TOP-7 घटनायें ! स्वतंत्र भारत की दिशा तय करने वाली

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1. भारतीय संविधान का लागू होना

ब्रिटिश साम्राज्य से आजादी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक जीत जरूर थी परंतु अंतिम लक्ष्य नहीं, यह केवल भारतीयों के लिए भारत का पहला कदम था। स्वतंत्रता संग्राम का अगला कदम ब्रिटिश कानून को हटाकर एक ऐसे कानून का निर्माण करना एवं लागू करना था जो भारतीयों के द्वारा भारतीयों के लिए बनाया गया हो। इसी प्रक्रिया के लक्ष्य की पूर्ति 26 जनवरी 1950 को होती है।

भारतीय संविधान के 25 महत्वपूर्ण हिस्से हैं जिनमें 448 आर्टिकल हैं और 12 शेड्यूल है। यह संविधान 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया।

2. युद्ध

स्वतंत्र भारत की उत्पत्ति एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम से  हुई थी जो कि अहिंसा की कोख से जन्मा था। अहिंसा का सिद्धांत आपको एक तरफ दूसरे  किसी देश या प्राणी के प्रति हिंसा करने से मना करता है वहीं दूसरी तरफ आपको अपनी सुरक्षा करने का पूरा अधिकार देता है। स्वतंत्र भारत एक ऐसा देश है जिसने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया परंतु जब कभी उस पर किसी भी तरह का युद्ध थोपा गया तो उसने उसका जवाब एक आत्मनिर्भर राष्ट्र की तरह दिया।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कुल मिलाकर 5 बार युद्ध की स्थिति बनी पहली 1947-48 में पाकिस्तान के खिलाफ  कश्मीर में, 1962 में चीन के खिलाफ अपने पूर्वी सीमा की ओर, 1965 में एक बार फिर पाकिस्तान के खिलाफ, 1971 में पूर्वी एवं पश्चिमी दोनों  सीमाओं पर पाकिस्तान के खिलाफ। 1999 में पाकिस्तान से आए  घुसपैठियों के खिलाफ।

  • 1947-48 का युद्ध:

युद्ध पूर्व स्थिति:

भारत-पाकिस्तान के बीच हुए इस पहले युद्ध के पूर्व स्थिति कुछ इस तरह से थी। जम्मू एवं कश्मीर राजा हरि सिंह के नियंत्रण में था। जम्मू एवं कश्मीर के एक तरफ नया स्वतंत्र राष्ट्र भारत था जो कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र था। जम्मू एवं कश्मीर के दूसरी तरफ नया स्वतंत्र पाकिस्तान था जो कि एक इस्लामिक गणराज्य था। जम्मू कश्मीर के राजा हरिसिंह के पास अधिकार था कि वे दोनों राष्ट्रों में से किसी एक राष्ट्र को सम्मिलित होने के लिए चुन लें अथवा स्वतंत्र रहने का निर्णय लें  और इसीलिए उन्होंने भारत एवं पाकिस्तान दोनों के साथ स्टैंड स्टील एग्रीमेंट किया था अर्थात दोनों राष्ट्रों ने जम्मू एवं कश्मीर को इस बात का वचन दिया था कि वह उसकी सीमाओं की इज्जत करेंगे और  यथास्थिति बनाए  रखेंगे।भारत और पाकिस्तान में  मूल फर्क भारत  का धर्मनिरपेक्ष होना है,भारत की स्थिति से कई धर्मो ने जन्म लिया परंतु भारत ने अपने नागरिकों के प्रति किसी भी प्रकार का भेदभाव धर्म के आधार पर नहीं किया, भारत में उपस्थित धर्मों का अध्ययन आपका ज्ञान वर्धन करेगा।

युद्ध का कारण:

भारत ने तो कश्मीर में अपने समझौते का पालन करते हुए यथास्थिति बनाने का पूरा प्रयास किया परंतु पाकिस्तान जो कि एक धर्म के नाम पर बना हुआ राष्ट्र था हर इलाके को धर्म की नजर से ही देखता था। इसलिए उनका मानना था क्योंकि कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका है तो वह पकिस्तान के हिस्से आना चाहिए।कश्मीर को हथियाने के लिए पाकिस्तान   ने यह नीति बनाई कि वह कबायली इलाकों के लोगों को कश्मीर में घुसपैठ करने के लिए प्रोत्साहित करेगी  और  उनकी हर तरीके से मदद करेगी और कबायली  लोगों ने ऐसा ही किया।

युद्ध की गतिविधियां:

जब कबायली लोगों ने उस समय के जम्मू कश्मीर राज्य पर हमला कर दिया तो राजा हरि सिंह की सेनाओं ने उनका सामना किया, राजा हरि सिंह की सेना की बहादुरी से लड़ने के बावजूद वे कबायली और पाकिस्तानी सेना के सामने वे लगातार कमजोर पड़ रहे थे और धीरे-धीरे अपना इलाका खोते जा रहे थे। एक समय तो ऐसा आ गया जब लग रहा था कि दो-तीन दिन के भीतर ही पाकिस्तानी सेना  और कबायली श्रीनगर पहुंच जाएंगे तब राजा हरि सिंह ने भारत सरकार से मदद मांगी, परंतु भारत सरकार ने शर्त रखी कि वे कश्मीर में तभी कदम रखेंगे जब  राजा हरि सिंह भारत  में शामिल होने के समझौते में  हस्ताक्षर करने  को तैयार हों । राजा हरि सिंह ने ऐसा ही किया और उनके हस्ताक्षर करते ही भारतीय सेनाओं ने कश्मीर में अपना अभियान शुरू कर दिया। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना और  कबायली लड़ाकों को धीरे धीरे पीछे करना चालू कर दिया।

परिणाम: भारत पाकिस्तान के बीच इस पहले युद्ध का परिणाम सीजफायर समझौते के साथ हुआ। वैसे तो दोनों ही राष्ट्रों ने अपनी विजय घोषित कर दी परंतु अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने यह माना कि भारत इस में विजय हुआ है क्योंकि उसके पास दो तिहाई कश्मीर है।

जब दोनों सेनाओं के बीच में सीजफायर हुआ  तो दोनों सेनाएं जहां थी वह रेखा लाइन ऑफ कंट्रोल कहलाई और आज भी यही लाइन ऑफ कंट्रोल भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा का कार्य करती है।

  • 1962 का भारत चीन युद्ध:

युद्ध पूर्व स्थिति:

भारत और चीन के बीच की सीमा रेखा को मैकमेहन लाइन कहते हैं,  यह सीमा रेखा उस समय भारत में राज  कर रहे ब्रिटिश साम्राज्य एवं तत्कालीन  चीन के राजघराने के बीच हुए समझौते के बाद अस्तित्व में आई थी।   यह स्थिति कई सालों तक बनी रही परंतु जब चीन में माओ के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने कब्जा कर लिया तो उन्होंने इस सीमा रेखा को मानने से इंकार कर दिया एवं पूरे हिमालयन क्षेत्र में अपना दावा कर दिया। परंतु  युद्ध की स्थिति अभी बनी नहीं थी इसी बीच दोनों देशों के बीच मित्रता के लिए पंचशील का समझौता हुआ।

युद्ध का कारण : वैसे इस युद्ध के कई कारण थे पर उनमें  से कुछ प्रमुख कारण कुछ इस तरह से हैं चीन के उस समय के प्रधानमंत्री जो एन लाइ  ने  तो एक बार यहां तक कह दिया था कि भारत के कब्जे वाले किसी भी हिस्से में चीन कोई दावा नहीं करता परंतु बाद में उन्होंने अपनी बात बदल दी और यह कहने लगे कि  अक्साई चिन  में चीन का हक बनता है।

इसके बाद तिब्बत के नेता एवं  बुद्ध धर्म के धार्मिक गुरु दलाई लामा  तिब्बत से भाग कर भारत आ गए और भारत ने उनको शरण देने का निर्णय लिया। इस बात ने दोनों देशों के बीच रिश्ते और भी खराब  कर दिए।

जो एन लाइ ने  तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक  एक शांति वार्ता का प्रस्ताव भेजा और उन्होंने कहा कि अगर भारत अक्साई चिन पर चीन के दावे को मान ले तो चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को छोड़ देगा।भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने  इस  प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया कि अक्साई चिन पर या अरुणाचल प्रदेश पर चीन का कोई भी जायज हक नहीं बनता और इसका जवाब चाइना  ने यह कह  कर दिया कि भारत  तिब्बत को हथियाने की कोशिश कर सकता है।

युद्ध की गतिविधियां:

वैसे तो भारत और चीन के बीच में गोलीबारी की छोटी मोटी घटनाएं 1961 से ही चल रही थी परंतु असली युद्ध की  शुरुआत  20 अक्टूबर 1962 को हुई जब चाइना ने एक साथ अरुणाचल प्रदेश एवं लद्दाख के इलाकों में हमला कर दिया ।

चीन की सेनाएं काफी तेजी से भारत की सीमाओं के अंदर आ रही थी कि  24 अक्टूबर तक ऐसा माना जाता है कि वह भारत की सीमाओं के 15 किलोमीटर अंदर आ चुकी थी। इसके बाद युद्ध की गतिविधियां  कुछ देर के लिए रुक गई और जो एन लाइ  ने नेहरू को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने यह कहा कि वे अरुणाचल प्रदेश का इलाका छोड़ने को तैयार है और इसके साथ ही साथ नियंत्रण रेखा के 20 किलोमीटर पीछे जाने को तैयार हैं अगर भारत अक्साई चिन  में चीन के दावे को स्वीकार कर लेता है तो। नेहरू ने इस दावे को खारिज कर दिया और 14 नवंबर 1962 को दोनों देशों के बीच युद्ध फिर से चालू हो  गया।

परिणाम :इस युद्ध का अंत तब हुआ जब चाइना ने एक तरफा सीजफायर की घोषणा कर दी वे उत्तर पूर्वी सारे इलाकों से वापस चले गए जो  उन्होंने कब्जे में लिए थे और अक्साई चिन  पर अपना कब्जा बना लिया जो आज तक बना हुआ है।

  • 1965 का  भारत पाकिस्तान युद्ध:

युद्ध पूर्व स्थिति:

युद्ध के पूर्व की स्थिति कुछ ज्यादा खराब नहीं थी। 1965 के युद्ध के पहले  कच्छ के रण में भारत एवं पाकिस्तान  के सीमा सुरक्षा बलों के बीच कुछ छोटी-छोटी गोलीबारी की घटनाएं  हुई थी जो अंतरराष्ट्रीय सलाह मशवरा के बाद खत्म हो गई थी।

 युद्ध का कारण:

पाकिस्तान के उस समय के  शासक अयूब खान ने कच्छ के रण के बाद यह समझा कि भारत पाकिस्तान का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है इसीलिए यही सबसे उपयुक्त वक्त है जब भारत पर एकदम से हमला कर कश्मीर उनसे छीना जा सकता है और इसीलिए उन्होंने ऑपरेशन  जिब्राल्टर शुरू किया।

युद्ध की गतिविधियां:

5 अगस्त 1965 को  लगभग 30000 पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीर में नियंत्रण रेखा को पार कर हमले करना शुरू कर दिया।  पाकिस्तानी सेना को इस हमले में शुरुआती दौर में कुछ सफलताएं मिली।  इस से पाकिस्तान के हुक्मरानों को लगने लगा कि कश्मीर को अब वे अपने में मिला कर ही छोड़ेंगे और उन्होंने हमले तेज कर  दिए।

भारतीय सेना एवं सरकार ने इसका हल निकाला कि उन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान की ओर अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार कर पाकिस्तान पर हमला कर दिया। अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करना और पाकिस्तान पर हमला करना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उस समय यह माना जाता था  क्योंकि नियंत्रण रेखा या लाइन आफ कंट्रोल अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है इसलिए उससे छेड़छाड़ की जा सकती है परंतु अंतरराष्ट्रीय सीमा से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। यही अयूब  ख़ान का अति आत्मविश्वास उन्हें धोखा दे गया उनका मानना था कि भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर लड़ते रहेंगे परंतु पाकिस्तान को इस इलाके में ज्यादा सेना  रखने की जरूरत नहीं है क्योंकि भारत में अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा पार करने की हिम्मत नहीं है। भारतीय सेनाओं ने अयूब खान का यह ब्लफ पकड़ लिया और सीधे पाकिस्तान पर हमला कर दिया। भारतीय सेना  इतनी तेजी से आगे बढ़ी है कि वह कुछ दिनों में ही लाहौर पहुंच गई।

परिणाम :-

संयुक्त राष्ट्र  की पहल पर सीजफायर के साथ यह युद्ध ख़त्म हुआ । यह समझौता ताशकंद में भारत एवं पाकिस्तान के राष्ट्र प्रमुखों के बीच सोवियत रूस का संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ। वैसे तो दोनों ही देशों ने अपने आप को विजयी  घोषित कर दिया परंतु अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध भारत जीता क्योंकि  वाह पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर लाहौर तक पहुंच गया था।

  • 1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध:

युद्ध के पूर्व की स्थिति:

इस युद्ध के पूर्व की स्थिति कुछ इस तरह से थी। उस समय पाकिस्तान  एवं बांग्लादेश दो अलग अलग राष्ट्र नहीं थे बल्कि एक ही देश था आज का पाकिस्तान तक पश्चिमी पाकिस्तान कहलाता था और आज का बांग्लादेश तब पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था। उस समय की राजनीतिक स्थिति पाकिस्तान में कुछ इस तरह की  सत्ता हमेशा पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों के हाथ में रहती थी और पूर्वी पाकिस्तान पर पश्चिमी पाकिस्तान की भाषा एवं संस्कृति थोपी जाती थी । तत्कालीन चुनाव में तब के पूर्वी पाकिस्तान में आवामी  लीग ने 2 सीटों को छोड़कर पूर्वी  पाकिस्तान की सारी सीटों को जीत लिया इसका नेतृत्व उस समय मुजीब उर रहमान कर रहे थे, अब आवामी लीग के पास जितनी सीटें थी कि वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद का दावा ठोक सकते थे परंतु पश्चिमी पाकिस्तान में याहयाह खान ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया और उन्हें जेल में डाल दिया।

कारण:

वैसे तो पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाबी बहुल इलाके से आने वाली पाकिस्तान आर्मी तब के पूर्वी  पाकिस्तान में दमन की नीति अपनाई हुई थी परंतु मुजीब उर रहमान  को गिरफ्तार करने के बाद उन्होंने इसे और तेजी से लागू करना चालू कर दिया। पूर्वी पाकिस्तान की जनता पर भयानक अत्याचार किए गए जिसके फलस्वरूप बड़ी मात्रा में लोगों ने बांग्लादेश छोड़कर भारत की ओर आना चालू कर दिया और ऐसा करने से भारत की अर्थव्यवस्था बिगड़ने लगी। भारत को इसका उपाय करना जरूरी था इसलिए उन्होंने मुक्ति वाहिनी को अपना सहयोग देना चालू कर दिया ताकि बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग हो सके और  यह शरणार्थी  अपने देश वापस जा सके।

युद्ध की गतिविधियां:

युद्ध 3 दिसंबर 1971 को चालू हुआ जब पाकिस्तानी वायुसेना ने अंतर्राष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन कर भारत में  हमले किए। यह युद्ध पहले के किसी भी युद्ध की तरह नहीं था यह ऐसा युद्ध नहीं था जब एक समय एक पक्ष का पडला भारी था  वही दूसरे समय दूसरे पक्ष का  पडला भारी था। भारत पाकिस्तान के बीच में युद्ध 13 दिनों तक चला और पूरे समय भारत की सेना का  दबाव पाकिस्तानी सेना पर लगातार बना रहा।इस बार ज्यादातर लड़ाई भारत के पूर्वी सीमा की ओर अर्थात आज के बांग्लादेश में हुई।

 परिणाम: इस युद्ध की समाप्ति 16 दिसंबर 1971 को हुई जब लेफ्टिनेंट जनरल ए ए के नियाजी ने  भारतीय सेना के समक्ष समर्पण कर दिया। इसके बाद 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्ध बंदी बना लिया गया एवं 1972 में हुए शिमला समझौते के बाद उन्हें छोड़ा गया इसके साथ ही मुजीब उर रहमान को भी पाकिस्तानी जेल से आजादी मिल गई और  बांग्लादेश के नए शासक बने। इसी के साथ दुनिया के नक्शे में बांग्लादेश नाम का नया मुल्क शामिल हो गया।

  • 1999  कारगिल युद्ध:

 युद्ध पूर्व की स्थिति:

युद्ध के पूर्व की स्थिति कुछ इस तरह से थी। पहले के सारे युद्ध में भारत एवं पाकिस्तान के बीच में तनाव की स्थिति थी परंतु 1999 में ऐसा नहीं था जबकि यह वह दौर था जब प्रधानमंत्री ने लाहौर बस यात्रा की थी और इस कारण से दोनों ही देशों के रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा मधुर थे।भारत के लिए कारगिल क्यों महत्वपूर्ण है यह जानने के लिए आपको भारत की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन करना पड़ेगा।

कारण

ऐसा माना जाता है कि कारगिल  की पूरी योजना उस समय के पाकिस्तान आर्मी के चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ की देखरेख में बनी थी  और तो और यहां तक भी माना जाता है कि इस योजना के बारे में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को कुछ भी नहीं बताया था और उन्हें केवल तभी बताया जब सारी दुनिया के सामने यह बात आ गई। परवेज मुशर्रफ का मानना था कि ठंड के समय भारत एवं पाकिस्तान की सेनाएं ऊंची चोटियों में  बनी अपनी चौकियों को छोड़कर निचले इलाके में आ जाती है इसीलिए अगर ठंड के समय जाकर इन चौकियों पर कब्जा कर लिया जाए तो वह कब्जा बना रहेगा। परवेज मुशर्रफ के इस विश्वास का यह कारण था कि उन्हें लगता था कि अब  पाकिस्तान के पास परमाणु बम है और भारत पाकिस्तान से लड़ने की हिम्मत नहीं करेगा। 

युद्ध की गतिविधियां:

भारतीय सेना  एवं घुसपैठियों के बीच मई के महीने में 1999 में लड़ाई चालू हो गई पहले भारतीय सेना को अंदाजा नहीं था की कितनी मात्रा में यह घुसपैठिया भारत में है और कितना बड़ा क्षेत्र में उन्होंने कब्जा कर रखा है। परंतु सही यथा स्थिति जानने के पश्चात भारतीय सेना ने सही-सही योजना बनाई और धीरे धीरे कर अगले 2 महीनों में अपना सारा इलाका वापस ले लिया।

परिणाम:

भारत ने पाकिस्तानी घुसपैठियों के द्वारा कब्ज़ा किया  हुआ सारा इलाका वापस ले लिया। भारत एवं पाकिस्तान के रिश्ते अपने मधुर दौर से  बाहर आ गए और कड़वाहट फिर से आ गयी। पूरी दुनिया को यह पता चल गया कि  पाकिस्तान एक गैर जिम्मेवार राष्ट्र है। इसके कुछ दिनों बाद ही पाकिस्तान में सत्ता पलट हो गई और नवाज शरीफ को हटाकर आर्मी के  प्रमुख प्रवेश मुशर्रफ खुद ही राष्ट्रपति  बन गए।

3. बैंकों का राष्ट्रीयकरण: 1969 में जिन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था वह कुछ इस तरह से है:

  1. इलाहाबाद बैंक।
  2. बैंक ऑफ बड़ौदा।
  3. बैंक ऑफ इंडिया।
  4. बैंक ऑफ महाराष्ट्र।
  5. सेंट्रल बैंक।
  6. सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया।
  7. देना बैंक।
  8. इंडियन बैंक।
  9. इंडियन ओवरसीज बैंक।
  10. पंजाब  एंड सिंध बैंक।
  11. पंजाब नेशनल बैंक।
  12. यूको बैंक।
  13. यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया।

1980 में जिन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया वे  इस तरह से है :

  1. विजया बैंक।
  2. ओरिएंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स।
  3. कॉरपोरेशन बैंक।
  4. आंध्र बैंक।
  5. यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पीछे उस समय की सरकार ने कुछ तर्क दिए। सरकार लोगों की बचत के पैसे का सबसे बेहतरीन तरीके से उपयोग करना चाहती थी  यह काम सरकार तभी कर सकती थी जब यह  पूंजी उनके नियंत्रण में हो। सरकार चाहती थी कि बैंकिंग व्यवस्था भारत के छोटे-छोटे गांव तक पहुंचे और निजी  बैंक ऐसा करने के लिए उत्सुक नहीं थे और सरकार उन्हें ऐसा करने के लिए तभी मजबूर कर सकती थी जब वे सीधे सरकार के नियंत्रण में हो। सरकार चाहती थी कि छोटे एवं मझोले उद्योगों को बैंक का समर्थन मिले । सरकार चाहती थी कि वह जनता के द्वारा बचत किए हुए पैसे का उपयोग  राष्ट्र के काम में लगा सके और इसके लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण आवश्यक मानती थी।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के कई फायदे हुए।बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात बैंकों में बचत की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई। कमजोर तबके को कर्ज दिया गया। बैंकों में कर्ज की विविधता बढ़ने  से इसमें होने  वाले जोखिम में कमी आई। छोटे उद्योगों पर ध्यान दिया गया।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के कई नुकसान भी हुआ जैसे कि: बैंकों के बीच में प्रतियोगिता  कम हो गई( परंतु आज ऐसी स्थिति नहीं है क्योंकि कई निजी क्षेत्र के बैंक आप बाजार में वापस से उपस्थित है),बैंकों की दक्षता में कमी आई। कभी-कभी बैंकों का राजनीतिक उपयोग किया जाने लगा।

  1. परमाणु परीक्षण:

 पोखरण प्रथम:

भारत एक बहुत बड़ा राष्ट्र है इसीलिए इतनी बड़ी राष्ट्र की सुरक्षा का दायित्व भी बहुत बड़ा है। भारत की ऊर्जा जरूरतों एवं इसकी सुरक्षा को लेकर भारत सरकार का हमेशा से ही यही दृष्टिकोण रहा है कि भारत के पास इतनी बड़ी जनसंख्या को सुरक्षित रखने के लिए परमाणु छतरी होनी चाहिए। इस लक्ष्य के लिए कदम डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा के समय से ही लिए जा रहे थे।

भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण 18 मई 1974 को किया ,परमाणु परीक्षण राजस्थान के पोखरण में किया गया था। पोखरण वही जगह है जो भारत के भविष्य में एक और परमाणु परीक्षण का गवाह बनने वाली थी। भारत संयुक्त राष्ट्र  सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्यों के अलावा परमाणु परीक्षण करने वाला पहला देश था। भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस परमाणु परीक्षण का उद्देश्य शांतिपूर्ण है। इस पूरे  ऑपरेशन को ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा का नाम दिया गया था।

पोखरण  द्वितीय:

भारत ने 11 एवं 13 मई 1998 को  पोखरण में पांच और परमाणु परीक्षण किए। इस बार ऑपरेशन का नाम ऑपरेशन शक्ति था। इस परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर बहुत सारे प्रतिबंध लगा दिए गए। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसका किसी और देश पर हमला करने का कोई उद्देश्य नहीं है इसीलिए भारत ने अपनी परमाणु डॉक्ट्रिन घोषित की और वह इस तरह से है कि भारत कभी किसी देश पर पहला परमाणु हमला नहीं करेगा परंतु अगर उस पर हमला किया गया तो वह इसका जवाब अपनी पूरी ताकत के साथ देगा। इसके साथ ही तब के प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी कि भारत आज के बाद कभी परमाणु परीक्षण नहीं करेगा ताकि दुनिया इस बात को लेकर आश्वस्त हो जाये  कि  हथियारों  की नई दौड़ चालू नहीं होगी।

  1. इमरजेंसी:

25 मार्च 1975 को  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अनुशंसा को स्वीकार करते हुए तब के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आर्टिकल 352 लागू कर दिया जो कि इमरजेंसी लागू करने का आर्टिकल है। आपातकाल या इमरजेंसी अगले 21 महीनों तक चली जब तक कि इसे 21 मार्च  1977 को इसे वापस नहीं ले लिया गया।

इमरजेंसी को भारतीय गणतंत्र पर एक दाग माना जाता है। इस इमरजेंसी को लगाने के पीछे  विशेषज्ञ कुछ तर्क देते हैं  जैसे कि तब की राजनीतिक स्थिति बहुत खराब थी पूरे देश में तब  की सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे थे एवं कानून व्यवस्था खराब हो रही थी। इसके साथ ही राजनारायण केस में इंदिरा गांधी जो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री थी के खिलाफ निर्णय आ गया था जिसके परिणाम स्वरुप उन्हें प्रधानमंत्री पद का त्याग करना होता।

इमरजेंसी के दौरान विपक्ष के बहुत बड़ी संख्या में नेताओं को जेल में डाल दिया गया। लोगों को मौलिक अधिकार से वंचित रखा गया  जबलपुर  एडीएम केस  इसका गवाह है।  जनता पर कई अत्याचार हुए जिसमें नसबंदी सबसे प्रमुख है।

इमरजेंसी की घटना भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। इमरजेंसी का परिणाम यह हुआ कि इमरजेंसी के बाद तुरंत हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार हुई और विपक्षी दल अब सरकार में आ गए थे और उन्होंने बहुत से ऐसे कानूनों का निर्माण किया जिसके फलस्वरूप अगली बार इमरजेंसी लगाना अत्यंत कठिन होगा।

6. ऑपरेशन ब्लू स्टार एवं इंदिरा गांधी की हत्या:

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को 1984 के जून महीने में अंजाम दिया। स्थिति कुछ ऐसी थी कि सिख  उग्रवादियों ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया था एवं  उग्रवादियों को यहां से हटाने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया और इस ऑपरेशन के दौरान स्वर्ण मंदिर को काफी नुकसान हुआ। उग्रवादियों ने इसका उपयोग सिखों को  भारत के खिलाफ भड़काने के लिए किया और खालिस्तान की मांग तेज कर दी। उग्रवादी  अब आतंकवादी बन चुके थे और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुछ भी करने को तैयार थे जिसका परिणाम यह हुआ कि इंदिरा गांधी की हत्या उन्हीं के सुरक्षा में लगे सिख  सिपाहियों ने कर दी ।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सिख विरोधी दंगे हुए,कई बेगुनाह सिख मारे गए।

  1. उदारीकरण: उदारीकरण के विषय में हम भारतीय अर्थव्यवस्था वाले हिस्से में पहले ही पढ़ चुके हैं।

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