भारत की सबसे पहली फ़िल्म कौन सी थी।

Film Production के लिहाज से मौजूदा समय में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को भारत ही नही बल्कि विश्व के सबसे बड़े फ़िल्म इंडस्ट्री में से एक माना जाता हैं। भारतीय फिल्म इंडस्ट्री भाषा के आधार पर कई भागो में बंटा हुआ है। जैसे तमिल, तेलुगु, मलयालम इत्यादि भाषाओं समेत सभी क्षेत्रीय भाषाओं की अपनी अपनी इंडस्ट्री हैं। इसी तरह हिंदी भाषा की फिल्मों के लिए Bollywood हैं। Bollywood का गढ़ Mumbai को कहा जाता है।

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भारत में फिल्मों इतिहास सौ साल से भी पुराना हो चुका है। इतने लंबे समय में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने कई अलग अलग रूप देखें। समय के साथ यह इंडस्ट्री भी काफी बदला और अन्य इंडस्ट्री की तरह यह भी तकनीक से लैस हो चुका है। ऐसा समय भी था कब संसाधनों और तकनीक की कमी थी तब से ही यहां फ़िल्म बनाए जा रहे हैं। भारत में फिल्मों के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि भारत में पहली फ़िल्म 1913 में बनी थी। उस फ़िल्म का नाम राजा हरिश्चंद्र था। उस समय तकनीक काफी विकसित नही थे इसलिए भारत की पहली फ़िल्म जो बनी थी वह मूक यानी Silent फ़िल्म थी।

राजा हरिश्चंद्र – भारत की पहली फ़िल्म

  • संक्षिप्त परिचय

भारत में पहली फ़िल्म निर्माण करने का श्रेय दादा साहब फाल्के  को दिया जाता है। फाल्के का जन्म 30 अप्रैल 1870 को तथा मृत्यु 16 फरवरी 1944 को हुई थी। दादा साहेब एक फ़िल्म Producer होने के साथ साथ Film Director और Screenwriter भी थे। दादा साहेब फाल्के के भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में दिए बेमिसाल योगदान के कारण इन्हें भारतीय सिनेमा का पिता ( Father of Indian Cinema ) भी कहा जाता है। दादा साहब ने अपने फिल्मी जीवन में 95 Feature Film तथा 27 Short Film बनाए।

फ़िल्म राजा हरिश्चंद्र दादा साहब फाल्के की पहली Full Length फ़िल्म थी। भारत की पहली फ़िल्म में अभिनय करने वाले अभिनेताओं में  Dattatraya Damodar Dadka , Anna Salunke, Bhalchandra Phalke और Gajanan Vasudev Sane शामिल थे। फ़िल्म हरिश्चन्द्र की कहानी राजा हरिश्चंद्र के जीवन पर आधारित थी। राजा हरिश्चंद्र इतिहास के एक महान राजा थे। इनका ज़िक्र कई ऐतिहासिक किताब, जैसे रामायण, महाभारत, देवी भागवत पुराण इत्यादि में देखने को मिलता हैं।

चूंकि भारत की पहली फ़िल्म Silent फ़िल्म थी लेकिन इसमें बातों को शब्दों के साथ व्यक्त किया गया था। इस फ़िल्म के टाइटल में तीन भाषाओं, English, मराठी और हिंदी का उपयगो किया गया था। यह फ़िल्म 3 मई 1913 को रिलीज की गई थी। इस फ़िल्म की लंबाई 40 मिनट थी।

दादा साहब फाल्के को इस फ़िल्म के निर्माण की प्रेरणा तब मिली, जब यह 1906 में मुंबई के एक सिनेमाघर में एक आंग्रेज़ी फ़िल्म The Life of Christ देख रहे थे। इस फ़िल्म के देखने के बाद फाल्के साहब ने भी फ़िल्म बनाने की सोची। इसलिए फ़िल्म बनाने की तकनीक सीखने के लिए लंदन गए। फिर वापस आ कर भारत में फाल्के फ़िल्म की नींव डाली। फ़िल्म बनाने के लिए ज़रूरी सामान भारत में तब उपलब्ध नही थे तो उन्होंने इसे फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों से मंगवाया। इसके बाद कई छोटी बड़ी चुनौतियों को पार करने के बाद फाल्के साहब ने इस फ़िल्म के निर्माण को पूरा किया। इस फ़िल्म को बनाने में 6  महीने और 27 दिन का समय लगा था।

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