भारत के प्रथम सिख प्रधानमंत्री कौन था।

भारत के पहले एवं अभी तक के इकलौते सिख प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह थे । डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के पद पर 22 मई 2004 से 26 मई 2014 तक रहे ।

जन्म एवं आरंभिक career :मनमोहन सिंह का जन्म  26 सितंबर 1932 को  पंजाब के गाह  में हुआ  जो आजकल पाकिस्तान का हिस्सा है । यहां एक अद्भुत बात यह है कि जब डॉ मनमोहन सिंह भारतीय प्रधानमंत्री थे ठीक उसी समय नवाज शरीफ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री थे। दोनों ही पंजाब से आते थे परंतु मनमोहन सिंह आज पाकिस्तान के अंतर्गत आने वाले पंजाब में पैदा हुए थे वही नवाज शरीफ आज भारत के अंतर्गत आने वाले पंजाब में पैदा हुए थे। बचपन में ही डॉ मनमोहन सिंह की मां चल बसी थी। जब भारत पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो डॉक्टर मनमोहन सिंह उन लाखों लोगों में से एक थे जो पाकिस्तान से भारत आए, मनमोहन सिंह का परिवार भारत आकर अमृतसर में बस गया। यहां पहले उन्होंने हिंदू कॉलेज में अपनी पढ़ाई की और बाद में पंजाब यूनिवर्सिटी में जो कि तत्कालीन होशियारपुर में थी, इकोनॉमिक्स की डिग्री  हासिल की । इसके पश्चात  डॉ मनमोहन सिंह ने Cambridge University  से  1957 में Economics में मास्टर की डिग्री हासिल की।  आगे चलकर यही से मनमोहन सिंह ने D.Phil की उपाधि भी प्राप्त की।

Bharat ke pahle sikh pradhanamntri

भारत के प्रथम सिख प्रधानमंत्री का सामान्य जीवन

डी फिल की उपाधि प्राप्त करने के बाद डॉ मनमोहन सिंह ने United Nations में  नौकरी प्राप्त कर ली। उन्होंने यहां पर 1966 से 1969 तक काम किया। तत्कालीन Foreign Trade के मंत्री ललित नारायण मिश्रा ने डॉक्टर मनमोहन सिंह को अपने मंत्रालय में सलाहकार नियुक्त किया। इसके बाद मनमोहन सिंह 1969 से 1971 तक दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जो कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंदर आता है में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पढ़ा रहे थे । 1972 में  डॉ मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त कर दिया गया, 1976 आते-आते तक डॉक्टर मनमोहन सिंह  वित्त मंत्रालय में सेक्रेटरी के पद तक पहुंच गए थे।

इसके पश्चात मनमोहन सिंह को उनके जीवन के अभी तक के सबसे ऊंचे पद Governor of the Reserve Bank of India  पर नियुक्त किया गया। डॉ मनमोहन सिंह 1982 से 1985 तक रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे। इसके पश्चात मनमोहन सिंह  स्विजरलैंड में स्थित एक थिंक टैंक का हिस्सा बन गए परंतु 1990 में उन्हें देश वापस आना पड़ा क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन्हें प्रधानमंत्री का प्रमुख आर्थिक सलाहकार नियुक्त करने के लिए अपने देश बुला लिया। इसके पश्चात डॉ मनमोहन सिंह ने कुछ समय यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के अध्यक्ष के पद पर भी  बिताया ।

वित्त मंत्री मनमोहन सिंह

डॉ मनमोहन सिंह को  जितना कि एक प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है उससे कहीं ज्यादा एक वित्त मंत्री के रूप में याद किया जाता है, क्योंकि उन्होंने वित्त मंत्रालय का प्रभार तब संभाला जब भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था और जब उन्होंने वित्त मंत्रालय छोड़ा तब तक भारत काफी अच्छी आर्थिक स्थिति में पहुंच चुका था। जिसका श्रेय उस समय के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के साथ साथ डॉ मनमोहन सिंह को भी जाता है। 

डॉ मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने की कहानी भी काफी अद्भुत है, हाल ही में मीडिया से  बात करते हुए उन्होंने बताया कि मैं एक एक्सीडेंटल फाइनेंस मिनिस्टर था। इस बात का जिक्र करते हुए डॉ मनमोहन सिंह ने बताया कि उस समय प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की पहली पसंद डॉ मनमोहन सिंह के परम मित्र डॉक्टर आई जी पटेल थे परंतु आई जी पटेल ने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए वित्त मंत्रालय का प्रभार लेने से मना कर दिया, तब जाकर उस समय प्रधानमंत्री को सलाह दे रहे पीसी अलेक्जेंडर डॉ मनमोहन सिंह का नाम सुझाया। इस पर नरसिम्हा राव ने कहा कि जाओ जाकर उनसे पूछ कर आओ कि क्या वे  वित्त मंत्री का पद  संभालने के लिए राजी हैं।  जब पीसी एलेग्जेंडर मनमोहन सिंह से मिलने गए तो वे अपने यूजीसी के ऑफिस में बैठे हुए थे और इस OFFER  को सुनकर उन्होंने कहा  कि वे इसके लिए राजी हैं। परंतु डॉक्टर मनमोहन सिंह ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया, उन्हें लगा कि पीसी एलेग्जेंडर केवल एक औपचारिकता पूरी करने के लिए उनके पास आए हैं और प्रधानमंत्री उन्हें वित्त मंत्रालय देने के लिए गंभीर हो ही नहीं सकते और इस बात को भुलाकर  वे यूजीसी में अपने काम में लग गए।

अगले दिन स्वयं प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का फोन आया और पीवी नरसिम्हा राव ने उनसे पूछा ” कि तुम कहां हो, अभी तक क्यों नहीं आए, क्या तुम्हें अलेक्जेंडर साहब ने नहीं बताया कि तुम्हें कौन सा पद मिलने वाला है? ” डॉ मनमोहन सिंह ने जवाब दिया उन्होंने बताया तो था पर मैंने उसे गंभीरता से नहीं लिया इस पर पी वी नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह को डांटते हुए कहा कि “ तुरंत अच्छे कपड़े पहन कर राष्ट्रपति भवन पहुंच जाओ तुम्हें शपथ लेनी है।” और इस तरह से डॉक्टर मनमोहन सिंह भारत के वित्त मंत्री बने।

 जब  डॉ मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्रालय संभाला तब भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था और इस संकट से उभरने के लिए भारत को तेजी से आर्थिक सुधारों  को अपनाने एवं गति देने की जरूरत थी। डॉ मनमोहन सिंह ने इन आर्थिक सुधारों के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को मना लिया था, परंतु विपक्ष अभी भी डॉ मनमोहन सिंह के इन आर्थिक सुधारों का विरोध कर रहा था इन्हीं  विरोधियों का जवाब देते हुए डॉ मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों के विषय में तब संसद में कहा था “No power on earth can stop an idea whose time has come.”। मनमोहन सिंह ने तेजी से इन सुधारों को लागू करना शुरू किया और जैसे ही इन सुधारों ने अपना असर दिखाना चालू किया तो भारत से धीरे-धीरे license राज खत्म होने लगा और भारत में व्यापार करना आसान होने लगा। भारत में व्यापार की आसान स्थिति को देखकर दुनियाभर से लोग भारत में निवेश करने लगे, इससे भारत का विदेशी मुद्रा (Foreign currency) का संकट खत्म हो गया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने थे तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 2 बिलियन डॉलर के आसपास का था और जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद से गए तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 350 बिलियन डॉलर के आसपास का था।

डॉ मनमोहन सिंह के समय हर्षद मेहता का बड़ा घोटाला भी हुआ इस घोटाले  के जनता के सामने आने के बाद बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश हुआ और पैसा वापस जाने लगा। परंतु मनमोहन सिंह ने इस पैसे को वापस जाने से किसी भी तरह  से नहीं रोका और उनका यह निर्णय सही साबित हुआ क्योंकि जब उन्होंने पैसे को बाहर जाने से नहीं रोका तो बाहर से पैसा लगाने वाले को इस बात का अहसास होने लगा कि भारत में उनका पैसा सुरक्षित है और वे कभी भी इसे निकाल सकते हैं इसीलिए भारत में ज्यादा से ज्यादा investment करने में कोई दिक्कत नहीं है। इस तरह डॉ मनमोहन सिंह ने एक  घोटाले को भी भारत के आर्थिक जगत में चढ़ाने के लिए उपयोग में  लिया।डॉ मनमोहन सिंह कितने सफल वित्त मंत्री  थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के इतिहास में  पहली बार सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7% के ऊपर पहुंची, यही नहीं उनके वित्त मंत्री कार्यकाल के दौरान सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर हमेशा 7% से ऊपर ही  रही ।

प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह : डॉ मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने की कहानी तो आपने  पढ़ ही ली इसी तरह  डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने की कहानी भी काफी अद्भुत है। 2004 के चुनाव के पहले लगभग लगभग सभी यह मान बैठे थे कि अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली सरकार फिर से सत्ता में आएगी। परंतु चुनाव के परिणाम आने के पश्चात यह साफ हो गया कि सोनिया गांधी के नेतृत्व वाला united progressive alliance सबसे आगे है और इस ख़बर के आते ही इस संगठन के सभी सदस्य तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से इस बात की मांग करने लगे कि वे प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करें। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद अस्वीकार करते हुए डॉ मनमोहन सिंह का नाम आगे बढ़ाया और उनका नाम सभी को स्वीकृत कराने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। डॉ मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री कार्यकाल इस बात के लिए जाना जाएगा कि जब मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री का पद ग्रहण किया था तब से लेकर जब उन्होंने प्रधानमंत्री का पद छोड़ा तब तक indian economy का आकार लगभग दोगुना हो गया था। यही नहीं भारतीय अर्थव्यवस्था की औसत वृद्धि दर भी लगभग 7% की थी। उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के अंदर ही Right to Information, right to education ,right to food जैसी चीजें शुरू की गई।

डॉ मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल की लोकप्रियता इस बात से आंकी जा सकती है कि 2009 में जब उनके नेतृत्व में यूपीए ने अपना दूसरा इलेक्शन लड़ा तो पिछली बार से कहीं ज्यादा सीट लेकर फिर से सरकार  बनाई । यूपीए का दूसरा कार्यकाल  समाचारों में कई घोटालों से भरा पड़ा रहा और इसीलिए 2014 में यूपीए की भारी हार हुई  और एनडीए की पुनः सरकार बनी।

डॉ. मनमोहन सिंह का योगदान भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के लिए  सदैव याद किया जाएगा।

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