भारत का उच्चतम युद्ध क्षेत्र कौन सा है।

विश्व को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा गांधी  की कर्मभूमि भारत शुरू से ही एक शांति प्रिय देश रहा है। इसकी नीति हमेशा दूसरे मुल्कों, खास कर पड़ोसी मुल्कों के साथ मित्रता की रही है। भारत के इस सहनशीलता और मित्रता की नीति को पड़ोसी मुल्कों ने भारत की कमज़ोरी समझने की गलती की जिस की भारी कीमत उन मुल्कों को चुकानी पड़ी। भारत के कमजोर होने की गलतफहमी में पाकिस्तान ने युद्ध ठानी जिसमें उसको बार बार मुंह की खानी पड़ी।

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पाकिस्तान के साथ युद्ध का बड़ा कारण कश्मीर ही रहा है। इन दोनों देशों के बीच आज़ादी के बाद से ही अलग अलग समय पर युद्ध होते ही रहे हैं। इसी में एक युद्ध जो कि काफी लंबे समय तक चला था, वह युद्ध सियाचिन ग्लेशियर पर लड़ा गया था। सियाचिन की चोटी हिमालय की पहाड़ों में स्थित है जो कि समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर स्थित है। काफी ऊंचाई पर स्थित होने के कारण और इस जगह पर युद्ध होने के कारण सियाचिन को भारत का सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित युद्ध क्षेत्र ( Battlefield ) माना जाता है। यह भारत के साथ साथ विश्व में सबसे ऊंचाई पर स्थित युद्ध क्षेत्र में भी  गिना जाता है।

सियाचिन – भारत का सबसे ऊंचाई पर स्थित युद्ध क्षेत्र

  • संक्षिप्त परिचय

सियाचिन ग्लेशियर हिमालय के पूर्वी Karakoram Range में स्थित है। यह काराकोरम में स्थित 5 सबसे ऊंची चोटियों में से सबसे ऊंचा ग्लेशियर  है। साथ ही यह विश्व की दूसरी सबसे ऊंची ग्लेशियर हैं। इसकी कुल ऊंचाई समुन्द्र तल से लगभग 18000 फिट है। इस क्षेत्र का अधिकतर हिस्सा LOC ( Line Of Control ) में पड़ता है। LOC वह हिस्सा है जो कि भारत और पाकिस्तान की सीमाओं को अलग करती है।

सीमाओं को ले कर भारत और पाकिस्तान में परस्पर युद्ध होते रहे। इसी क्रम में 1971 में भी पाकिस्तान ने युद्ध की शुरुआत की जिसका भारत ने मुँहतोड़ जवाब दिया और दुश्मनों को घुटने पर ला दिया। इस युद्ध के बाद दोनों देशों के सीमाओं तथा आपसी मुद्दों को सुलझाने के लिए एक Agreement Sign हुआ। इस समझौते को शिमला समझौता ( Shimla Agreement ) के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के बाद भी सियाचिन ग्लेशियर को ले कर स्थिति साफ नही हो सकी के दोनो में से किस देश का इस ग्लेशियर पर कब्ज़ा होगा।

इसकी ग्लेशियर की स्तिथि साफ नही हुई थी। इसे ले कर इस मामले में मध्यस्थता करने वाले UN के अधिकारियों ने कहा कि सियाचिन जैसे ठंडे और वीरान जगह को ले कर दोनो देशों के बीच कोई समस्या नही होगी। लिकिन उनका ये अनुमान पूरी तरह गलत साबित हुआ। 80 के दशक में पाकिस्तान ने इस ग्लेशियर पर पर्वतारोही, के रूप में अपने सैनिकों को भेजना शुरू कर दिया। पाकिस्तान इसके सहारे इस पूरे इलाके पर कब्ज़ा जमा कर भारत के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने की सोच रहा था।

1984 में पाकिस्तान इस इलाके में अपने सेना की मौजूदगी बढ़ाने लगी तथा वह आगे बढ़ने लगा। इस बात की भनक भारत को लग गयी जिसके जवाब में भारत ने मेघदूत नाम से आर्मी ऑपरेशन चालू किया। यह ऑपरेशन काफी सफल रहा और पाकिस्तान को इस इलाके से खदेड़ कर बड़े इलाके पर भारत ने कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी अलग अलग समय पर दोनो देशों के सैनिकों के बीच झड़प होती ही रही।

यहां भी युद्ध के दौरान पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाना पड़ा और इसके सैकड़ो सैनिक मारे गए।  अन्तः 25 नवंबर 2003 को दोनो देशों ने सहमति से इस इलाके पर युद्ध विराम लागू कर दिया। इसके बाद भी दोनो देश अपने अपने कब्जे वाले क्षेत्र पर लगभग 3000 – 3000 की संख्या में सैनिक तैनात किए हुए है।

सियाचिन ग्लेशियर बहुत ही ठंडा जगह है। इस कारण यहां युद्ध से अधिक, सैनिक ठंड के कारण मारे जाते हैं। अनुमान के मुताबिक दोनो देशों के अबतक लगभग 8 हज़ार से अधिक सैनिक सिर्फ मौसम की मार की वजह से मारे गए हैं। सबसे ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहां सेना के लिये सभी तरह की सेवाएं सिर्फ हवाई मार्ग द्वारा ही पूरी की जाती है। इसलिए भारत ने इस हिस्से पर एक हेलिपैड का भी निर्माण किया हुआ है जो कि विश्व का सबसे अधिक ऊंचाई ओर स्थित हेलिपैड भी है। इस पोस्ट पर रहने वाले सेना के लिए दोनो देश काफी पैसा खर्च करते हैं। भारत सरकार सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात जवानों के सुरक्षा और खाना पर  प्रत्येक दिन लगभग 5 – 6 करोड़ खर्च करती है।

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