भारत के पूर्वी समुद्र तट को किस नाम से जाना जाता है।

समुद्री तट ऐसी जगह को कहते है, जहां समुद्र और जमीन मिलते हैं। ऐसी जगहों पर एक तरफ रेत का मैदान होता है वहीं दूसरी तरफ समुद्र का किनारा होता है। समुद्रीय तट पर साल भर छोटी बड़ी लहरें चलती रहती हैं, तथा लहरें तट से टकराती रहती हैं। कुछ समुद्रीय तट ऐसे भी होते हैं जहां रेत नहीं होती है बल्कि पहाड़ और चट्टानें होते है ऐसे तट पर पानी की लहरें और चट्टानों के बीच के टकराव से तेज़ आवाज़ उठती रहती है।

bharat ke samudri tat ka naam kya hai

धरती का 70.8% भाग पर समुद्र फैला हुआ है जिसमें से 14% भाग में हिन्द महासागर है। भारत कुल तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। भारत के कुल 13 राज्यों की सीमाएं समुद्र से लगती है।

भारत के पूर्वी समुद्र तट का नाम –

भारत के पूर्वी समुद्र तट का नाम कोरोमंडल तट है।इसे कोरमंडल भी कहा जाता है। यह दक्षिणी भारत में पूर्वी घाट से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। कोरोमंडल तट  बंगाल की खाड़ी से लेकर कन्याकुमारी तक 100 से 130 किलोमीटर तक की चौड़ाई में फैला हुआ है। कोरोमंडल तट का कुल क्षेत्रफल लगभग 22800 Square kilometres है। इस तट का विस्तार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यो में फैला हुआ है।

भारत के पूर्वी समुद्र तट का नाम कोरोमंडल तट कैसे पड़ा ?

भारत के पूर्वी समुद्र तट का नाम कोरोमंडल तट पड़ने के पीछे एक दिलचस्प इतिहास जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि कोरमंडल तट काफी समय तक चोल राजवंश द्वारा शासित रहा। यहां पर बताते चलें के चोल राजवंश प्राचीन काल में दक्षिण भारत का एक राजवंश था। जिसका शासन दक्षिण भारत में और आस पास के अन्य देशों में लगभग 9वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी तक रहा था।

चोल राजवंश द्वारा शासित चोल क्षेत्र या मंडल को तमिल में चोल मंडलम कहते थे। इस चोल मंडलम का नाम पुर्तगालियों एवं फ्रेंच के लोगों द्वारा बिगाड़ कर कोरमंडल कर दिया गया। एक अन्य शोध के अनुसार इसका नाम कोरमंडल पड़ने की पीछे ये भी कारण बताया जाता है के चोल क्षेत्र के तटीय छेत्र को चोलमंडलम कहते थे। जिसे बाद में बदलकर कोरमंडल कर दिया गया। और तब से भारत के पूर्वी समुद्र तट को कोरमंडल नाम से जाने जाना लगा।

कोरमंडल तट का निर्माण कैसे हुआ ?

कोरमंडल तट का विस्तार पश्चिम बंगाल के हुगली नदी से लेकर तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक है। इस तट पर बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित होने वाली कृष्णा, गोदावरी, महानदी कावेरी जैसी बड़ी बड़ी नदियों के सागर में मिलने से पूर्व, तटीय मैदान में ढाल कम होने के कारण इनका प्रवाह बहुत धीमा हो जाता है। इस कारण ये नदियां जब समुन्द्र के ऊंची ऊंची लहरों से टकराती है तो सैकड़ों धाराओं में बंट जाती है। जिसके परिणामस्वरूप यहां पे छोटे छोटे डेल्टा का निर्माण होता है। ये डेल्टा समुद्र की लहरों  के साथ निरंतर बहते रहते हैं। और इन्हीं डेल्टा से पूर्वी समुद्र (कोरमंडल तट) का निर्माण हुआ है। यह तट कृषि के लिए बहुत उपजाऊ है और इस तट पर धान की उपज बहुत अच्छी  होती है।

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