Indian Constitution In Hindi – भारतीय संविधान का इतिहास और यह कब लागू हुआ।

ब्रिटिश साम्राज्य से आजादी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक जीत जरूर थी परंतु अंतिम लक्ष्य नहीं था। यह केवल भारतीयों के लिए भारत को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का पहला कदम था। स्वतंत्रता संग्राम का अगला कदम ब्रिटिश कानून को हटाकर एक ऐसे कानून का निर्माण करना एवं लागू करना था, जो भारतीयों के द्वारा भारतीयों के लिए बनाया गया हो। इस प्रक्रिया के लक्ष्य की पूर्ति 26 जनवरी 1950 को हुई। 26 जनवरी को संविधान लागू करने वाला दिन बनाए जाने के पीछे एक दिलचस्प कहानी है जिसे हम आगे समझेंगे।

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भारतीय संविधान की कहानी

भारतीय संविधान में 25 महत्वपूर्ण भाग हैं जिनमें 448 अनुच्छेद (Articles) और 12 अनुसूचियाँ (Schedules) हैं। भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को पूर्ण रूप से लागू किया गया था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ अहिंसा और सविनय अवज्ञा के रास्ते से काफी लंबी लड़ाई  लड़ी गयी जिसके परिणाम स्वरूप भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ।

26 जनवरी को ही भारत के संविधान को लागू करने का दिन चुनने के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प  कहानी है।  वैसे तो भारत 15 अगस्त को आजाद हुआ परंतु ऐसा पहले से तय नहीं किया गया था। इसके लिए हमें 1929 में चलना होगा। सन 1929 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ था जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यह घोषणा की कि भारत अब पूर्ण स्वराज के लिए अंतिम लड़ाई लड़ेगा और काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में ही पहली बार राष्ट्र ध्वज फहराया गया और जिस दिन  यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया वह दिन था 26 जनवरी। 26 जनवरी 1929 से पहले भारत में पूर्ण स्वराज की मांग अस्तित्व में नहीं थी बल्कि केवल डोमिनियन स्टेटस की मांग थी। 26 जनवरी 1929 को पहली बार राष्ट्रीय नेताओं द्वारा इस मांग को पूर्ण स्वराज की मांग में बदल दिया गया। 1929 में पूर्ण स्वतन्त्रता की मांग के बाद भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम इसी को लक्ष्य लेकर लड़ा गया। इसीलिए 26 जनवरी की तारीख एक तरह से पूर्ण स्वराज का चिन्ह बन गई और 1929 से लेकर अगले 17 वर्षों तक इस दिन भारत का स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता रहा। परंतु जब भारत को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली तो इस 26 जनवरी की तारीख की महत्वता को बनाए रखने के लिए 3 वर्ष पश्चात 26 जनवरी 1950 को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का संविधान लागू किया गया।

भारतीय संविधान इतिहास

भारतीय संविधान के निर्माण लिए संविधान सभा (Constituent Assembly) की स्थापना कैबिनेट मिशन प्लान के तहत नवम्बर 1946 में की गई थी। भारत की संविधान सभा ने संविधान बनाने में अंग्रेजों द्वारा पहले से भारत में लागू किए गए कुछ क़ानूनों जैसे कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के प्रावधानों को भी शामिल किया। इसके अलावा भारतीय संविधान में दूसरे देशों के संविधानों और नियमों को भी भारतीय राजव्यवस्था के अनुरूप बदलकर शामिल किया गया है।

गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919:

इस एक्ट को मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu-Chelmsford Reforms) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें किए गए सुधारों में से दोहरी शासन प्रणाली एक था, जिसके तहत बड़े प्रांतों को सीमित अधिकार दिए गए।  भारतीय विधान परिषद पहली बार द्विसदनीय विधायिका में तब्दील हो गई। इसी एक्ट के तहत लंदन में भारतीय हाई कमिश्नर  का एक पद बनाया गया जो भारत के हितों का ब्रिटिश संसद में प्रतिनिधित्व  करने वाला था। इस एक्ट के द्वारा भारत में अंग्रेजों ने पहली बार प्रत्यक्ष मतदान की प्रक्रिया लागू की।

गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935:

गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 का विरोध लगातार कांग्रेस के द्वारा किया जाता रहा जिसके परिणाम स्वरूप गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 बना।  इस एक्ट के पश्चात प्रान्तों में दोहरी शासन प्रणाली खत्म कर दी गई और प्रांतों को और अधिक अधिकार प्रदान किए गए। इस एक्ट के द्वारा भारत में एक संघीय व्यवस्था लागू करने की बात कही गयी थी (जो हालांकि कभी लागू नहीं हुई)। इस एक्ट से पूर्व केवल 50 लाख  लोगों को मताधिकार था परंतु इसके पश्चात 3 करोड़ 50 लाख लोगों को मताधिकार मिला। इसी  एक्ट के तहत फेडरल कोर्ट की स्थापना की गई।

परंतु स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इन दोनों एक्ट से संतुष्ट नहीं हुए और अपनी स्वतंत्रता एवं अपने कानून की लड़ाई जारी रखी और वह लड़ाई 26 जनवरी 1950 को  भारत के संविधान लागू होने के बाद समाप्त हुई।

भारतीय संविधान के बनने के दौरान घटित महत्वपूर्ण घटनाएं

भारतीय संविधान सभा के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु:

  • कैबिनेट मिशन की योजना के अंतर्गत जुलाई 1946 को भारतीय संविधान सभा अस्तित्व में आई और नवम्बर 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ। इस संविधान सभा का कार्य था भारत के लिए भारतियों द्वारा संविधान का निर्माण करना। जिससे कि अंग्रेजों के जाने के बाद हिंदुस्तान का शासन भारत के अपने संविधान के अनुसार चलाया जा सके और ब्रिटिश सरकार से सत्ता का हस्तांतरण आसानी से हो सके।
  • संविधान सभा के सदस्य विभिन्न प्रांतों की जनसंख्या के आधार पर तथा रियासतों में नामांकन के द्वारा चुने जाने थे। संविधान सभा के चुनाव जुलाई-अगस्त 1946 में तत्कालीन वायसराय की देखरेख में संपन्न हुए थे।
  • संविधान सभा की बैठकें निम्नलिखित तारीखों में हुई।
  1. 9 से 23 दिसंबर 1946-संविधान सभा की पहली बैठक
  2. 20 से 25 जनवरी 1947
  3. 28 अप्रैल से 2 मई 1947
  4. 14 से 31 जुलाई 1947
  5. 14 से 30 अगस्त 1947
  6. 27 जनवरी 1948
  7. 4 नवंबर 1948 से  8 जनवरी 1949
  8. 16 मई से 16 जून 1949
  9. 30 जुलाई से 18 सितंबर 1949
  10. 6 से 17 अक्टूबर 1949
  11.  14 से 26 नवंबर 1949
  12. 24 जनवरी 1950-संविधान सभा की अंतिम बैठक
  • मुस्लिम लीग ने संविधान सभा में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था।
  • संविधान सभा के सदस्यों की संख्या लगातार बदलती रही। इसके बहुत से कारण थे। इन कारणों में सबसे प्रमुख कारण मुस्लिम लीग था। विभाजन के पूर्व मुस्लिम लीग के सदस्यों ने भारत की संविधान सभा का सदस्य बनने से इनकार कर दिया। विभाजन के पश्चात मुस्लिम लीग के सदस्य जो भारत से आते थे जैसे कि बिहार और उत्तर प्रदेश के सदस्यों ने संविधान सभा में आने का निर्णय लिया। वहीं कुछ सदस्य ऐसे भी थे जो मुस्लिम  पाकिस्तान वाले हिस्से से चुनकर आते थे परंतु अब हिंदुस्तान में रहने वाले थे इनमें सबसे प्रमुख उदाहरण डॉक्टर भीमराव अंबेडकर थे । संविधान सभा के सदस्यों की संख्या बदलते रहने का एक और बड़ा कारण प्रिंसली स्टेट थी। पहले तो वे संविधान सभा का सदस्य नहीं बने, परंतु बाद में उन्होंने इसका हिस्सा बनने का निर्णय लिया और अपनी ओर से सदस्य भेजें।अभिलेखों के अनुसार संविधान सभा के सदस्यों की सबसे अधिक संख्या 307 थी।
  • संविधान सभा ने कानून बनाने के लिए संविधान सभा  के बाहर के सदस्यों की भी पूरी मदद ली। यह वे  लोग थे जो किसी एक क्षेत्र के विशेषज्ञ थे अर्थात उस विषय के कानून बनाते समय इन विशेषज्ञों की राय ली गई।
  • डॉ भीमराव अंबेडकर प्रारूप समिति ( Drafting Committee) के अध्यक्ष बने।
  • डॉ राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष चुने गए एवं वी॰ टी॰ कृष्णमाचारी और एच॰ सी॰ मुखर्जी को उपाध्यक्ष के  पद लिए चुना गया। एच.वी.आर. अयंगर इस सभा के जनरल सेक्रेटरी थे।
  • संविधान बनाने का कार्य मूलतः विभिन्न समितियों में हुआ।

संविधान सभा की सबसे महत्वपूर्ण समितियां

  1. संगठनात्मक समितियाँ

इसके अंतर्गत आने वाली समितियां कुछ इस तरह से हैं:

  1. नियम और प्रक्रिया समिति।
  2. संचालन समिति।
  3. स्टाफ और वित्त समिति।
  4. क्रैडेंशियल्स  समिति।
  5. ऑर्डर आफ बिजनेस समिति।
  6. राज्य समिति।
  7. ध्वज समिति।
  8. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत संविधान सभा के कार्य पर समिति।

2. प्रधान समितियाँ और उनकी उपसमितियाँ:

  1. मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों, जनजातीय क्षेत्रों और बहिष्कृत क्षेत्रों पर सलाहकार समिति। इस समिति में पाँच उपसमितियाँ थीं।
  2. यूनियन पावर्स कमेटी ((अध्यक्ष-जवाहरलाल नेहरू)
  3. संघीय संविधान समिति (अध्यक्ष-जवाहरलाल नेहरू)
  4. प्रांतीय संविधान समिति (अध्यक्ष-सरदार वल्लभ भाई पटेल)
  5. प्रारूप समिति ( अध्यक्ष-भीमराव अंबेडकर)

3.अन्य समितियां:

  1. नागरिकता पर तदर्थ समिति।
  2. मुख्य आयुक्त प्रांतों की समिति।
  3. संविधान के वित्तीय प्रावधान पर विशेषज्ञ समिति।
  4. पश्चिम बंगाल और पूर्वी पंजाब के लिए अल्पसंख्यक सुरक्षा उप-समिति।

ज्ञापन की तैयारी:

  1. संवैधानिक सलाहकार के संक्षिप्त पर्चे और प्रश्नावली का प्रसार (सितंबर 1946-नवंबर 1947)।
  2. प्रतिक्रियाओं के आधार पर सलाहकार द्वारा मेमोरेंडम की तैयारी; कुछ सदस्यों द्वारा नोट्स प्रस्तुत करने की प्रक्रिया। (फरवरी-नवंबर 1947)।
  3. संयुक्त और उप-समितियों में  विचार-विमर्श उनकी रिपोर्ट (फरवरी-अगस्त 1947) ।
  4. संविधान सभा में रिपोर्ट पर चर्चा और सिद्धांतों को अपनाने की प्रक्रिया (अप्रैल-अगस्त 1947)।
  5. संवैधानिक सलाहकार द्वारा पहला प्रारूप तैयार करना (जुलाई-अक्टूबर 1947)।

विचारविमर्श एवं सिफारिशें:

  1. सेक्टोरल कमेटियों और उनकी रिपोर्ट में विवेचना(अप्रैल-दिसंबर 1947)।
  2. प्रारूप समिति के द्वारा बनाए गए  प्रारूप संविधान में संशोधन (अक्टूबर 1947- फरवरी 1948)।
  3. प्रारूप समिति के द्वारा दिए गए उत्तर एवं उसकी सिफारिशों पर विचार (23 मार्च, 24 और 27, 1948)।
  4. विशेष समिति में प्रतिक्रियाओं पर विचार-विमर्श और इसके निर्णय (10-11 अप्रैल, 1948)।
  5. समानांतर / आधिकारिक संशोधनों के लिए प्रारूप समिति में विचार-विमर्श (18-20 अक्टूबर, 1948)।संविधान सभा में आयोजित कांग्रेस संसदीयपार्टी की बैठकों में चर्चा और मतदान (अक्टूबर 1948-नवंबर 1949)।
  6. आधिकारिक तौर पर प्रायोजित और निजी सदस्य के प्रस्तावित संशोधनों की  पुस्तकों का प्रकाशन  (26 अक्टूबर, 1948)।

अंतिम मतदान:

1.संविधान सभा में आयोजित कांग्रेस पार्टी की बैठकों में चर्चा और मतदान (अक्टूबर 1948-नवंबर 1949)

संविधान सभा में कांग्रेस पार्टी के चुने हुए सदस्यों का दबदबा था इसीलिए इस पार्टी के व्हिप ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।,परंतु समय-समय पर यह देखा गया कि कांग्रेस पार्टी के सदस्यों ने अपनी स्वतंत्र राय प्रस्तुत की और कई बार वे पार्टी के खिलाफ भी गए। कांग्रेस पार्टी की इन सभाओं की एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि अगर कांग्रेस पार्टी के बाहर का कोई व्यक्ति इन में आना चाहता था तो उसे आने की पूरी इजाजत थी।

  1. सभा में प्रारूप संविधान और संशोधनों पर चर्चा और मतदान,(नवंबर 1948 से अक्टूबर 17 1949)।

इस भाग को आधिकारिक रूप से संविधान की फर्स्ट रीडिंग कहा गया।  इस सभा में विचार-विमर्श हमेशा अनुक्रम में नहीं किया गया बल्कि उस क्रम में किया गया जिस क्रम में संचालन समिति ने इन्हें प्रस्तुत किया।  बहुत ही कम  अनधिकृत  संशोधन यहां पर स्वीकार किए गए। बहुत से  संशोधन प्रारूप समिति के द्वारा प्रारूप बनाते समय ही स्वीकार कर लिए गए थे इसलिए  उन पर विचार नहीं किया गया।

3. प्रारूप समिति द्वारा अंतिम ड्राफ्ट की तैयारी (4 नवंबर, 1949)

बहुत से ऐसे मुद्दे थे जिन पर पहले ही विचार एवं मतदान किया जा चुका था कुछ सदस्यों  के निवेदन पर उन पर एक बार फिर से विचार किया गया। यह बात पहले से ही स्पष्ट थी की प्रारूप समिति को एक साफ सुथरा प्रारूप प्रस्तुत करना है  अर्थात उन्हें संविधान में कुछ संशोधन करने पड़े ताकि एक सरल व साफ-सुथरा संविधान बने। परंतु इन संशोधनों पर ना तो विचार किया गया था और ना ही मतदान इसलिए इन्हें एक बार फिर से विचार एवं मतदान के लिए सामने लाया गया। इसमें कुछ को स्वीकार किया गया कुछ को अस्वीकार। सभी सदस्यों को 6 नवंबर 1949 तक यह नया प्रारूप उपलब्ध करा दिया गया ताकि वे इस पर किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए अनुरोध कर सकें।

4. तीन दिनों के लिए चर्चा और उसके पश्चात कुछ खंडों के संशोधन के लिए अंतिम मतदान (14-16 नवंबर, 1949)

आधिकारिक रूप से इसे कॉन्स्टिट्यूशन बिल की सेकंड रीडिंग ( नवम्बर 15-1948 से लेकर 17 अक्टूबर 1949) कहा गया। इस  भाग में 7653  संशोधन प्रस्तावित हुए जिनमें से 2473 संसोधनों पर सभा में चर्चा हुई। कुल मिलाकर 88 स्वीकार कर लिए गए 30 को वापस ले लिया गया एवं 52 को अस्वीकार कर दिया दिया। इसी के साथ संविधान बनाने का असली कार्य समाप्त हो चुका था।

5.प्रारूप संविधान की तीसरी रीडिंग (नवंबर 14-26 1949)

संविधान सभा के सदस्यों ने एक-एक कर इस संविधान की खूबियों एवं कमियों के बारे में अपने विचार प्रस्तुत किए। इन सब के अंत में संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष भीमराव अंबेडकर ने सदन के समक्ष अपने विचार रखें।

  1. सभा के अध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षर के माध्यम से अंतिम स्वीकृति देना एवं आंशिक शुरुआत (26 नवंबर, 1949)।

26 नवम्बर के दिन संविधान सभा में अंतिम मतदान के साथ इस संविधान को स्वीकार कर लिया गया। संविधान सभा ने इस संविधान के एक प्रतिलिपि पर अपने हस्ताक्षर किए और यह संविधान अस्तित्व में आ गया परंतु आंशिक रूप से अर्थात 395 अनुच्छेदों में से केवल 16 आर्टिकल अस्तित्व में आए और पूरा संविधान 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया।

7. विधानसभा के सभी सदस्यों द्वारा संविधान के सुलेखित संस्करण पर हस्ताक्षर (24 जनवरी, 1950)

इस दिन की शुरुआत इस घोषणा से की गई की संविधान सभा के अध्यक्ष को राष्ट्रपति चुन लिया गया है ।प्रत्येक सदस्य ने तीन संस्करणों पर अपने हस्ताक्षर किए पहला संस्करण हिंदी संस्करण था, दूसरा संस्करण अंग्रेजी संस्करण था एवं तीसरा संस्करण अंग्रेजी सुलेखित  संस्करण था।हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों में जवाहरलाल नेहरू पहले थे एवं डॉ राजेंद्र प्रसाद अंतिम थे। कुल मिलकर 284 सदस्यों ने इस पर अपने हस्ताक्षर किए थे।

  1. संविधान का औपचारिक प्रवर्तन (26 जनवरी, 1950)

यह संविधान 26 जनवरी 1950 को पूरे देशों में अस्तित्व में आ गया। यह वही दिन था जब 1929 में जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी।

मूल अधिकार एवं कर्तव्य

भारतीय संविधान प्रत्येक भारतीय नागरिक को कुछ मूल अधिकार देता है एवं कुछ मूल कर्तव्य का पालन करने कों कहता है।

मूल अधिकार:

  • समानता का अधिकार: भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति को समानता का अधिकार देता है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति संविधान के समक्ष  एक समान हैं। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उस की पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है, उसका लिंग क्या है, वह अमीर है गरीब आदि।  संविधान के लिए प्रत्येक व्यक्ति एक समान है।
  • स्वतंत्रता का अधिकार: भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता का अधिकार देता है जिसके अंतर्गत वह संविधान के अंदर रहकर किसी भी तरह की गतिविधि में हिस्सा ले सकता है एवं कार्य कर सकता है।
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार: भारतीय संविधान विशेष  तरह से शोषित नागरिक के लिए सुरक्षा प्रदान करता है अगर किसी भी भारतीय नागरिक को किसी भी तरह का शोषण का सामना करना पड़ता है तो वह भारतीय संविधान से संरक्षण मांग सकता है।
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार: भारत के प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार है कि वह निर्भीक होकर अपने धर्म का पालन करें और इसका प्रचार करना चाहे तो करें।
  • संस्कृति एवं शिक्षा संबंधित अधिकार: इन अधिकारों के अंतर्गत भारत का संविधान हर एक नागरिक को उसकी सांस्कृतिक  पहचान को बनाए रखने का अधिकार देता है इसके साथ ही साथ वह अल्पसंख्यकों को यह अधिकार भी देता है कि वह अपने शिक्षण संस्थान  का संचालन कर सकें।
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार: बंदी प्रत्यक्षीकरण, निषेधाज्ञा, परमादेश,अधिकार प्रच्छा ,उत्प्रेषण रिट जैसे अधिकार इसके अंतर्गत आते हैं।

मूल कर्तव्य:

  • प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वे कानून का पालन करें एवं संस्थागत चिन्ह जैसे कि राष्ट्रीय ध्वज एवं राष्ट्रीय गान का सम्मान करें।
  • स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने वाले महान आदर्शों को संजोना और पालन करना।
  • भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को बनाए रखने और उसकी रक्षा करना ।
  • देश की रक्षा करने और राष्ट्रीय सेवा प्रदान करने जब कभी आपका आवाहन किया जाए आप प्रस्तुत हों ।
  • भारत के सभी लोगों के बीच धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय या संप्रदाय संबंधी विविधताओं के बीच सामंजस्य और समान भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना; महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक प्रथाओं का त्याग करना।
  • हमारी समग्र संस्कृति की समृद्ध विरासत को महत्व देना और संरक्षित करना।
  • वनों, झीलों, नदियों, वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार के लिए और जीवित प्राणियों के लिए दया का भाव रखना।
  • वैज्ञानिक स्वभाव, मानवतावाद ,जांच और सुधार की भावना का विकास करना।
  • सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा की हिंसा से रक्षा करना ।
  • व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करना ताकि राष्ट्र लगातार उपलब्धि के उच्च स्तर तक बढ़े।
  • माता पिता या अभिभावक की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने 6 से 14 वर्ष तक की आयु की संतान की शिक्षा की व्यवस्था करें।
  • 2002 में 86 वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार, भारत के लोगों का यह कर्तव्य है कि वे भारत को रहने के लिए सुरक्षित स्थान बनाने के लिए अनुकूलित करें, स्वच्छ रहें और आसपास के स्वच्छ रहें और किसी को शारीरिक और मानसिक रूप से चोट न पहुंचाएं।

भारतीय संविधान में दूसरे देशों के संविधान का प्रभाव

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का संविधान  बनाने की प्रक्रिया में उस समय दूसरे देशों के लगभग सभी  संविधानों का अध्ययन किया गया और  भारत की व्यवस्था के लिए उचित  कानूनों से प्रेरणा ली गई।

  • यूनाइटेड किंगडम :
    • संसदीय सरकार प्रणाली।
    • नागरिकता।
    • पीनल कोड।
    • सभापति एवं उनकी भूमिका।
    • संसदीय  प्रक्रियाएं।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका:
    • बिल ऑफ राइट्स।
    • सरकार का संघीय रूप।
    • राष्ट्रपति के चुनाव के लिए इलेक्टोरल कॉलेज।
    • स्वतंत्र न्यायपालिका।
    • जुडिशल रिव्यु।
    • राष्ट्रपति का कमांडर इन चीफ होना।
    • सभी नागरिकों को संविधान के अंतर्गत एक समान अधिकार।
  • आयरलैंड:
    • स्टेट पॉलिसी के डायरेक्टिव प्रिंसिपल, राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया, और राज्य सभा में सदस्यों का नामांकन
  • ऑस्ट्रेलिया:
    • राज्यों को आपस में व्यापार करने का अधिकार।
    • राष्ट्रीय कार्यपालिका को संधियों  का पालन करने का अधिकार तब  भी संसद या विधानसभा के अधिकार से बाहर हैं।
    • राज्य एवं केंद्र के बीच की समवर्ती अधिकारों की सूची। संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
  • फ्रांस:
    • लिबर्टी, समानता और बंधुत्व के आदर्श।
  • कनाडा:
    • संघीय व्यवस्था जिसमें मजबूत केंद्र सरकार शामिल है।
    • राज्य एवं केंद्र के बीच अधिकारों का विभाजन।
    • कुछ अधिकार जो केवल केंद्र सरकार तक सीमित है।
  • तत्कालीन सोवियत यूनियन:
    • आर्टिकल 51A के तहत मूलभूत कर्तव्य।
    • आर्थिक विकास के लिए योजना आयोग का गठन।
    • संविधान की Preamble में आइडिया ऑफ जस्टिस

भारतीय संविधान के संदर्भ में कुछ दिलचस्प बातें।

सबसे बड़े लोकतंत्र का जब संविधान बना तो इसमें बहुत सी दिलचस्प बातें हुई जाते जाते हम आपको इनके साथ छोड़ जाते हैं:

  • संविधान की मूल प्रतिलिपि प्रेम बिहारी नारायण रायजादा द्वारा हस्तलिखित की गयी थी जिन्होने कैलीग्राफी के माध्यम से इस लिपि को अत्यंत खूबसूरत बना दिया था यही नहीं संविधान के प्रत्येक पृष्ठ को शांति निकेतन के कलाकारों द्वारा सजाया गया था।
  • इस तरह के हिंदी एवं अंग्रेजी मे लिखी संविधान की मूल प्रति लिपि आज भी संसद की लाइब्रेरी में पाई जा सकती है। जिसे हीलियम से भरे केस के अंदर रखा गया है।
  • हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि भारत का संविधान  ना सिर्फ सबसे बड़े लोकतंत्र का संविधान है बल्कि सबसे बड़ा लिखित संविधान भी है। इसमें 448 आर्टिकल एवं 12  शेड्यूल हैं।
  • संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई और इसे 2 वर्ष 11 महीने एवं 18 दिनों का वक्त लगा अंतिम प्रारूप को लिखने में।
  • जब प्रारूप को विचार-विमर्श के लिए सभा के सामने रखा गया तो इस पर लगभग 2000 संशोधनों का निवेदन किया गया, इन सभी 2000 संशोधनों पर इस को अंतिम रूप देने से पहले फिर विचार किया गया।
  • संविधान को अमलीजामा पहनाने की सारी प्रक्रिया 26 नवंबर 1949 को खत्म हो गई थी परंतु इसे 26 जनवरी 1950 में अस्तित्व में लाया गया जिसे हम आज गणतंत्र दिवस के रूप में जानते हैं।
  • हस्त लिखित संविधान 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के 284 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित किया गया।
  • हस्ताक्षर करने वाले इन सदस्यों में 15 महिलाएं थी।

2 Comments

  1. Anup Kirar Dhanak March 26, 2019
    • Arvind Patel March 27, 2019

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