Aurangzeb history in hindi – औरंगजेब का इतिहास

अबुल मुज़फ़्फ़र मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर (Aurangzeb) मुगल सम्राट शाहजहाँ का तीसरा पुत्र था। औरंगज़ेब  भारतीय इतिहास के सबसे अधिक विवादित और घृणित व्यक्तियों में से एक माना जाता है। औरंगजेब का जन्म 3 नवम्बर 1618 के दिन दाहोद गुजरात में हुआ था। मुग़ल वंशानुक्रम में औरंगज़ेब छठा मुग़ल शासक था। औरंगजेब मुग़ल सम्राटों में सबसे अंतिम प्रभावशाली सम्राट माना जाता है जिसके समय में मुग़ल राज्य एक शक्ति के रूप में कायम था।

औरंगज़ेब के शासन काल के बाद मुग़ल साम्राज्य का जो विघटन आरंभ हुआ वह फिर रुका नहीं। अंततः मुग़ल एक शक्ति के रूप में अपनी पहचान खो बैठे। औरंगजेब के लगभग 50 साल के शासनकाल (31 जुलाई 1658-3 मार्च 1707) में भारतीय उपमहाद्वीप में कई महत्वपूर्ण राजनैतिक उथल-पुथल हुए। औरंगजेब के शासनकाल में मुग़ल साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था और उसकी सीमाएं पिछले सम्राटों के मुक़ाबले सबसे अधिक विस्तरत हो गईं थीं। हालांकि यह औरंगजेब की नीतियाँ का ही फलस्वरूप था जिसने मुग़ल साम्राज्य के विघटन की शुरुआत कर दी थी।

aurangzeb history in hindi

औरंगजेब का व्यक्तित्व व्यापक रूप से एक धार्मिक कट्टरपंथी के रूप में पेश किया जाता है जिसने हिंदुओं पर हिंसक अत्याचार किया और हिंदुओं की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया। हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए उसकी बहुत आलोचना हुई है। किन्तु कुछ इतिहासकारों का मानना है कि औरंगजेब ने कई मंदिरों का निर्माण भी कराया था। गैर-मुस्लिम जनता पर औरंगजेब द्वारा लगाया गया जज़िया कर कुख्यात है। किन्तु यह औरंगजेब का शासन काल ही था जब मुग़ल दरबार में सबसे ज्यादा प्रतिशत में हिंदुओं को अपनी सेवाएँ देने का अवसर प्रदान किया गया था। इतिहास में औरंगजेब का व्यक्तित्व अभी भी विवादों में घिरा हुआ है। आइए औरंगजेब के जीवन पर एक दृष्टि डालते हैं और उसके जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं से परिचित होते हैं।

औरंगजेब का आरम्भिक जीवन

औरंगजेब शाहजहाँ और उसकी सबसे प्रिय बेगम मुमताज़ महल का तीसरा पुत्र था। दारा शिकोह औरंगजेब का सबसे बड़ा भाई था। औरंगजेब का जन्म गुजरात और राजपूताना की सीमा के पास दाहोद गुजरात में 3 नवम्बर 1618 के दिन हुआ था। औरंगजेब के जन्म के समय उसके पिता शाहजहाँ गुजरात के राज्यपाल के रूप में नियुक्त थे। शाहजहाँ बाद में 1628 मे मुग़ल सम्राट बने। औरंगजेब शाहजहाँ और मुमताज़ महल की छठवीं संतान था।

औरंगजेब अपने बचपन से ही युद्ध और सैन्य क्षमता में अत्यंत निपुण था। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि औरंगजेब ने मात्र 15 वर्ष की उम्र में एक हाथी से युद्ध कर के उसे नियंत्रित कर लिया था। इस घटना के बाद मुग़ल दरबार और शाहजहाँ की नज़र में औरंगजेब का सम्मान बहुत बढ़ गया था। एक हाथी से लड़ने के कारण उसे “बहादुर” की उपाधि से नवाजा गया था। एक युवा के रूप में भी, औरंगजेब को मुस्लिम धर्म के प्रति समर्पण और इस्लामी निषेधाज्ञा को हृदय से पालन करने के लिए एक समर्पित मुस्लिम के रूप में जाना जाता है।

औरंगजेब ने युवावस्था आते-आते एक निडर सैनिक और एक श्रेष्ठ सेनापति के रूप में अपनी पहचान बना ली थी। औरंगजेब को मात्र 18 वर्ष की आयु में 1636 इसवीं में दक्खन का वाइसराय नियुक्त किया गया। यहाँ औरंगजेब ने अत्यंत कुशलता से मुग़ल साम्राज्य के हितों की रक्षा की। शाहजहाँ ने औरंगजेब को बघलाना के छोटे से राजपूत राज्य को मुग़ल साम्राज्य में मिलाने की ज़िम्मेदारी दी, जिसे औरंगजेब ने बड़ी ही आसानी से और कुशलता पूर्वक पूरा किया था। औरंगजेब की सैन्य कुशलता और साहस से प्रभावित होकर शाहजहाँ ने उसे गुजरात का राज्यपाल और बाद में मुल्तान और सिंध का राज्यपाल भी नियुक्त किया। इन पदों पर रहते हुए औरंगजेब ने उच्च स्तर की प्रशासनिक और सैन्य संघटनात्मक शक्ति का प्रदर्शन किया।

इसके अलावा औरंगजेब ने प्रांतीय स्तर पर उज्बेग और फारसियों के खिलाफ सेनाओं (1646–47) का सफलता पूर्वक संचालन किया। दक्खन प्रांतों के वायसराय के रूप में अपने दो कार्यकालों में (1636–44, 1654–58), दोनों मुस्लिम दक्खन राज्यों को मुग़ल साम्राज्य की निकट-अधीनता तक ला दिया था। औरंगजेब ने अपने पिता के शासनकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर कार्य किया और उन सभी में खुद को एक श्रेष्ठ सैन्य अधिकारी और प्रशासक के रूप में प्रतिष्ठित किया।

औरंगजेब का विवाह और सन्तानें

औरंगजेब का कई बार विवाह हुआ था और उसकी कई पत्नियाँ थीं। औरंगजेब की प्रमुख पत्नी दिलरास बानो बेगम थीं। उसकी अन्य पत्नियों में बेगम नवाब बाई, औरंगाबादी महल, उदयपुरी महल और ज़ैनबाड़ी महल का नाम शामिल है। इन पत्नियों से औरंगजेब को कई बच्चे हुए जिनमें ज़ेब-अन-निसा, ज़ीनत-उन-निसा, मुहम्मद आज़म शाह, मेहर-उन-निसा, सुल्तान मुहम्मद अकबर, मुहम्मद सुल्तान, बहादुर शाह प्रथम और बदर-उन-निसा सम्मिलित हैं।

औरंगजेब और मुग़ल सत्ता के लिए संघर्ष

मुग़ल साम्राज्य में कोई ऐसा नियम नहीं था कि केवल बड़ा पुत्र ही साम्राज्य का अगला उत्तराधिकारी होगा। किन्तु बाबर से लेकर शाहजहाँ तक यह परंपरा चली आ रही थी। चूँकि शाहजहाँ के चारों पुत्र मुग़ल साम्राज्य के विभिन्न भागों के राज्यपाल थे इसलिए उनमें तीव्र प्रतियोगिता का होना भी लाजमी था। लेकिन दारा शिकोह और औरंगजेब में शक्ति के लिए संघर्ष कि भावना अधिक थी। इसका कारण यह था कि शाहजहाँ के चारों पुत्रों में से केवल दारा शिकोह और औरंगज़ेब ही मुग़ल दरबार के सबसे प्रभावशाली लोगों को आकर्षित करने में कामयाब हो सके थे। मुग़ल जनता भी इन दो भाइयों में ही सबसे ज्यादा नेतृत्व की तलाश कर रही थी।

दारा शिकोह और औरंगजेब के व्यक्तित्व में विरोधाभास भी था जिसके चलते मुग़ल दरबार के कई प्रभावशाली लोग इन दो खेमों में बंटते चले गए। एक तरफ दारा शिकोह धार्मिक मामलों में अत्यंत उदार और सहिष्णु था तो दूसरी तरफ औरंगजेब धार्मिक मामलों में रूढ़िवादी और निष्ठुर था। उसे एक धार्मिक कट्टर व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा दारा शिकोह बौद्धिक क्षमता सम्पन्न व्यक्ति था जो समन्वय में यकीन करता था।

समय के साथ औरंगजेब के अंदर मुग़ल सिंहासन के प्रति लालसा बढ़ने लगी थी और वह अपने आप को मुग़ल सत्ता के अगले उत्तराधिकारी के रूप में देखने लगा था। इसके पीछे औरंगजेब की सैन्य निडरता और प्रशासनिक श्रेष्ठता थी जिसने उसे इस कल्पना से भर दिया था कि वही एकमात्र काबिल उत्तराधिकारी है। किन्तु औरंगजेब की यह महत्वाकांक्षा किसी से छुपी नहीं रह सकी। मुग़ल सिंहासन के लिए औरंगजेब की बढ़ती महत्वाकांक्षा ने उसे अपने  सबसे बड़े भाई दारा शिकोह के साथ संघर्ष की स्थिति में ला खड़ा किया। किन्तु दारा शिकोह को शाहजहाँ ने पहले ही मुग़ल साम्राज्य का अगला उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। अब औरंगजेब के सामने दो ही रास्ते थे। या तो वह दारा शिकोह को अगला मुग़ल सम्राट बनने दे या फिर उसके खिलाफ बगावत करे और राजनीतिक मोर्चा खोले।

सितंबर 1657 में जब शाहजहाँ गंभीर रूप से बीमार पड़ा, तो औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच शक्ति और सत्ता के लिए संघर्ष तेज़ हो गया। 1657 में दारा शिकोह की आयु 43 वर्ष, शाह शुजा 41, औरंगजेब 39 और मुराद 33 वर्ष की आयु के थे। ये सभी विभिन्न प्रांतों के गवर्नर थे: दारा शिकोह पंजाब के गवर्नर थे, गुजरात के मुराद, दक्कन के औरंगजेब और बंगाल के गवर्नर के पद पर शाह शुजा कार्य कर रहे थे। किन्तु शाहजहाँ के अप्रत्याशित रूप से दोबारा स्वस्थ्य होने तक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि दोनों में से किसी के भी पीछे हटने की संभावना खत्म हो गई थी। मुग़ल सत्ता के लिए संघर्ष (1657-59) में, औरंगजेब ने निर्ममता और रणनीतिक सैन्य कौशल के साथ अपने भाइयों और कुछ भतीजों का अंत कर डाला । युद्ध और प्रशासन दोनों में उसकी साख अत्यंत उच्च स्तर की बन चुकी थी।  एक कट्टर और रूढ़िवादी मुस्लिम होने के कारण मुसलिम पुरोहित वर्ग में भी वह अपनी जगह बना चुका था।

औरंगजेब ने दारा शिकोह को उज्जैन (15 अप्रैल 1658) के पास धर्मत नाम के स्थान में और फिर बाद में 29 मई 1658 को सामूगढ़ में हराया। औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को भी आगरा में कैद कर दिया। इस प्रकार औरंगजेब ने एक-एक कर के अपने सभी प्रतिद्वंदीयों और दुश्मनों को रास्ते से हटा दिया और मुग़ल साम्राज्य का अगला सम्राट बन बैठा। औरंगजेब के सिंहासन पर बैठने को लेकर किए गए खून-खराबे के कारण उसकी क्रूरता की आलोचना की गई है।

औरंगजेब का राज्याभिषेक और राज्य

मुगल वंश के छठे शासक के रूप में औरंगजेब आलमगीर को 13 जून 1659 के दिन दिल्ली के लाल किले में  राज्याभिषेक किया गया था।

औरंगजेब ने लगभग 50 वर्षों तक शासन किया और उसके शासन काल में मुग़ल साम्राज्य उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में जिंजी तक और पश्चिम में हिंदुकुश से लेकर पूर्व में चटगाँव तक फैल गया था। उसके शासन काल में मुग़ल साम्राज्य अपने अधिकतर विस्तार को प्राप्त हुआ था और क्षेत्रफल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया था।

औरंगजेब को अपने शासनकाल के दौरान मराठों, जाटों, सिखों और राजपूतों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था किन्तु उसने मुग़ल साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति को बनाए रखा। औरंगजेब को दक्कन के मराठों को कुचलने में अपने शासन काल का आधा समय और शाही खजाने का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ा। अपने पूरे शासनकाल के दौरान औरंगजेब लगातार युद्ध में व्यस्त रहा। औरंगजेब ने बीजापुर के आदिल शाहियों और गोलकुंडा के कुतुबशाह को हराकर पंजाब और दक्षिण में मुग़ल क्षेत्र का सफलतापूर्वक विस्तार करने में निर्णायक जीत हासिल की थी।

एक बार सत्तारूढ़ होने के बाद औरंगजेब ने खुद को एक दृढ़ और सक्षम प्रशासक के रूप में प्रदर्शित किया। औरंगजेब ने 1707 में अपनी मृत्यु के समय 88 वर्ष की आयु तक मुग़ल साम्राज्य की सत्ता की पकड़ को बनाए रखा। औरंगजेब निजी जीवन में एक सरल और कट्टर मुस्लिम था जो अपने राज्य में रहने वाली जनता के ऊपर इस्लाम धर्म थोपने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था। यह उसके द्वारा अपनाए गए राजनैतिक दृष्टिकोण से भी जाहिर होता है। औरंगजेब के पास ना ही अकबर महान की तरह और ना ही अपने पिता शाहजहाँ की तरह उदार दृष्टिकोण था किन्तु मुग़ल दरबार में और अपनी जनता के बीच एक अलग तरह की धाक जमाने में वह जरूर कामयाब हुआ था। भले ही यह धाक भय से उत्पन्न हुई हो।

एक सम्राट के रूप में वह अपने साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए भी दृढ़ था।औरंगजेब के द्वारा दक्खन के राज्यों में किए गए अभियानों के उल्लेख के बिना औरंगजेब के शासन के बारे में जानकारी अधूरी है। शाहजहाँ के शासन काल में औरंगजेब दक्खन का गवर्नर रह चुका था जिसके चलते उन राज्यों पर विजय प्राप्त करने के लिए औरंगजेब हमेशा से उत्साहित था। अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए उसने 1681 में अपनी राजधानी को दक्खन में स्थानांतरित कर दिया। यहाँ औरंगजेब ने अपने जीवन का एक लंबा समय बिताया। औरंगजेब ने महाराष्ट्र में मराठा विद्रोह को कुचलने की पूरी कोशिश की हालांकि शिवाजी पर वह पूरी तरह से नियंत्रण करने में सफल नहीं हो सका। मुग़ल साम्राज्य औरंगज़ेब के शासनकाल के दौरान हमेशा युद्ध में सक्रिय रहा और कहीं ना कहीं युद्ध में मुग़ल सेनाएँ शामिल रहीं। निरंतर युद्ध ने मुगल खजाने को क्षति पहुंचाई जिससे सम्राट की शक्ति काफी कमजोर हो गयी। औरंगजेब ने बीजापुर के आदिल शाहियों और गोलकुंडा के कुतुबशाह पर 1686 और 1687 में विजय प्राप्त करने में सफलता हासिल की थी। वह अहमदनगर सल्तनत को अपने राज्य में मिलाने में भी कामयाब हुआ था। औरंगजेब अपनी युवावस्था से ही पूरे दक्षिण भारत पर अधिकार करना चाहता था। इसी क्रम में अपने लंबे शासनकाल के दौरान वह दक्षिण में तंजौर (अब तंजावुर) और तिरुचिरापल्ली तक अपने साम्राज्य का विस्तार करने में भी सफल रहा।

औरंगजेब के शासनकाल में ही भारत में सबसे पहली बार मुग़ल सेना ने रॉकेट का इस्तेमाल बिदर के खिलाफ किया था।

अपने शासनकाल के दौरान औरंगजेब मुगल साम्राज्य का 3.2 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक विस्तार करने में सफल हुआ था और संभवतः अपने जीवन के कुछ समय में सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन बैठा था।

औरंगजेब ने मराठा और सिख समुदाय में कई दुश्मन बना लिए थे। 1664 में गद्दी पर बैठे नौवें सिख गुरु, तेग बहादुर ने कुछ वर्षों तक असम सीमा पर मुगल सेना में सेवा की थी। कुछ समय बाद वे पंजाब के आनंदपुर लौट आए और खुद को सच्चा बादशाह कहकर संबोधित करने लगे। मुग़ल और सिख सेनाओं के बीच युद्ध के बाद तेग बहादुर को गिरफ्तार कर के दिल्ली लाया गया। सिखों के 9वें गुरु, गुरु तेग बहादुर को सबसे पहले यातना दी गई और फिर इस्लाम न मानने के कारण 1675 इसवीं में औरंगजेब ने उनकी हत्या कर दी। इस घटना के बाद सिख कभी भी मुग़ल सम्राट के प्रति सहानुभूति नहीं रखते थे और मुग़ल राज्य के खिलाफ एकजुट होने में वे एकदम तैयार थे। सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह थे, जिन्होंने पूर्वी पंजाब के पहाड़ी इलाकों में सिख साम्राज्य की स्थापना करने के लिए प्रयत्न किए। आनंदपुर में गोविंद सिंह की बढ़ती शक्ति को नियंत्रण में रखने के लिए स्थानीय शासकों ने औरंगजेब से दखल देने के लिए प्रार्थना की। दसवें गुरु गोविंद सिंह को पकड़ने के लिए औरंगजेब ने मुग़ल सेना को आनंदपुर में भेजा। किन्तु गोविंद सिंह बच निकले। मुग़लों ने पकड़ में आए गोबिन्द सिंह के पुत्रों को मार डाला जिससे पंजाब में सिख शक्ति को गहरा धक्का लगा । किन्तु बाद में औरंगजेब ने गोविंद सिंह के प्रति नरम रुख दिखाया और अपना ध्यान उनकी ओर से हटा लिया।

अपने शासन काल के दौरान औरंगजेब स्थापत्य कला में अधिक रुचि नहीं दिखा सका। उसके द्वारा बनाए गए भवनों को उस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है जिस श्रेणी में अकबर और शाहजहाँ के निर्माण कार्यों को रखा जाता है। उसके शासनकाल में बहुत कम निर्माण कार्य प्रायोजित किए गए। उसके द्वारा बनाए गए भवनों में लाल किले में मोती मस्जिद के नाम से एक छोटी सी संगमरमर की मस्जिद का उल्लेख होता है। लाहौर में एक बादशाही मस्जिद और कश्मीर और बनारस में मस्जिदों को बनाने के लिए दिये गए आदेश के अलावा औरंगजेब के नाम कोई खास स्थापत्य कला निर्माण की पहचान नहीं है। औरंगजेब ने कभी भी फिजूल खर्ची के लिए शाही पैसा खर्च करने में विश्वास नहीं किया जिसके चलते कभी कोई स्मारक बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया। औरंगजेब का दैनिक भत्ता 500 रुपये था जो वह खुद को और अधिक शिक्षित करने पर खर्च किया करता था।

औरंगजेब की मृत्यु

औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 को अहमदनगर में हुई थी। उसकी मृत्यु प्राकृतिक रूप से हुई थी। ऐसा माना जाता है कि औरंगज़ेब मुग़ल साम्राज्य का अंतिम महान शासक था और उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र विशाल मुग़ल साम्राज्य को एकजुट रखने और उसकी शक्ति को बनाए रखने में विफल रहा। मुग़ल साम्राज्य के विखंडन की जो प्रक्रिया औरंगजेब के बाद शुरू हुई उसने 18 वीं शताब्दी के मध्य में साम्राज्य का पतन कर दिया। 1857 की क्रान्ति के बाद अंग्रेजों ने अंतिम और नाम मात्र के मुग़ल शासक बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर के रंगून भेज दिया। इसके बाद मुग़ल बादशाहत को खत्म कर दिया गया।

औरंगजेब की धार्मिक नीति

धार्मिक रूप से रूढ़िवादी होने के कारण औरंगजेब ने अपने राज्य में जुआ, शराब, वेश्यावृत्ति, नशीले पदार्थों आदि पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि औरंगजेब के पूर्ववर्तियों ने उदार धार्मिक दृष्टिकोण अपनाया था, वह इस्लाम के रूढ़वादी स्वरूप की ओर अधिक आकर्षित था। उसने दरबारी संगीतकारों और कवियों को भंग कर दिया था।

औरंगजेब की व्यक्तिगत धार्मिक नीति ने उसकी राजनीति को भी प्रभावित किया। इस्लाम को मुग़ल दरबार में विशेष महत्व देने और हिन्दू धर्म की उपेक्षा के कारण अनावश्यक रूप से उसने कई दुश्मन बना लिए थे। इसके अलावा इस्लाम को बढ़ावा देने के कारण हिन्दू बुद्धिजीवी वर्ग से भी उसकी दूरियाँ बढ़ती गईं। शुरुआत से ही राजपूत शासक मुग़ल दरबार और राज्य का एक अभिन्न हिस्सा होते थे। किन्तु यह औरंगजेब ही था जिसके शासन काल में राजपूतों को अलग-थलग कर दिया गया। राजपूतों का समर्थन प्राप्त करने में औरंगजेब के पूर्ववर्तियों खासकर अकबर ने काफी प्रयत्न किया था और कई कूटनीतिक समझौतों के बाद राजपूत मुग़ल साम्राज्य के प्रति निष्ठावान हुए थे। औरंगजेब की इस्लामी कट्टरता ने धार्मिक अलगाववाद के कारण होने वाले राजनैतिक अलगाववाद को बढ़ावा दिया।

पारंपरिक इस्लामी नीति के अनुसार राज्य के मामलों को संचालित करने के प्रयास में कई दिक्कतें थीं और औरंगजेब को उन सभी का सामना करना पड़ा। 1688 में, जब औरंगजेब ने शाही दरबार में संगीत के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया और मुस्लिम कानून के सख्त निषेधाज्ञा के अनुसार अन्य कदम उठाए तो जाने-अनजाने में हिंदू और मुस्लिम दोनों प्रभावित हुए।

औरंगजेब ने 1679 में गैर-मुस्लिम जनता के लिए जज़िया कर लगाया जिसका सबसे अधिक प्रभाव हिन्दू जनता पर पड़ा। उसके इस कदम से हिन्दू लोगों में आक्रोश फ़ेल गया था। अपनी इस्लामिक निजी राय को मुग़ल शासन में लागू करने के लिए औरंगजेब ने बड़ी संख्या में उन करों को समाप्त कर दिया जो सदियों से भारत में लगाए जा रहे  थे लेकिन जो इस्लामी कानून द्वारा अधिकृत नहीं थे। औरंगजेब के कट्टर इस्लामी रुख के कारण मौलवी और अन्य मुस्लिम धर्मगुरु उसके दरबार में शक्तिशाली बनते जा रहे थे जिन्हे औरंगजेब ने नियंत्रण करने का प्रयास नहीं किया। यहाँ तक कि औरंगजेब की शासन-प्रशासन की कुछ नीतियाँ भी मुस्लिम धर्मगुरुओं से प्रभावित होने लगीं थीं। राज्य के मामलों में उलमा के विचारों के अनुसार आदेश भी जारी किए गए थे। धार्मिक भेदभावपूर्ण कट्टर शासन प्रणाली औरंगजेब से पहले किसी मुग़ल सम्राट में देखने को नहीं मिलती है। किन्तु औरंगजेब के समय यह बिलकुल स्पष्ट हो गयी थी। उसके द्वारा तोड़े गए हिन्दू मंदिरों की एक लंबी लिस्ट है।

औरंगजेब पर अक्सर हिंदुओं को मुग़ल साम्राज्य के अधीन पदों पर रोजगार ना देने का आरोप लगाया जाता है। किन्तु औरंगजेब के समय में मुग़ल अधिकारियों की सूची के अध्ययन से यह बात निश्चित हो जाती है कि उसके शासनकाल में किसी भी दूसरे मुग़ल सम्राट के मुक़ाबले अधिक हिंदुओं को रोजगार दिया गया था। उसके समय में हिंदुओं के शाही रोजगार पर कोई प्रतिबंध नहीं था। किन्तु मुग़ल दरबार के सबसे महत्वपूर्ण पदों पर राजपूतों और अन्य हिंदुओं की तैनाती में कमी आने के संकेत मिलते हैं।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार औरंगजेब के शासनकाल में अपनाई गयी अलगाववादी धार्मिक नीति के कारण मुग़ल साम्राज्य कमजोर हुआ और बाद में इसका पतन हो गया । किन्तु यह कथन संदिग्ध है क्योंकि औरंगजेब के शासनकाल के हिंदू विद्रोह की कोई व्यापक धार्मिक अपील नहीं थी। इतना ही नहीं इन हिंदू विद्रोहों को कुचलने में औरंगजेब ने कई बार हिन्दू अधिकारियों की ही मदद ली थी। वहीं दूसरी तरफ औरंगजेब ने अपनी हिंदू जनता की सहानुभूति जीतने के लिए कई मंदिरों और सन्यासियों को जागीरें दान में दीं।

व्यक्तिगत रूप से औरंगजेब संगीत की अच्छी समझ रखता था किन्तु इस्लामिक निषेधाज्ञा के अनुसार उसने इस मनोरंजन को छोड़ दिया था। औरंगजेब की पोशाक, भोजन और मनोरंजन सभी बेहद सरल थे। औरंगजेब अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित एक निष्ठावान मुस्लिम था जो सादगी और पवित्रता से जीवन व्यतीत कने में यकीन करता था। वह एक पढ़ा-लिखा इंसान था और उसने सुंदर फ़ारसी गद्य लिखे। औरंगजेब के पत्रों का एक चयन (Ruq’at-i-Alamgiri) उपलब्ध है। औरंगजेब एक नियमित उपासक था। औरंगजेब को जिंदा पीर (जीवित संत) के नाम से भी जाना जाता था।

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