि और चतुरता को पहचानने में भूल की। इस कारणवश उसने Akbar के दिल में अपनी जगह बनाने या Akbar के विश्वास को जीतने का कोई अधिक प्रयत्न नहीं किया।

बादशाह अकबर ने मार्च 1560 में बैरम खान के संरक्षण काल को समाप्त कर दिया और बैरम खान को उसके पद से हटा दिया। इस समय के बाद से सत्ता की वास्तविक शक्ति Akbar के नियंत्रण में आ गयी।

अकबर द्वारा पानीपत का दूसरा युद्ध (Second Battle of Panipat-5 November 1556)

हुमायूँ की मृत्यु के बाद अकबर के सामने सबसे बड़ी चुनौती Delhi (दिल्ली) पर पुनः कब्जा करना था क्योंकि हेमू ने दिल्ली समेत Gwalior (ग्वालियर) और सतलुज तक के क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमा लिया था। अपनी विजय के बाद Hemu (हेमू) ने विक्रमादित्य की उपाधि भी धरण कर ली थी। बैरम खान और खान जमाँ ने अकबर के साथ हेमू को पानीपत (हरयाणा )के मैदान में चुनौती दी और 5 नवम्बर 1556 के दिन बैरम खान के संरक्षण में अकबर की सेना और हेम चंद्र विक्रमादित्य की सेना ने युद्ध किया। इस युद्ध में Akbar के पास हेमू के मुक़ाबले काफी छोटी सेना थी। किन्तु युद्ध में अचानक से एक तीर हेमू कि आँख में जा लगा जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गयी। Hemu (हेमू) को न देखकर उसकी सेना में मायूसी छा गयी और मौके का फायदा उठाकर बैरम खान ने युद्ध में विजय हासिल कर ली। मृत Hemu के सर को काट कर अलग का दिया गया और मुग़लों ने Delhi (दिल्ली) समेत पूरे उत्तर भारत पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इस प्रकार अकबर के नेतृत्व में मुग़लों की पहली बड़ी ऐतिहासिक जीत Second Battle of Panipat (पानीपत के दूसरे युद्ध) में हुई।

अकबर के सैन्य अभियान और क्षेत्रीय प्रसार

1560 में मुग़ल साम्राज्य की शक्ति अपने हाथों में लेने के बाद और सत्ता पर अपने अधिकार को सुरक्षित करने के बाद, Akbar ने मुग़ल राज्य की सीमाओं को बढ़ाने के लिए Military Operations (सैन्य अभियानों) की शुरुआत की। Akbar ने अपने अपराजित सैन्य अभियानों के माध्यम से Indian sub continent (भारतीय उपमहाद्वीप) में मुगल शासन को एक राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया जो उसकी आने वाली कई पीढ़ियों तक कायम रहा। क्षेत्रीय प्रसार की इस नीति के लिए Akbar के सामने हिंदुस्तान में मौजूद उन सभी छोटी-बड़ी राजनीतिक शक्तियों से संघर्ष करने की चुनौती थी जो उसके आधिपत्य को स्वीकार नहीं करते थे। इनमें Rajpoot (राजपूत), अफ़गान, दक्खन और दक्षिण के खान देश, गोलकुंडा, अहमदनगर, बीजपुर, तथा कई सरदार, कबालई इलाके इत्यादि शामिल थे।

भारत के विस्तृत भूभाग में फैली राजनैतिक शक्तियों को जीतने के लिए Akbar ने व्यापक और सुनियोजित ढंग से नीति बनाई। अकबर ने अपनी सैन्य और प्रशासनिक क्षमताओं के कारण  एक-एक कर के उन सभी Regional Powers (क्षेत्रीय शक्तियों) को अपने वश में किया जो मुग़ल शासन के अंदर नहीं आती थीं।

  1. उत्तर और मध्य भारत

भारत में अपने सैन्य अभियानों की शुरुआत से Akbar ने यह मंशा जाता दी थी कि वह अपने पिता Humayun (हुमायूँ) और दादा बाबर के विपरीत, हिंदुस्तान की जमीन पर स्थायी तौर पर बसने की इच्छा रखता है। अकबर ने अपना प्रथम सैनिक अभियान 1559-1560 में ग्वालियर और जौनपुर के खिलाफ चलाया। ग्वालियर में अकबर को अधिक विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। थोड़े से प्रतिरोध के बाद ही ग्वालियर के Ram Shah (राम शाह) ने Gwalior राज्य को अकबर के अधीन कर दिया। इसी प्रकार अकबर ने जौनपुर को मुग़ल राज्य में मिलाने के लिए सेनानायक Khan Jaman (खान जमाँ) को नियुक्त किया। खान जमाँ ने अफ़गान शासकों के अंतर्गत जौनपुर की सेना को हराकर जौनपुर को भी मुग़ल शासन के अंतर्गत शामिल कर लिया। उत्तर भारत के शासकों को अपने अधीन करने के बाद अकबर ने मध्य भारत के मालवा के बाजबहादुर, तथा 1564 में गोण्डवाना की विधवा रानी दुर्गावती को भी हराकर इन राज्यों को मुग़ल शासन का हिस्सा बना दिया। इन छोटे शासकों के अलावा अकबर को इस क्षेत्र के कई छोटे सरदारों और विद्रोहों को भी कुचलना पड़ा। इसमें अब्दुल्लाह खान उजबेग सबसे महत्वपूर्ण था क्योंकि वो विद्रोही ताकतों का नेता था। यहाँ तक कि अकबर के सेनानायक खान जमाँ ने भी विद्रोह किया। किन्तु अकबर ने अपनी संगठनात्मक योग्यता और कूटनीतिक चतुराई से तथा Munim Khan (मुनीम खान) की सहायता से इन सभी विद्रोहों को दबा दिया।

  1. पश्चिम भारत में अकबर के अभियान

पश्चिम भारत में Rajput (राजपूत) ऐसी शक्ति थे जिनका सामना Akbar को निश्चित रूप से करना ही था। किन्तु Akbar इस बात से भली-भांति परिचित था कि मुग़लों के पश्चिम भारत में राजनीतिक रूप से शक्तिशाली बनने के लिए Rajput Issue (राजपूत समस्या) का स्थायी समाधान निकालना होगा। राजपूतों ने इससे पहले किसी भी मुस्लिम शासन की अधीनता स्वीकार नहीं की थी। अकबर ने Rajput शक्ति को खत्म करने के लिए दो तरीके अपनाए। पहला तो उसने राजपूतों को अपने Mughal Court (दरबार) में उच्च पद देकर उन्हे अपना सहयोगी बनाने का प्रयत्न किया। इनमें Mewar (मेवाड़) और रणथंभौर के शासकों को छोड़ कर बाकी सभी Rajput शासक आते थे। किन्तु मेवाड़ और रणथंभौर के शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। इस वजह से अकबर ने सबसे पहले 1568 में मेवाड़ के चित्तोड़गढ़ को और फिर रणथंभौर के किले को वहाँ कई महीनो तक अभियान चलाकर जीत लिया। इन जीतों के बाद Akbar पूरे Rajputana का एकछत्र शासक बन बैठा। अब मुग़लों की ताकत को चुनौती केवल Mewar (मेवाड़) के Maharana Pratap (राणा प्रताप) से रह गयी थी क्योंकि उन्होने Akbar की अधीनता स्वीकार नहीं की। किन्तु Mewar की राजनैतिक शक्ति का ह्रास हो चुका था। Akbar ने राजपूत समर्थन प्राप्त करने के लिए राजपूतों के साथ वैवाहिक संबंध भी बनाए।

18 जून 1576 में मेवाड़ के महाराणा प्रताप (सिसोदिया राजपूतों के प्रमुख) और मान सिंह के नेतृत्व में अकबर की सेना ने प्रसिद्ध हल्दीघाटी का युद्ध (Battle of Haldighati) लड़ा था। इस युद्ध में Man Singh (मान सिंह) ने महाराणा प्रताप की सेना को पराजित किया था। इस युद्ध के बाद Mewar (मेवाड़) के अधिकतर क्षेत्रों पर मुग़ल शासन का अधिकार हो गया था।

अकबर ने राजपूत शक्ति को अपने अधीन करने के बाद 1572 इसवीं के बाद गुजरात की ओर रुख किया। गुजरात में उस समय सुल्तान मुजफ्फर शाह तृतीय नाम मात्र का शासक था। अकबर ने आसानी से Ahamedabad (अहमदाबाद) को भी जीत लिया। हालांकि Akbar के जाने के कुछ दिन बाद ही वहाँ फिर विद्रोह हो गया। यह विद्रोह Muhammad Husain Mirza (मोहम्मद हुसैन मिर्ज़ा) और ईखत्यारूल मुल्क की अगुवाई में किया गया था। Akbar को इस विद्रोह की खबर जब मिली तब वह Agra (आगरा) तक लौट गया था। इस विद्रोह को दबाने के लिए Akbar स्वयं आगरा से केवल 10 दिन में गुजरात पहुंचा और विद्रोह को कुचल डाला। इसके बाद Gujarat (गुजरात) में मुग़ल शासन स्थापित हो गया।

  1. पूर्वी भारत में अकबर के सैन्य अभियान

पूर्वी भारत में Bihar (बिहार) और Bangal (बंगाल) जैसे क्षेत्रों में Sher Shah Suri (शेर शाह सूरी) के समय से ही अफ़गान शासकों का नियंत्रण था। किन्तु बिहार और बंगाल के गवर्नर( जो वहाँ का स्वतंत्र शासक भी था) Sulaiman (सुलेमान) कर्रानी ने स्वतः ही मुग़लों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। उसे मुग़लों की शक्ति का परिचय हो गया था। किन्तु उसकी मृत्यु के बाद 1572 में सुलेमान के छोटे पुत्र Daud (दाऊद) ने सिंहासन पर कब्जा कर लिया और मुग़लों की अधीनता मानने से इंकार कर दिया। अकबर ने बिहार और बंगाल को मुग़ल नियंत्रण में लाने के लिए 1574 इसवीं में Munim Khan (मुनीम खान) खान-ए-खाना के साथ कुछ किया और आसानी से पाटना और हाजीपुर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अपने कब्जे में लेकर वापस लौट गया। Akbar के आने से दाऊद दर कर भाग गया। पीछा किए जाने पर अंततः Daud को आत्मसमर्पण करना पड़ा। किन्तु दाऊद ने दोबारा मुग़लों से विद्रोह किया जिसके कारण Khan-i-Jahan (खान-ए-जहां) ने उसका वध कर दिया और उसके सर को काट कर अकबर के पास भेज दिया गया। मान सिंह के अधीन मुग़ल सेना ने 1592 में उड़ीसा के सरदारों को पराजित कर के उसे Mughal साम्राज्य में  मिला लिया।

  1. कश्मीर और सिंध की विजय

कश्मीर के राजा युसुफ खान को राजा भगवान दास और शाह कुली मरहम की अगुवाई में मुग़ल सेना ने हराकर एक संधि की थी। इस संधि के द्वारा युसुफ खान ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी किन्तु Kashmir (कश्मीर) अभी भी उसके अधीन था। युसुफ खान के पुत्र Yakub Khan (याक़ूब खान) ने मुग़लों के विरुद्ध सेना को संगठित कर के युद्ध किया। किन्तु  उसे हराकर 1586 में कश्मीर राज्य को भी मुग़ल साम्राज्य का हिस्सा बना लिया गया।

1590 से लेकर 1595 के काल में खान-ए-खाना की अगुवाई में मुग़ल सेना ने पूरे सिंध क्षेत्र (विशेषकर थट्टा जो अभी तक मुग़ल शासन के अधीन नहीं था) को जीतकर मुग़ल नियंत्रण में ला दिया।

अकबर की प्रशासनिक व्यवस्था

इतिहासकारों के अनुसार मुग़ल प्रशासनिक व्यवस्था अति केद्रीयकृत (Centralised Administration) थी। जागीरदारी और मनसबदारी दो ऐसी व्यवस्थाएँ थीं जिस पर मुख्य रूप से मुग़ल प्रशासन आधारित था। अकबर ने मुग़ल राज्य को संगठित और Powerful बनाने में कामयाबी हासिल कर ली थी जिसके कारण बाद के समय में उसने प्रशासनिक ढांचे पर अधिक ध्यान दिया। अकबर से पहले बाबर और Humayun अपने सीमित शासनकाल में मुग़ल राज्य को स्थापित करने के लिए युद्ध और अन्य सैन्य अभियानों में ही व्यस्त रहे। इस कारणवश उन दोनों के पास मुग़ल प्रशासन को व्यवस्थित और एक नयी दिशा देने का मौका नहीं मिला। किन्तु Akbar ने भारतीय उपमहाद्वीप में मुग़ल सत्ता को स्थापित करने के बाद एक ऐसे प्रशासनिक व्यवस्था का विकास किया जिसकी प्रकृति All India (अखिल भारतीय) थी। Akbar के समय प्रशासन में न केवल परंपरागत प्रशासनिक विशेषताओं, बल्कि कुछ नए सम्मिश्रण और बदलाव के जरिये, मुग़ल प्रशासन को समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप ढालने का प्रयत्न किया गया।

अकबर के शासनकाल में मुग़ल प्रशासन में सभी क्षेत्रों में विशेष प्रशासनिक विभागों की स्थापना की गयी। अधिकारियों को उनके ओहदे के अनुसार जागीरें बांटी गईं। अकबर ने अपने अधिकारियों को उनकी योग्यता और सेवाओं के आधार पर Mansab (मनसब) प्रदान किए। मनसबदारों की तीन श्रेणियाँ हुआ करती थीं। मनसबदारों को अपनी सेना का नियमित निरीक्षण करना पड़ता था। वहीं दूसरी तरफ Khalasa & Jagir (खालसा और जागीर) नाम से दो तरह की भूमि हुआ करती थी। खालसा का Revenue (राजस्व) सीधे मुग़ल खजाने में जाता था जबकि Jagir (जागीर) को मनसबदारों और जागीरदारों के Salary (वेतन) के रूप में सौप दिया गया था। उन्हे नगद वेतन के बदले जागीर से होने वाली आमदनी मिलती थी।

मुग़ल बादशाह: किन्तु सारा Mughal प्रशासन Mughal बादशाह की व्यक्तिगत राय और इच्छा पर निर्भर करता था। सभी अधिकारियों की नियुक्ति, पदोन्नति, अवनति, स्थानांतरण, बर्खास्तगी और कार्य का बंटवारा, केवल Mughal (मुग़ल) बादशाह के अधीन था। सभी शक्तियों का स्त्रोत Akbar ही था जिसके चलते मुग़ल दरबार से संबंध रखने वाले सभी दरबारी और सैन्य अधिकारियों को सत्ता संबंधी शक्तियों के लिए सम्राट पर ही निर्भर रहना पड़ता था। सामान्य जनता के लिए Mughal बादशाह के “झरोखा दर्शन” जैसी प्रथाओं ने मुग़ल सम्राट के व्यक्तिगत पक्ष को और मजबूती प्रदान करने में सहायता की। सामान्य जनता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की गयी की मुग़ल बादशाह Akbar (अकबर) के सिर्फ झरोखा दर्शन कर लेने से ही उनकी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।

वकील-वजीर: Akbar के समय में Vakil (वकील) (या जिसे कभी-कभी वजीर भी कहा जाता था) Mughal प्रशासन में बादशाह के बाद सबसे बड़ा अधिकारी होता था। हालांकि आरंभ में वकील के पास सैन्य के साथ-साथ Financial (वित्तीय) अधिकार भी होते थे, किन्तु Akbar ने उसकी शक्ति को नियंत्रण में रखने के लिए वकील से उसके सभी वित्तीय अधिकार छीन लिए। अपने वित्तीय अधिकार छीन लिए जाने के कारण Vakil (वकील) के पद की स्थिति में कुछ गिरावट आई किन्तु अभी भी यह पद प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई था।

दीवान-ए-कुल: यह मुग़ल दरबार में Finance Minister (वित्त मंत्री) का पद था जिसे Akbar ने दोबारा से शुरू किया था। वकील से उसके वित्तीय अधिकार वापस लेने के बाद उसे वित्त मंत्री को सौप दिये गए। इस दीवाने-कुल के नियंत्रण में ही मुग़ल शासन का खजाना हुआ करता था, जिसके निरीक्षण और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी दीवाने कुल पर हुआ करती थी। मुग़ल साम्राज्य के Revenue Administration (राजस्व प्रशासन) पर दीवाने-कुल का पूरा स्वामित्व था जिसकी मुहर के बिना राजस्व संबंधी कोई कार्य नहीं होता था।  दीवाने-कुल की सहायता के लिए सभी प्रान्तों में प्रांतीय Deewan (दीवानों )को नियुक्त किया गया था जो Deewane-i-Kul (दीवाने-कुल) के आदेश पर कार्य करते थे।

Mughal Administration (मुग़ल प्रशासन) में कुछ महत्वपूर्ण पदों और उनके कार्यों का विवरण यहाँ दिया गया है जो मुग़ल साम्राज्य के केंद्रीय, प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका में थे:

  • मीर बक्शी –Soldiers (सैनिकों) की उपस्थिती की जांच, मानसबदारों की नियुक्ति और Salary (वेतन), घोड़ों की निशानदेही इत्यादि
  • सद्र-उस सुदूर: धार्मिक विभाग का अध्यक्ष, शरीयत के कानून का क्रियान्वयन और संरक्षण, वजीफा और इनाम देने का अधिकार, काजियों और मुफ़्तीयों की नियुक्ति, न्यायिक विभाग का प्रमुख
  • खान-ए-सामां: राजकीय Factory (कारखाने) का अधिकारी, Imperial Fort (शाही महल) की जरूरतों की खरीद इत्यादि
  • मुहतसिब: आम जनता के बीच Ethics (नैतिकता) के नियमों का निरीक्षक
  • सूबेदार: यह प्रांतीय Governor (गवर्नर) हुआ करता था जिसका मुख्य कार्य अपने प्रांत की देख भाल करना होता था। इसकी नियुक्ति खुद अकबर किया करता था। Akbar के समय में कुल मिलाकर 15 Subah (सूबे) थे जिनमें सूबेदार की नियुक्ति हुआ करती थी।
  • दीवान: यह मुग़ल प्रान्तों में Revenue Department (राजस्व विभाग) का प्रमुख होता था जो सीधे केंद्र के मुग़ल शासन के प्रति जिम्मेदार होता था। इसकी स्थिति प्रांत में दीवाने-कुल की भांति हुआ करती थी।
  • बक्शी: प्रान्तों में Military (सेना) की देख-रेख का जिम्मेदार

इनके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी भी हुआ करते थे जो मुग़ल प्रशासन में अपना योगदान देते थे। स्थानीय प्रशासन को सरकार, परगना और मौज़ा (गाँव) में बाँटा गया था तथा नगर, Fort (किला) और बन्दरगाह के Administration (प्रशासन) के लिए अलग इकाइयां हुआ करती थीं।

अकबर और दीन-ए-इलाही: Akbar की दिलचस्पी Religious Matters (धार्मिक मामलों) में शुरुआत से ही थी। वह एक उदार धार्मिक नीति के पक्ष में था जिसमें सभी धर्मों के लोगों के लिए स्थान हो। इसी कारण Akbar ने अपने दरबार में कट्टर धार्मिक लोगों के स्थान पर उदार दृष्टि रखने वालों स्थान दिया। 16वीं शताब्दी के अंत में उसने अपनी धार्मिक नीति को Din-i-Ilahi (दीन-ए-इलाही) के रूप में लोगों के सामने रखा किन्तु उसके इस प्रयत्न को सफलता नहीं मिली। अकबर अपने दरबार में अलग-अलग धर्म के विशेषज्ञों से धार्मिक चर्चाएँ सुना करता था। इस उद्देश्य से Akbar ने Philosophical (दार्शनिक) वाद-विवाद और चर्चा के लिए फ़तेहपुर सीकरी के Fort में इबादतखाना नाम से एक नए भवन का निर्माण भी कराया था। अकबर के द्वारा अलग-अलग Religions के विद्वानों की बाद सुनने के कारण, वह सभी धर्मों के प्रति उदार हो गया।

अकबर के दरबार के नवरत्न –

Akbar ने अपने मुग़ल साम्राज्य में से 9 सर्वाधिक प्रसिद्ध और अलग-अलग क्षेत्रों में महारत रखने वाले व्यक्तियों का चयन कर के उन्हे मुग़ल दरबार में उच्च पद प्रदान किया था। बाद में ये Navratna (नवरत्न) के नाम से जाने गए। ये नवरत्न Akbar के सलाहकार और मुग़ल दरबार में शीर्ष अधिकारियों के रूप में कार्य करते थे।

  1. राजा मान सिंह
  2. बीरबल
  3. मियां तानसेन
  4. फैजी
  5. अब्दुल रहीम खान-ए-खाना
  6. राजा टोडर मल
  7. अबुल फज़ल
  8. मुल्ला दो-प्याज़ा (अब्दुल हसन)
  9. फकीर अजिउद्दीन

अकबर द्वारा निर्मित भवन और इमारतें :- मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल के दौरान कुछ बेहतरीन इमारतों का निर्माण किया गया जो आज भी पर्यटन का केंद्र बनी हुई हैं। इनमें Agra Fort, बुलंद दरवाजा, प्रयागराज (इलाहाबाद) का किला, जोधा बाई भवन, सिकंदरा में अकबर की कब्र ( जिसे बाद में जहाँगीर द्वारा पूरा किया गया ) हुमायूँ की कब्र, और Fatehpur Sikri ( फ़तेहपुर सिकरी ) में सूफी संत Salim Chisti (सलीम चिस्ती) की कब्रगाह मुख्य हैं।

अकबर की मृत्यु :- मुग़ल सम्राट अकबर की मृत्यु 27 October 1605 के दिन फ़तेहपुर सीकरी में पेचिश के कारण हुई।  अकबर ने अपनी मृत्यु से पहले इशारों से (जब वह कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं था) अपने विश्वासपात्र अधिकारियों को Mughal साम्राज्य के राजमुकुट को शहजादा सलीम के सर पर रखने और उसे अगला बादशाह बनाने का निर्देश दिया। अकबर की मृत्यु के बाद उसके शरीर को Sikandara (सिकंदरा) में बनाई गयी कब्र में दफना दिया गया। अकबर के बाद शहजादा सलीम ने शहंशाह जहांगीर के रूप में मुग़ल साम्राज्य पर शासन किया।

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