भारत का इतिहास ( एक नजर में ) History of India In Hindi

हमने इस लेख में आपको भारत के संपन्न इतिहास से अवगत कराने का एक ईमानदार प्रयास किया है। भारत जितना बड़ा देश है इसका इतिहास भी उतना ही पुराना है। भारत के संपूर्ण इतिहास को किसी भी लेख में एक साथ लाना असंभव कार्य है, इसलिए हमने भारतीय इतिहास के विभिन्न कालों के महत्वपूर्ण साम्राज्यों  एवं तात्कालिक महत्वपूर्ण घटनाओं को इस लेख में शामिल किया है।

bharat ka itihas

भारत का इतिहास मोटे तौर पर तीन कालों में बांटा गया है हम एक के बाद एक इन कालों एवं कालों में उपस्थित महत्वपूर्ण साम्राज्यों एवं घटनाओं पर नजर डालेंगे।

  1. प्रागैतिहासिक  एवं प्राचीन भारत।
  2. मध्यकालीन भारत।
  3. आधुनिक भारत।

प्रागैतिहासिक एवं प्राचीन भारत का इतिहास –

हमें आगे बढ़ने से पूर्व  यह समझना होगा कि प्रागैतिहासिक  भारत  एवं प्राचीन भारत में क्या फर्क है। प्रागैतिहासिक  भारत , भारतीय इतिहास का वह हिस्सा है जिसका कोई लिखित वर्णन नहीं है एवं प्राचीन भारत इसके पश्चात आता है एवं 1200 ईसवी तक चलता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय उपमहाद्वीप में इंसानों  का आगमन लगभग 5 लाख वर्ष पूर्व हुआ।प्रागैतिहासिक भारत को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है पहला पाषाण युग, दूसरा कांस्य युग  एवं तीसरा लौह युग।ऐसा माना जाता है कि उस समय का समाज घुमंतू प्रवृत्ति का समाज था जो शिकार एवं अन्न  की तलाश में घूमता रहता था। इस तरह की व्यवस्था में परिवर्तन तब आता है जब भारत में कृषि का आगमन होता है, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कृषि का आगमन  8000 वर्ष पूर्व हुआ।

सिंधु घाटी की सभ्यता :-  सिंधु घाटी की सभ्यता भारत के उत्तरी हिस्से में उपस्थित एक सभ्यता थी जिसका काल 3300 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व  तक का माना जाता है। यह सभ्यता सिंधु  नदी के मैदानों में उपस्थित थी जो काफी उपजाऊ थे। ऐसा माना जाता है कि दर्जनभर शहरों का विकास ईसा पूर्व 2500 के आसपास हुआ।

खुदाई के बाद इस सभ्यता के दो शहरों के बारे में स्पष्ट तौर पर पता चलता है वे दो शहर है मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा। खुदाई में पाए गए अवशेषों से पता चलता है कि यह शहर काफी आधुनिक  व्यवस्था वाले शहर थे, इन शहरों में उपस्थित मकानों मे  कुएं मिलते हैं, मकानों में स्नानगाह बनी हुई है ,यही नहीं इन शहरों में पानी को शहर से बाहर निकालने के लिए नालियों की अत्यंत  विकसित व्यवस्था के प्रमाण मिले हैं। इस बात के स्पष्ट प्रमाण है कि इस समय के लोगों को लिपि का ज्ञान था, अवशेषों से स्पष्ट है कि  तब तक लेखन प्रणाली का विकास हो चुका था  परंतु आज तक विशेषज्ञ  इस लिपि को समझ नहीं पाए हैं  और इसी कारण   से सिंधु घाटी की सभ्यता के विषय में कई बातें आज भी रहस्य बनी हुई है। यह बात भी आज तक रहस्य ही बनी हुई है कि यह जो शहर थे यह आपस में जुड़े हुए थे या फिर अपने-आप में स्वतंत्र राज्य थे।  जब तक सिंधु घाटी की सभ्यता की लिपि के रहस्य को हम समझ नहीं पाते तब तक यह सारी घटनाएं रहस्य ही बनी रहेंगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि लगभग 1820 ईसा पूर्व के आसपास सिंधु घाटी की सभ्यता का पतन शुरू हो गया वैसे तो इस बात के बारे में विशेषज्ञों में आपस में काफी मतभेद है कि इस पतन का कारण क्या था पर वह कारण कुछ इस तरह से हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के पतन का मुख्य कारण सरस्वती  नदी का खत्म हो जाना है, वहीं कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इस समय एक भयानक बाढ़ आई थी जिसने कृषि व्यवस्था को नष्ट कर दिया एवं उसके पश्चात सिंधु घाटी की सभ्यता का पतन हो गया।

वैदिक काल ( 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) :- ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म के सबसे पुराने ग्रंथ वेद इसी काल के दौरान लिखे गए थे इसीलिए इसे वैदिक काल कहा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैदिक सभ्यता उत्तरी एवं उत्तर पूर्वी भारत में स्थित थी। विशेषज्ञों   के इस काल की शुरुआत के विषय में आपस में काफी मतभेद हैं क्योंकि बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि इस काल की शुरुआत आर्यन आक्रमण के साथ हुई वहीं कुछ लोगों का मानना है कि आर्यन आक्रमण जैसी कोई चीज कभी हुई ही नहीं एवं आर्य हमेशा से भारत में मौजूद थे। आर्य आक्रमण का सिद्धांत कहता है कि लगभग  1500  ईसा पूर्व  जब भारत में सिंधु घाटी की सभ्यता अपने ढलान पर थी तब आर्यों ने इस धरती पर आक्रमण किया। वैदिक काल का अंत 16 महाजनपदों के उदय के साथ हुआ।

16 महाजनपद :- इस साल की शुरुआत 600 ईसा पूर्व के आसपास मानी जाती है। इस काल में भारत मुख्यतः 16 साम्राज्यों में बंटा हुआ था।यह साम्राज्य कुछ इस तरह से थे।

  1. काशी – इसकी राजधानी बनारस थी, यह साम्राज्य गंगा एवं गोमती नदी के बीच में  स्थित था। सरल शब्दों में आज के वाराणसी के आसपास।
  2.  कौशल – इस राज्य की राजधानी सार्वस्ती थी ।आज के भारत के संदर्भ में यह साम्राज्य पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्थित था।
  3. अंग – इस साम्राज्य की राजधानी चंपा थी। आज के भारत के संदर्भ में यह इलाका बिहार के मुंगेर एवं भागलपुर के आसपास का है।
  4.  मगध:यह उस समय के भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य था इस की प्राचीन राजधानी राजगीर थी। इसके अंदर पटना, गया, शाहाबाद  आदि  के इलाके आते थे।
  5. विरजी – इसकी राजधानी वैशाली थी    यह साम्राज्य बिहार में गंगा के उत्तरी मैदानों पर स्थित था।
  6. मल्ल – इसकी राजधानी कुशीनगर थी, आज के भारत  के संदर्भ में यह इलाका देवरिया, बस्ती ,गोरखपुर का इलाका है।
  7. चेदी  – इस साम्राज्य की राजधानी सूक्तिमति थी ।आज के भारत के संदर्भ में यह इलाका बुंदेलखंड के आसपास का इलाका था।
  8. वत्स – इसकी राजधानी कौशांबी थी, आज के भारत के संदर्भ में यह इलाका उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर एवं इलाहाबाद के आसपास का इलाका है।
  9. कुरु – इसकी राजधानी इंद्रप्रस्थ था, यह इलाका आज के हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के सीमांत इलाकों वाला है।
  10. पंचाल – इस साम्राज्य की  दो राजधानियां थी पहली अच्छित्र एवं  दूसरी काम्पिल्य । इसका इलाका आज के भारत के रोहिलखंड का इलाका है।
  11.  मत्स्य – इस साम्राज्य की राजधानी विराटनगर थी। यह साम्राज्य आज के भारत के राजस्थान में  स्थित था।
  12.  सुरासेना – इस साम्राज्य की राजधानी मथुरा थी और इस का इलाका मथुरा के आसपास का इलाका था।
  13.  अस्सका – इस साम्राज्य की राजधानी पोटली थी। यह इकलौता ऐसा साम्राज्य था जो विंध्य के दक्षिण में स्थित था इसलिए ऐसेदक्षिण पद भी कहते हैं।
  14. अवंती – इसकी  दो राजधानियां थी विंध्य के उत्तर में उज्जैन एवं विंध्य के दक्षिण में महिष्मति।
  15. कंधार – इस साम्राज्य की राजधानी तक्षशिला थी जो आज का बल एवं रावलपिंडी के बीच मौजूद है इसके इलाकों में काबुल रावलपिंडी पेशावर  के इलाके आते थे।
  16. काम्बोजा  – इसकी राजधानी राजगीर थी एवं यह  आज के भारत के कश्मीर के आसपास के इलाकों में स्थित था।

मौर्य साम्राज्य :-  मौर्य साम्राज्य का काल 322 ईसा पूर्व से 185 ईसा पूर्व के बीच का माना जाता है। मौर्य साम्राज्य का उदय मगध साम्राज्य पर  इसकी  विजय के पश्चात हुआ। अपने शिखर काल में मौर्य साम्राज्य  लगभग पूरे भारत से लेकर आधुनिक ईरान के कुछ भागों तक फैला हुआ था। मौर्य साम्राज्य की शुरूआत चंद्रगुप्त मौर्य के साथ होती है और यह साम्राज्य सम्राट अशोक के समय अपने शिखर पर  पहुंचता है।  मौर्य साम्राज्य के प्रमुख शासक कुछ इस तरह से हैं।

चंद्रगुप्त मौर्य :- मौर्य साम्राज्य की शुरूआत चंद्रगुप्त मौर्य एवं कौटिल्य के साथ होती है। यह वह समय था जब अलेक्जेंडर भारत से लौट चुका था तब चंद्रगुप्त एवं कौटिल्य ने मिलकर एक सेना का गठन किया एवं मगध साम्राज्य से  युद्ध करने का निश्चय किया। इस जगह पर मगध साम्राज्य के बारे में समझना अत्यंत आवश्यक है मगध  साम्राज्य तत्कालीन भारत का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था, मगध साम्राज्य इतना शक्तिशाली था कि उस समय  दुनिया की सबसे  सफल सेना, जोकि अलेक्जेंडर की सेना थी  ने  मगध साम्राज्य पर हमला करने से मना कर दिया था एवं अपनी सेना के इस निश्चय के कारण ही अलेक्जेंडर को वापस बेबिलोन की ओर लौटना पड़ा था। मगध साम्राज्य का शासक उस समय धनानंद था  जोकि नंद वंश का शासक था। चंद्रगुप्त की सेना ने कौटिल्य के निर्देश पर मगध साम्राज्य पर विजय प्राप्त की एवं अपने मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।

बिंदुसार :- चंद्रगुप्त मौर्य 24 साल शासन करने के पश्चात मृत्यु को प्राप्त हुआ एवं उसके बाद चंद्रगुप्त मौर्य की गद्दी  पर उसका बेटा बिंदुसार बैठा यह घटना 298 ईसा पूर्व की है।बिंदुसार ने  चंद्रगुप्त के द्वारा सौंपे गए इलाकों में कई और इलाके मौर्य साम्राज्य में मिलाये । ऐसा माना जाता है कि बिंदुसार का शासन मौर्य साम्राज्य पर लगभग 25 वर्षों तक रहा।

अशोक :- अशोक को इतिहास चंड अशोक के नाम से भी याद करता है एवं  महान अशोक के नाम से भी जाना जाता है। अशोक के बारे में यह कहा जाता है कि भी आज तक के भारत के सबसे महानतम सम्राट थे। अशोक के 2 नामों का कारण दो विभिन्न कालों से है। माना जाता है कि कलिंग के युद्ध के पहले जिसमें हजारों लोगों की मृत्यु हुई थी एक अलग अशोक था जो किसी भी तरह अपने साम्राज्य में विस्तार करना चाहता था।वहीं कलिंग के युद्ध के पश्चात का अशोक वह अशोक है जो मानव कल्याण के मूल्यों को भारत में स्थापित करने के लिए जाना जाता है।

 सम्राटशासनकाल शुरूशासनकाल अंत
चन्द्रगुप्त322 ईसा पूर्व298 ईसा पूर्व
बिन्दुसार298 ईसा पूर्व272 ईसा पूर्व
अशोक273 ईसा पूर्व232 ईसा पूर्व
दशरथ232 ईसा पूर्व224 ईसा पूर्व
सम्प्रति224 ईसा पूर्व215 ईसा पूर्व
सलिसुका215 ईसा पूर्व202 ईसा पूर्व
देववर्मन 202 ईसा पूर्व195 ईसा पूर्व
सताधनवान195 ईसा पूर्व187 ईसा पूर्व
बृहद्रथ187 ईसा पूर्व185 ई.पू.

सातवाहन साम्राज्य (230 ईसा पूर्व ) :- सातवाहन साम्राज्य का उदय मौर्य साम्राज्य के पतन की शुरुआत के साथ हुआ। सातवाहन साम्राज्य एक  बड़ा संघ राज्य है जिसकी  पहुंच तत्कालीन भारत के कई हिस्सों में थी। यह साम्राज्य लगभग 450 वर्षों तक  रहा  क्योंकि इस साम्राज्य का कभी पूरे भारत पर कब्जा नहीं था इसलिए हम इसके विभिन्न शासकों के बारे में बात नहीं करेंगे। इस साम्राज्य के काल में बौद्ध धर्म का भारत में काफी प्रचार प्रसार हुआ। इस काल  के सिक्कों में राजा का चेहरा होता था।

शक साम्राज्य :- शक साम्राज्य ,साम्राज्य ना होकर कई साम्राज्यों  का समूह था।उत्तर भारत में तक्षशिला का शक साम्राज्य, मथुरा का शक साम्राज्य, उज्जैन का शक साम्राज्य एवं नासिक का शक साम्राज्य। विशेषज्ञों का मानना है कि शक साम्राज्य  की शुरुआत भारत में नहीं हुई थी परंतु वे ऐसा मानते हैं कि यह लोग ईरान से भारत आए थे।

कुषाण साम्राज्य :- इस साम्राज्य का उदय 50 ईसा पूर्व के आसपास का माना जाता है।ऐसा माना जाता है कि कुषाण साम्राज्य का उदय आज के अफगानिस्तान में हुआ परंतु जब अन्य  किसी शक्ति ने अफगानिस्तान में इनकी जगह ले ली तो इन्होंने भारत की ओर अपने कदम बढ़ाए।

गुप्त साम्राज्य :- 320 ईसवी  से 550 ईसवी : गुप्त साम्राज्य के काल को भारत का स्वर्णिम काल भी कहा जाता है।असम राज्य के  तीन प्रमुख शासक कुछ इस तरह से हैं।

चंद्रगुप्त प्रथम( 320 से 335 ईसवी): वैसे तो गुप्त साम्राज्य चंद्रगुप्त प्रथम के आने के पूर्व भी काफी शक्तिशाली साम्राज्य था परंतु चंद्रगुप्त प्रथम ने  काफी तेजी से उत्तर भारत के बड़े हिस्सों  को गुप्त साम्राज्य में मिलाना आरंभ किया और वह तब तक उत्तर भारत पर कब्जा करते रहा जब तक कि वह भारत का सबसे बड़ा शासक नहीं बन गया।इतिहासकारों का मानना है कि चंद्रगुप्त प्रथम के द्वारा इतना बड़ा संघ राज्य बनाने के पूर्व भारत का यह हिस्सा छोटे-छोटे राज्यों में  बटा हुआ था। इतिहासकारों का यह भी मानना है कि चंद्रगुप्त प्रथम के काल से ही भारत  में समृद्धि का काल शुरू होता है जो कि अगले 250 वर्षों तक चलने वाला था  इसीलिए गुप्त वंश के शासन वाले काल को भारत का स्वर्णिम काल भी कहा जाता है।

समुद्रगुप्त( 335  से 375 ईसवी) :- चंद्रगुप्त प्रथम के पश्चात समुद्र गुप्त गुप्त साम्राज्य का शासक बना। समुद्रगुप्त ने पहले उत्तर भारत के बचे हुए राज्यों पर कब्जा किया एवं इसके पश्चात अपनी नजर दक्षिण भारत की ओर की। और जब दक्षिण भारत पर समुद्रगुप्त ने चढ़ाई की  तो इतिहासकारों का मानना है कि उसने ज्यादातर दक्षिण भारतीय हिस्से पर कब्जा कर लिया। समुद्रगुप्त के शासन के दौरान ही गुप्त  साम्राज्य हिमालय से लेकर कृष्णा नदी तक फैला हुआ था।समुद्रगुप्त के बारे में यह मशहूर था कि वह एक  महान सैनिक था परंतु बात यही नहीं रुकती है समुद्रगुप्त कौटिल्य के द्वारा लिखे गए ग्रंथ अर्थशास्त्र की बहुत इज्जत करता था एवं उसने पूरी कोशिश की कि अर्थशास्त्र को उसके शासन वाले हिस्से में  क्रियान्वित किया जाए।

चंद्रगुप्त द्वितीय :- चंद्रगुप्त द्वितीय के  गुप्त वंश का शासक बनने की कहानी अत्यंत रोचक है। इतिहासकारों के अनुसार समुद्रगुप्त के पश्चात उसका सबसे बड़ा बेटा रामगुप्त  शासक बना परंतु राम गुप्त मथुरा के राजा से युद्ध हार गया  और मथुरा का राजा  रामगुप्त  से ना केवल उसकी जमीन मांग रहा था बल्कि उसकी पत्नी ध्रुव देवी भी मांग रहा था,रामगुप्त ने शांति बनाए रखने के लिए अपनी पत्नी ध्रुव  देवी  मथुरा के राजा को दे दी ।रामगुप्त  के छोटे भाई चंद्रगुप्त द्वितीय को यह पसंद नहीं आया ,चंद्रगुप्त द्वितीय  भेष बदलकर मथुरा गया  एवं मथुरा के राजा की हत्या कर ध्रुव देवी को वापस लेकर आ गया । ध्रुव देवी ने वापस आकर रामगुप्त  कि  भर्त्सना की , जिसके फलस्वरूप रामगुप्त  जनता के बीच अत्यंत  आलोकप्रिय हो गया।इसके कुछ समय पश्चात ही  चंद्रगुप्त प्रथम ने उसकी  हत्या कर दी एवं गुप्त साम्राज्य को अपने शासन में ले  लिया।

चंद्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त साम्राज्य को पश्चिमी तट में अरब सागर तक पहुंचा दिया।चंद्रगुप्त द्वितीय को अपने बहादुरी भरे कामों के लिए विक्रमादित्य की उपाधि दी गई।

हुण :- हुण मध्य एशिया से भारत की तरफ आए एवं उन्होंने तत्कालीन गुप्त साम्राज्य के प्रभुत्व को खत्म कर दिया।

हर्ष साम्राज्य: हर्ष साम्राज्य का काल 606 से 647 ईसवी तक का माना जाता है। हर्ष साम्राज्य मुख्यतः एक शासक के लिए जाना जाता है जिसका नाम था हर्षवर्धन। राजा हर्षवर्धन ने 606 से 647 ईसवी तक 41 वर्षों के लिए  राज  किया। इस साम्राज्य की राजधानी कन्नौज  थी।

बादामी चालुक्य साम्राज्य :- इस साम्राज्य ने मध्य एवं दक्षिण भारत के ज्यादातर हिस्से पर राज किया। बादामी  चालुक्य साम्राज्य के अवशेष आपको आज भी उन मंदिरों में मिल जाएंगे जो इस के शासकों ने भगवान शिव के लिए बनाए थे।

राष्ट्रकूट साम्राज्य :- राष्ट्रकूट साम्राज्य की नींव  753  ईसवी में पड़ी, यह साम्राज्य अगले 200 वर्षों तक मजबूत बना रहा इसके प्रमुख शासक कुछ इस तरह से हैं। कृष्णा प्रथम, गोविंदा द्वितीय,  ध्रुव ,गोविंदा तृतीय,अमोघवर्षा प्रथम, कृष्णा द्वितीय,  इंद्र रतिया, कृष्णा  तृतीय।

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य :- गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का काल सातवीं शताब्दी के मध्य से 11वीं शताब्दी के मध्य तक रहा। इस साम्राज्य में उत्तर भारत के बहुत बड़े हिस्से पर अपना कब्जा बनाए रखें एवं  इतिहासकारों का मानना है कि गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य ने पश्चिम से आने वाले अरब  आक्रमणकारियों  के कई आक्रमण को विफल किया।

चोल साम्राज्य :- चोल साम्राज्य भारत के प्रमुख साम्राज्य में  930 ईसवी के आसपास शामिल हुआ। चोल साम्राज्य का प्रभुत्व कावेरी नदी के आसपास के इलाकों में था। ऐसा माना जाता है कि चोल साम्राज्य के काल में तमिल साहित्य  ने काफी तरक्की की।

चौहान साम्राज्य :- पृथ्वीराज चौहान इसी साम्राज्य से आते थे एवं   इस साम्राज्य का इलाका दिल्ली के आसपास का इलाका था। पृथ्वीराज चौहान  मुस्लिम शासकों के भारत में आने के पूर्व  अंतिम हिंदू शासक थे जिन्होंने दिल्ली पर शासन किया इसके पश्चात  हेमू  ने इसके लगभग 350 वर्ष बाद दिल्ली पर शासन किया  और वह शासन केवल कुछ दिनों का ही था इसीलिए पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का अंतिम हिंदु  शासक माना जाता है।

मध्यकालीन भारत का इतिहास

गुलाम वंश( 1206 ईसवी से 1290 ईसवी) :- गुलाम वंश की नीव  1206 ईसवी  में मोहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद पड़ी। मोहम्मद गौरी की मृत्यु के पश्चात, कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली की गद्दी पर बैठा जिसे मोहम्मद गौरी ने अपने जीवन काल के दौरान भारत का शासक नियुक्त किया था। मोहम्मद गौरी की मृत्यु के पश्चात कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर दिया और यहां से गुलाम वंश की नींव पड़ी  जो कि 1290 ईसवी तक चली।वैसे तो गुलाम वंश के कई शासक हुए परंतु इनमें से सबसे प्रमुख हैं कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रजिया सुल्तान , बलवन ।

कुतुबुद्दीन ऐबक :- जैसा कि हम जानते ही हैं कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम वंश की नींव रखी, इसके साथ ही उसे दिल्ली सल्तनत की नींव रखने का श्रेय  भी दिया जा सकता है इसके अलावा कुतुबुद्दीन ऐबक ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिसके लिए उसे याद रखा जाए।

इल्तुतमिश :- वैसे तो 1210 में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के पश्चात आराम शाह  दिल्ली का सुल्तान बना परंतु 1 वर्ष के भीतर ही 1211 में इल्तुतमिश ने उसे हटा कर खुद दिल्ली की गद्दी पर अपना कब्जा कर लिया। इल्तुतमिश गुलाम वंश के सबसे काबिल शासकों में से एक था उसने 1211 ईसवी  से 1236 ईसवी तक शासन किया।

रजिया सुल्तान :- वैसे तो इल्तुतमिश के बाद रुकउद्दीन  सुल्तान बना परंतु उसका शासन केवल 7 महीनों तक ही चल  सका । उसके पश्चात दिल्ली की सल्तनत पर रजिया सुल्तान का कब्ज़ा  रहा। ऐसा माना जाता है कि  रजिया सुल्तान एक काबिल शासक थी और शुरुआत में तो  रजिया सुल्तान ताकतवर सरदारों के बीच काफी लोकप्रिय थी परंतु बाद में यह  लोकप्रियता, अलोकप्रियता में बदल गई जब  रजिया सुल्तान की एक अफ्रीकी सरदार से करीबी की खबरें आई। रजिया सुल्तान दिल्ली की पहली महिला शासक थी एक प्रकार से कहा जाए तो रजिया सुल्तान के बाद भारत  पर राज करने वाली पहली महिला इंदिरा गांधी थी।

बलवन :- वैसे तो रजिया सुल्तान के बाद मोहिद्दीन बहाराम, अलाउद्दीन मसाद, नासिर उद्दीन  दिल्ली की गद्दी में बैठे हैं पर इनमें से किसी ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसके  लिए उन्हें याद रख सकें। रजिया सुल्तान के बाद गुलाम वंश का सबसे प्रमुख शासक बलवन था,बलवन ने  1266 ईसवी  से 1287 ईसवी  तक लगभग 20 सालों के लिए दिल्ली की सल्तनत पर शासन किया।

खिलजी वंश( 1290 ईसवी  से 1320 ईसवी ) :- वैसे तो खिलजी वंश ने केवल 30 वर्षों तक राज किया परंतु इस दौरान उनका कब्जा ना सिर्फ उत्तर भारत के बड़े हिस्से में रहा बल्कि उनका असर दक्षिण भारत तक भी पहुंच गया। खिलजी वंश की स्थापना जलालुद्दीन खिलजी ने की और दिल्ली सल्तनत  पर राज करने वाला दूसरा  वंश खिलजी वंश बन गया। खिलजी वंश के चार शासक हुए जलालुद्दीन खिलजी जिसने 1290 से 1296 ईसवी  तक राज किया, अलाउद्दीन खिलजी जिसने 1296 से 1316 तक राज किया, साहेब  उद्दीन उमर जिसने 4 महीनों के लिए 1316 ईसवी  में राज किया एवं कुतुबुद्दीन मुबारक जिसने   के1316 से 1320 ईसवी तक राज किया।

तुगलक वंश :- तुगलक वंश का राज 1320 ईसवी  में शुरू हुआ जो 1413 तक चला। तुगलक वंश के दो प्रमुख शासक मोहम्मद बिन तुगलक एवं फिरोजशाह तुगलक थे।  मोहम्मद बिन तुगलक ने 1324 से 1351 तक राज किया उसका सारा कार्यकाल विद्रोह दबाते ही बीत गया, मोहम्मद बिन तुगलक ने वैसे तो कई युद्धों में विजय प्राप्त की परंतु मोहम्मद बिन तुगलक अपनी  गलतियों के लिए ज्यादा मशहूर है इनमें सबसे प्रमुख है राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद ले जाने का निर्णय। तुगलक वंश का दूसरा महत्वपूर्ण शासक है फिरोजशाह तुगलक जिसने 1351 ईसवी  से 1388 ईसवी  तक राज किया।

सैयद  वंश :- इस वर्ष की शुरुआत तुगलक वंश के पतन के साथ होती है। इसका पहला शासक काजीर  खान था,दूसरा शासक मुबारक शाह  था एवं अंतिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह था जिसके साथ ही 1451 ईसवी में इस वंश का अंत हो गया।

लोधी वंश :- लोधीवंश की शुरुआत सैयद वंश के अंत के साथ हुई, लोधीवंश की ओर से सिकंदर लोधी ने शासन किया एवं उसके पश्चात उसका पुत्र इब्राहिम लोधी ,लोधी वंश का सुल्तान बना। इब्राहिम लोधी के कार्यकाल के दौरान ही पानीपत की पहली लड़ाई हुई। भारत के इतिहास को नई दिशा देने वाली तीन लड़ाइयां पानीपत में हुई जिसमें से इब्राहिम लोधीऔर मुगल बादशाह बाबर के बीच हुई लड़ाई  पहली लड़ाई है। पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने इब्राहिम लोधी को हराकर लोधीवंश का अंत कर दिया और मुगल वंश की नींव डाली।

सूरी वंश :- शेरशाह सूरी ने बाबर के पुत्र हुमायूं को हराकर दिल्ली की गद्दी पर कब्जा कर लिया। शेरशाह सूरी के बारे में कहा जाता है  वह अत्यंत  ही काबिल शासक था उसी के दौरान ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण हुआ।

मुगल साम्राज्य :- मुगल साम्राज्य दो कालों  में बटा है पहला 1526 से 1540 तक जब बाबर एवं बाबर के पश्चात हुमायूं मुगल साम्राज्य के शासक थे, शेरशाह सूरी से पराजय के पश्चात वे कुछ दिनों के लिए दिल्ली की सत्ता से बाहर रहे परंतु  1555 से 1557 के बीच में मुगल साम्राज्य ने पुनः दिल्ली पर कब्जा कर लिया  और तब से लेकर 1857 तक मुगल साम्राज्य दिल्ली की गद्दी पर रहा। वैसे तो मुगल साम्राज्य दुनिया के सबसे लंबे समय तक चलने वाले साम्राज्य में से एक है और इसके कई  शासकों ने भारत पर राज किया परंतु हम इसके प्रमुख शासकों पर ध्यान देंगे जो विभिन्न  परीक्षाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है  और यह शासक है  बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब और अंतिम शासक बहादुर शाह जफर।

बाबर :- मुगल साम्राज्य की शुरूआत बाबर ने अब्राहिम लोधी पर 1526 ईसवी में पानीपत की लड़ाई के पश्चात होती है। ऐसा माना जाता है कि  दौलत खां लोधी ने  बाबर को इब्राहिम लोधी पर आक्रमण के लिए आमंत्रण दिया था।बाबर के शासनकाल की अगली महत्वपूर्ण घटना राणा सांगा से खानवा की लड़ाई थी जिसमें उन्होंने राणा सांगा को   हराया। 26 दिसंबर 1530  को बाबर की  आगरा में मृत्यु हो गई है और उसके पश्चात हुमायूं मुगल  बादशाह बना। यहां पर अत्यंत रोचक बात यह है कि बाबर ने मरने से पहले जब हुमायूं को एक पत्र लिखा तो उसने हुमायूं को निर्देश दिया कि अगर तुम्हें भारत पर शासन करना है तो हिंदुओं से अच्छे रिश्ते बनाकर रखने होंगे और तुम्हें यह ध्यान रखना होगा कि उनकी किसी भी धार्मिक भावनाओं को किसी भी तरह से ठेस नहीं पहुंचाई जाए, और तो और उसमें हुमायूं को निर्देश दिया कि मुगल साम्राज्य में किसी भी तरह गौ हत्या नहीं होनी चाहिए।

हुमायूं :- बाबर की मृत्यु के पश्चात हुमायूं दूसरा मुगल बादशाह बना  उसका पहला राज्य 26 दिसंबर 1530 से 17 मई 1540 तक रहा जब उसे शेरशाह सूरी से पराजय के पश्चात दिल्ली की गद्दी छोड़नी पड़ी। हुमायूं ने अगले 15 वर्षों तक विभिन्न युद्ध अभियानों के जरिए अपना खोया हुआ सारा राज्य वापस पा लिया और 1555   तक वह दिल्ली की गद्दी पर वापस आकर बैठ गया था, परंतु इस बार वह कुछ महीनों ही राज कर पाया  27 जनवरी 1556 को  उसकी मृत्यु हो गई।

अकबर :- अकबर भारत के महानतम राजाओं में से एक माना जाता है 14 फरवरी 1556 को 14 वर्ष की उम्र में दिल्ली का बादशाह बना। अकबर के राज के शुरुआती साल उसके रीजेंट  बैरम खान के सानिध्य में बीते  इसी दौरान पानीपत की दूसरी लड़ाई हुई जहां पर अकबर की सेनाओं ने हेमू को हराया।कुछ समय पश्चात अकबर ने बैरम खान को पूरी तरह सत्ता से अलग कर  पूरा मुगल शासन अपने हाथ में ले लिया। अकबर के शासन के दौरान मुगल साम्राज्य का विस्तार चारों तरफ हुआ। अकबर ने राजपूतों के प्रति दुश्मनी की जगह दोस्ती की नीति अपनाई इसी कारण मुगल साम्राज्य में एक नए तरह की विचारधारा का जन्म हुआ जहां पर दूसरे धर्म के लोगों के प्रति काफी   सहिष्णुता बरती गई, और यह नीति आने वाले बादशाहों के दौर में भी चलती रहेगी और इसका अंत  औरंगजेब का शासन काल माना जाता है।  अकबर इस नीति का पक्षधर था और यह  इस बात से जाना जाता है कि उसने जजिया जैसा कर हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जो औरंगजेब  वापस लेकर आया।  अकबर की मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 को  हुई  जिसके पश्चात जहांगीर अगला बादशाह बना।

जहांगीर :- जहांगीर का शासनकाल 3 नवंबर 1605 से 28 अक्टूबर 1627 तक रहा।जहांगीर के शासनकाल के विषय में यह कहा जाता है कि उसके शासनकाल के दौरान नूरजहां का  काफी दखल रहा और इस वजह से शाहजहां और नूरजहां के बीच काफी तनाव रहा। 28 अक्टूबर 1627 को 58 वर्ष की उम्र में जहांगीर की मृत्यु हो गई।

शाहजहां :- जहांगीर की मृत्यु के बाद शहरयार मिर्जा मुगल बादशाह बना , वह अपनी सौतेली मा नूरजहां की मदद से बादशाह बना था परंतु शाहजहां ने उसे लगभग ढाई महीने तक ही बादशाह  रहने दिया और उसे हटाकर  19 जनवरी 1628 को मुगल बादशाह बन गया। शाहजहां  के शासनकाल के दौरान मुगल साम्राज्य में बहुत उन्नति का दौर भी देखा और उसके शासनकाल के अंतिम दौर में   मुगल साम्राज्य में गृह युद्ध भी देखा। शाहजहां ने अपनी मरहूम पत्नी मुमताज महल की याद में आगरा में ताजमहल का निर्माण करवाया। शाहजहां चाहता था कि उसकी मृत्यु के पश्चात उसका चाहता बेटा दारा शिकोह बादशाह बने परंतु औरंगजेब ने दारा शिकोह को हराकर बादशाह की गद्दी हथिया ली और शाहजहां के अंतिम दिन नजर बंद  बादशाह के रूप में बीते।

औरंगजेब :- औरंगजेब का शासनकाल 31 जुलाई 1658 से 3 मार्च 1707 तक रहा। औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मुगल साम्राज्य अब तक सबसे ज्यादा क्षेत्रफल पर  कब्जा किए हुए था। परंतु औरंगजेब की नीतियां ही उसकी मृत्यु के पश्चात मुगल  साम्राज्य का पतन का कारण बनी। जिस धार्मिक सहिष्णुता की नीति के कारण मुगल साम्राज्य को हमेशा हिंदू बहुमत का समर्थन मिलता रहा औरंगजेब ने इस नीति को बदल दिया और इसी के कारण मुगल साम्राज्य के पतन की शुरुआत हुई। औरंगजेब ने अपनी जिंदगी का अधिकतर समय युद्ध लड़ते हुए बताया। औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 में अहमदनगर में हुई।

वैसे तो औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात कई और मुगल शासक हुए परंतु उन्होंने ऐसे कोई भी काम नहीं किया जिनके लिए उन्हें याद रखा जा सके इसलिए हम सीधे मुगल शासन काल के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर की ओर चलेंगे और इस अंतिम मुगल बादशाह के बारे में कुछ जानेंगे।

बहादुर शाह जफर द्वितीय :- औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य लगातार कमजोर होते रहा और एक समय ऐसा आ गया जब मुग़ल साम्राज्य का राज केवल दिल्ली तक रह गया और यहां का शासक मुगल बादशाह जरूर कहलाता पर वह केवल नाम का बादशाह था या फिर दूसरे राज्यों की कठपुतली था कभी वह मराठा राज्य की कठपुतली रहा तो कभी अंग्रेजी राज्य की। ऐसा ही एक  बादशाह था बहादुर शाह जफर ।   1857 के विद्रोह के पूर्व अंग्रेजों की कठपुतली था 1857 के विद्रोह के दौरान विद्रोहियों की कठपुतली था और विद्रोहियो के चले जाने के पश्चात अंग्रेजों ने उसे सजा देकर रंगून पहुंचा दिया  जहां 7 नवंबर 1862 को उसकी मृत्यु हो गई  और मुगल साम्राज्य इतिहास का हिस्सा बन गया।

मराठा साम्राज्य :- छत्रपति शिवाजी ने मराठा साम्राज्य की नींव रखी । औरंगजेब के शासनकाल के दौरान ही मराठा साम्राज्य का उदय शुरू हो गया था परंतु औरंगजेब की मृत्यु के बाद जैसे जैसे मुगल साम्राज्य का पतन बढ़ता गया मराठा साम्राज्य उसकी जगह लेने लगा। मध्य 18वीं शताब्दी आते तक भारत के अधिकतर हिस्सों में या तो मराठा सीधे राज कर रहे थे या उनके द्वारा बिठाए गए राजाओं का राज था इसमें से दिल्ली भी एक था।  शिखर काल में मराठा राज्य पेशावर से शुरू होकर दक्षिण भारत  में तंजावुर तक था ।मराठाओ की इस ताकत को बढ़ाने में शुरुआती  छत्रपतिओं के अलावा आगे चलकर राज करने वाले पेशवा का बहुत बड़ा हाथ था इसमें सबसे महत्वपूर्ण पेशवा थे पेशवा बाजीराव। 1761 में पानीपत के तृतीय युद्ध के साथ मराठा साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। इसके बाद मराठा साम्राज्य ने अंग्रेजों से कई युद्ध किये जिसमें शुरूआती युद्ध को छोड़ कर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। कई मराठा सरदार अंग्रेजों से मिल गए और बाकी मराठा सरदार अंग्रेजों से हार गए। वैसे कहा जाए तो अंतिम मराठा पेशवा नाना साहब 1858 में हारे और इसके साथ ही मराठा साम्राज्य का अंत हो गया, एक रोचक तथ्य यह है कि 1858 में एक और साम्राज्य का अंत हुआ था वह था मुगल साम्राज्य।

आधुनिक भारत का इतिहास 

ब्रिटिश राज :- ब्रिटिश राज को भारत में दो हिस्सों में बांटा जा सकता है पहला हिस्सा वह जहां पर ब्रिटिश राज की तरफ से ईस्ट इंडिया कंपनी भारत पर राज कर रही थी और दूसरा हिस्सा 1857 के विद्रोह के बाद का हिस्सा जहां ब्रिटिश राज ने सीधे शासन अपने हाथ में ले लिया।

ईस्ट इंडिया कंपनी का राज :- ईस्ट इंडिया  कंपनी  वैसे तो भारत में कई वर्षों से व्यापार कर रही थी परंतु भारत की राजव्यवस्था में कंपनी का पहला कदम 1757 में उठा जब उन्होंने बंगाल के नवाब को प्लासी के युद्ध में हराया। इसके पश्चात एक अत्यंत महत्वपूर्ण युद्ध हुआ जो कि 1764 बक्सर का युद्ध था इसके पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी अपने आप में एक बहुत बड़ी ताकत बन चुकी थी जिसने धीरे धीरे करके भारत के अधिकांश हिस्सों को अपने में मिला लिया। इस दौरान ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का विरोध करने वाली सबसे बड़ी ताकतों में दो  ताकते शामिल थी पहला मराठा साम्राज्य एवं दूसरा मैसूर साम्राज्य। मैसूर एवं मराठा साम्राज्य उन गिने-चुने साम्राज्यों  में से  दो हैं जिन्होंने अंग्रेजों को युद्ध के मैदान में हराया।

1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध एक बहुत बड़ा विद्रोह हुआ जिसमें बहुत सारे राज्यों ने आपस में मिलकर अंग्रेजों से सत्ता वापस पाने के लिए एक संघर्ष किया परंतु लगभग 1 वर्ष के समय में अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचल दिया।  परंतु जब यह खबर ब्रिटेन तक पहुंची तो उन्होंने समझा कि इस विद्रोह का मुख्य कारण ईस्ट इंडिया कंपनी का गलत तरीके से शासन करना था और इस  बहाने उन्होंने भारत का शासन सीधे अपने हाथों में ले लिया।

ब्रिटिश राज :- 1857 से लेकर 15 अगस्त 1947 तक भारत में ब्रिटिश राज रहा। इस दौरान कुछ अच्छे कदम उठाए गए जैसे कि हिंदू विडो रीमैरिज एक्ट। परंतु गलत कदमों की तो कोई गिनती ही नहीं थी ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय व्यापार को लगभग नष्ट कर दिया गया इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब ब्रिटिश भारत में आए थे तो दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का हिस्सा 24% था वही जो ब्रिटिश भारत छोड़कर गए तो दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का हिस्सा 2% के आसपास था। भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यात करने वाला देश था जब ब्रिटिश गए दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब देशों में से एक था ।

ब्रिटिश राज्य से स्वतंत्रता दिलाने के लिए कई संस्थाओं ने उनके खिलाफ आंदोलन चलाएं इनमें सबसे प्रमुख थी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसकी स्थापना 1885 में हुई थी। वैसे तो यह कांग्रेस अंग्रेजों से अधिकारियों की लड़ाई चल रही थी परंतु यह लड़ाई तब बदल गई जब महात्मा गांधी उसमें शामिल हुए और इस लड़ाई को नई दिशा 26 जनवरी   1929 को मिली जब लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की घोषणा की गई। इसके पश्चात अंग्रेजों से अहिंसा के माध्यम से स्वतंत्रता की लड़ाई चलती रही  जिसका फल 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के साथ भारत के लोगों को मिला।

किसी भी देश के स्वतंत्र हो जाने से उस देश का इतिहास खत्म नहीं हो जाता स्वतंत्र भारत का इतिहास जाने, यह आपके ज्ञान में निश्चित ही वृद्धि करेगा।

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