बक्सर का युद्ध कब हुआ था ?

बक्सर का युद्ध भारतीय जमीन पर हुए उन युद्धों में से एक है जिसने भारत के भविष्य पर प्रभाव डाला है । बक्सर का युद्ध 21 अक्टूबर 1764 को हुआ । सबसे पहले इस युद्ध के कारणों पर  एक नजर डालते हैं । इस युद्ध का सबसे बड़ा कारण यही था कि बंगाल पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद East India Company उत्तर भारत पर भी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती थी । इस युद्ध का दूसरा कारण यह था कि मीर कासिम जो कुछ समय पहले तक East India Company  की कृपा से बंगाल का नवाब था अपने आप को इस पद से हटा  देने के कारण East India Company से बदला लेने के लिए तत्पर था ।

इस युद्ध का तीसरा कारण यह था कि अवध का नवाब  शुजाउददौला  अपने आपको वफादार मुगल नवाब साबित करना चाहता था  और इसके लिए उसने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय का  वजीर  बनना स्वीकार किया । इस युद्ध का चौथा कारण यह था कि शाह आलम द्वितीय वह मुगल बादशाह था जो मुगल साम्राज्य को पहले की तरह मजबूत देखना चाहता था और वह इस बात को समझ गया था कि अगर East India Company  को इसी तरह आगे बढ़ने दिया गया तो एक ना एक दिन मुगलों की बची हुई इज्जत भी चली जाएगी ।

baksar ka yudh kab aur kyon hua tha

इन सभी कारणों से 21 अक्टूबर 1764 को यह दोनों सेनाएं एक दूसरे के सामने आई । अब जब आपको इस सवाल का जवाब मिल गया कि ,बक्सर का युद्ध कब हुआ था ? तो आगे बढ़ते हैं और यह समझते हैं कि इस युद्ध की गतिविधियां क्या थी और  इसके परिणाम क्या  हुए ?

बक्सर युद्ध की गतिविधियां एवं परिणाम  अथवा  Activities of War and its result

इतिहासकारों के अनुसार  मीर कासिम ,  शुजाउद्दौला और शाह आलम तीनों की सेनाएं मिलकर लगभग 40,000 की थी । और उनके सामने East India Company की सेना लगभग 7000 थी । अब आप सोच रहे होंगे कि दोनों सेनाओं की संख्या में इतना बड़ा फर्क है फिर शाह आलम की सेना हार कैसे गई और East India Company  की सेना जीत कैसे गई ।

दोनों में  बड़ा फर्क था और वह फर्क था प्रशिक्षण एवं अनुशासन का । मुगल सेना पुरानी युद्ध पद्धति पर काम कर रही थी वही East India Company की सेना Modern European warfare में  प्रशिक्षित थी। कभी-कभी लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि यूरोपियन सैनिक भारतीय सैनिकों से बेहतर थे परंतु ऐसा नहीं है क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में 95% लोग भारतीय थे ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और दूसरी सेनाओं में सिर्फ यह फर्क था कि ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना आधुनिक रणनीतियों पर काम कर रही थी ।

इस युद्ध के शुरू होने के 3 घंटे में ही यह साफ हो गया कि शाह आलम की सेना हार रही है और दोपहर आते आते यह स्पष्ट हो गया कि मुगल सेना हार गई है ।

 इस युद्ध का सबसे पहला परिणाम तो यह हुआ कि शुजाउद्दौला सबसे पहले मैदान से भाग गया यही नहीं उसने भागते भागते एक पुल पार करने के पश्चात उस पुल को बम से उड़ा दिया ताकि उसका पीछा कोई ना कर सके । ऐसा करने से मीर कासिम और शाह आलम  पुल की दूसरी तरफ ही फंस गए । फिर मीर कासिम अपने गहने लेकर भाग गया और उसके बाद काफी समय तक उसका कोई पता नहीं चला ।

अब युद्ध भूमि पर केवल मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय था उसके और उसके सेनापतियों ने इस बात का निर्णय लिया कि अब युद्ध लड़ने से कोई फायदा नहीं है इसीलिए उन्होंने East India Company से हाथ मिला लिया । भारतीय राजनीतिक पटल में इस युद्ध का यह परिणाम हुआ कि East India Company अब बंगाल में व्यापार करने वाली कंपनी नहीं रह गई थी बल्कि उसकी नजर दिल्ली और बाकी बचे भारत पर थी और धीरे-धीरे उसने लगभग पूरे भारत पर अपना आधिपत्य जमा लिया । भारत को  जिससे 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली ।

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