अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु कैसे हुई ।

अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का एक सुल्तान था जो खिलजी वंश का द्वितीय और सबसे ताकतवर शासक था। अलाउद्दीन खिलजी का शासन काल 19 जुलाई 1296 से 4 जनवरी 1316 इसवीं तक चला। अलाउद्दीन के जीवन और मृत्यु के विभिन्न पहलुओं के बारे में इतिहासकारों के बीच काफी मतभेद है। ना केवल अलाउद्दीन खिलजी और उसके वफादार गुलाम और सैन्य प्रमुख मलिक कफूर को लेकर अफवाहों का बाज़ार गरम है बल्कि चित्तोढ़ की पद्मावती के विषय में भी कई काल्पनिक किस्से आम जनता में प्रचलित हैं। इसके पीछे ना केवल मध्यकाल के साहित्यकार और इतिहासकार बल्कि आधुनिक काल के इतिहासकारों की अलग-अलग राय भी जिम्मेदार है।

संजय लीला भंसाली द्वारा बनाई गई फिल्म पद्मावती में अलाउद्दीन खिलजी के किरदार और व्यक्तित्व को एक अलग दृष्टिकोण से पेश किया गया है। पद्मावती फिल्म के कारण बहुत से लोगों के बीच अलाउद्दीन खिलजी के प्रति नजरिया बदल सा गया है। हालांकि इतिहासकारों का मानना है कि संजय लीला भंसाली की इस फिल्म में तथ्यों और इतिहास के साथ छेड़-छाड़ की गयी है। युवाओं पर फिल्मों का बहुत प्रभाव पड़ता है और पद्मावती फिल्म ने भी इस खिलजी वंश के शासक के व्यक्तित्व को बदलकर रख दिया है। अलाउद्दीन खिलजी के जीवन में हुई घटनाओं के बारे में अभी भी बहस जारी है।

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अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु कैसे हुई इसके पीछे भी इतिहासकार अलग-अलग साक्ष्य पेश करते हैं। हालांकि सभी इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि अलाउद्दीन खिलजी अपने जीवन के अंतिम दिनों में अत्यधिक बीमार हो गया था। इस बीमारी के चलते दिल्ली सल्तनत और सत्ता की सारी शक्ति उसके विश्वासपात्र गुलाम मलिक कफूर के हाथों में आ गयी थी।

ऐसा माना जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी अपने अंतिम दिनों में बीमारी के समय अपने अधिकारियों और मंत्रियों के प्रति अविश्वास से घिर गया था। अधिकारियों के प्रति अविश्वास के चलते उसने सत्ता की सारी शक्ति विश्वासपात्र गुलामों और खास पारिवारिक सदस्यों के बीच बांटनी शुरू कर दी थी।

अलाउद्दीन खिलजी की बीमारी और उसके अधिकारियों के प्रति संशय का फायदा मलिक कफूर को मिला जिसने शीघ्र ही सत्ता और दरबार की सारी शक्ति अपने हाथों में केन्द्रित कर ली थी। अलाउद्दीन खिलजी की 1316 में मृत्यु से पहले ही मलिक कफूर ने उन सभी अधिकारियों, कुलीनों और शाही सदस्यों को रास्ते से हटाना शुरू करवा दिया जो भविष्य में उसके लिए चुनौती पेश कर सकते थे। अलाउद्दीन ने मलिक कफूर को अपना वाइसरॉय या नायब भी नियुक्त कर दिया था।  

इस क्रम में मलिक कफूर ने सबसे पहले अलाउद्दीन खिलजी के सबसे बड़े बेटों खिज्र खान और शदी खान को अंधा कर के मौत के घाट उतार दिया। मलिक कफूर को लगा कि अलाउद्दीन खिलजी का बहनोई अल्प खान उसके लिए मुश्किल खड़ा कर सकता है। इसके चलते मलिक कफूर ने अलाउद्दीन को भड़काकर अपने बहनोई अल्प खान की हत्या का आदेश देने के लिए राजी कर लिया।

इस घटना के बाद अलाउद्दीन खिलजी अधिक दिन तक जीवित नही रहा और 4 जनवरी 1316 इसवीं की रात में उसकी मृत्यु दिल्ली में हुई। इतिहासकार बरनी के अनुसार अलाउद्दीन की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी बल्कि मलिक कफूर ने अलाउद्दीन खिलजी की हत्या की थी। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद मलिक कफूर ने अलाउद्दीन के छोटे बेटे शिहाबुद्दीन को नाममात्र का सुल्तान बना दिया था। सल्तनत की सारी शक्ति मलिक कफूर ने अपने पास ही रखी थी। लेकिन मलिक कफूर अधिक समय तक जीवित नहीं रहा क्योंकि असंतोष के चलते उसकी भी हत्या कर दी गयी।

मलिक कफूर की हत्या के बाद अलाउद्दीन का बड़ा पुत्र मुबारक खान खिलजी वंश का अगला सुल्तान बना। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद उसकी लाश को वर्तमान कुतुब कॉम्प्लेक्स में दफन किया गया है जहां उसकी मजार अभी भी मौजूद है। कुतुब मीनार से सटे परिसर में ही अलाउद्दीन खिलजी ने एक मदरसा बनवाया था। इस मदरसे का प्रवेश करने का दरवाजा पश्चिम की ओर है। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मदरसे का निर्माण परंपरागत इस्लामी शिक्षा देने के लिए करवाया था। इसी के दक्षिणी हिस्से में अलाउद्दीन का मकबरा है। किन्तु सबसे ज्यादा आश्चर्यचकित करने वाली बात यह है कि अलाउद्दीन खिलजी की लाश को जिस जगह दफनाया गया है वह मकबरा एक मदरसे से सटा हुआ है। इसे कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के नाम से जाना जाता है। भारत में किसी भी इस्लामी मदरसे से सटे हुए मकबरे का यह पहला उदाहरण है।

अलाउद्दीन खिलजी का मकबरा और मदरसा महरौली के जिस कुतुब कॉम्प्लेक्स परिसर में है वह नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सिकंदर महान की तरह दुनिया पर हुकूमत करने की चाह रखने वाला अलाउद्दीन खिलजी अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सका। हालांकि हिंदुस्तान की जमीन पर और भारतीय उपमहाद्वीप में एक बड़े हिस्से पर अपनी बादशाहत चलाने में वह जरूर कामयाब हुआ।

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