स्वामी विवेकानंद की समाधि का अनुभव – Grave Experience of swami Vivekananda

स्वामी विवेकानंद की गिनती उन महान योगियों में की जाती है जिन्होने अपने जीवन में समाधि का अनुभव किया था। लेकिन स्वामी विवेकानंद समाधि का अनुभव करने वाले योगियों से भी उच्च स्तर के आध्यात्मिक पुरुष थे क्योंकि उन्होने ना केवल निर्विकल्प समाधि का अनुभव किया था बल्कि उस अवस्था से लौट कर वापस भी आए थे। समाधि की अवस्था से लौट कर आना सभी के लिए संभव नहीं है। उपनिषदों, योग-शास्त्र और आप्त पुरुषों के अनुसार निर्विकल्प समाधि की अवस्था से केवल वही तपस्वी लौट सकता है जो अवतार की श्रेणी में आता हो अथवा जिससे ईश्वर संसार कल्याण के लिए कोई विशेष कार्य करवाना चाहते हैं।

स्वामी विवेकानंद बचपन से ही ईश्वर के प्रति जिज्ञासु थे और आध्यात्मिक साहित्य में विशेष रुचि रखते थे। बड़े होने पर उनकी ईश्वर को जानने की इच्छा बढ़ती गयी। कई जगहों से निराश होने के बाद अंततः नरेंद्र कलकत्ता के प्रसिद्ध काली उपासक और दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी श्री रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए। शुरू में तो नरेंद्र को यकीन नहीं हुआ कि ईश्वर को ठीक वैसे ही देख सकते हैं जैसे कि हम किसी अन्य वस्तु को देखते हैं। किन्तु श्री रामकृष्ण परमहंस के अनुभवों और आध्यात्मिक ज्ञान के आगे नरेंद्र निरुत्तर हो गए।

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श्री रामकृष्ण परमहंस अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होने नरेंद्र के ईश्वर संबन्धित सभी प्रश्नों का सही-सही जवाब दिया था। जल्द ही श्री रामकृष्ण परमहंस और नरेंद्र के बीच गुरु-शिष्य का संबंध बन गया। ये श्री रामकृष्ण परमहंस ही थे जिन्होने नरेंद्र को अद्वैत वेदान्त के रहस्यों और गहराइयों से परिचित कराने की शुरुआत की थी। प्रारम्भ में नरेंद्र ब्रह्म समाज की मान्यताओं को मानते थे जिसके कारण वे अद्वैत वेदान्त की इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि सबकुछ ब्रह्म ही है। किन्तु श्री रामकृष्ण परमहंस ने धीरे-धीरे नरेंद्र के संशय को दूर कर दिया और उनके मन को वेदान्त के अंतिम लक्ष्य कि ओर मोड़ दिया।

अब श्री रामकृष्ण परमहंस का शिष्य बनने के बाद नरेंद्र की एकमात्र इच्छा वेदान्त के अंतिम लक्ष्य निर्विकल्प समाधि का अनुभव करना था। हालांकि श्री रामकृष्ण परमहंस अपने सबसे प्रिय शिष्य की इस इच्छा से परिचित थे किन्तु उन्होने नरेंद्र को उसके जीवन के बड़े लक्ष्य के प्रति जागरूक कराया।

एक बार नरेंद्र ने श्री रामकृष्ण परमहंस से मांग की कि उसे समाधि की अवस्था का अनुभव कराएं ताकि वह कई दिनों तक ध्यान की अवस्था में रह सके। इस पर श्री रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद से कहा था कि ईश्वर तुझे एक विशाल वृक्ष बनाना चाहते हैं जिसके नीचे लोग छाया पा सकें और अपनी आध्यात्मिक उन्नति कर सकें और तू है कि केवल अपनी ही मुक्ति खोज रहा है। बस अपनी समाधि के चक्कर में पड़ा है। श्री रामकृष्ण परमहंस के इस कथन के बाद नरेंद्र को बहुत पछतावा हुआ। नरेंद्र के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस चाहते थे कि नरेंद्र लोक-शिक्षा का कार्य करें। उनका मानना था कि माँ काली ने नरेंद्र को संसार के कल्याण के लिए उनके साथ भेजा है। लेकिन नरेंद्र भी उन महान योगियों में थे जिन्होने अपने गुरु से दो टूक शब्दों में कह दिया था कि बिना समाधि की अवस्था का अनुभव किए अर्थात वेदान्त के अंतिम लक्षय ब्रह्म का बिना अनुभव किए मैं किसी भी प्रकार का कोई कार्य करने वाला नहीं हूँ।

अब हम नरेंद्र की समाधि के अनुभव की बात करते हैं कि कब और कैसे उन्हे श्री रामकृष्ण परमहंस ने इस अति दुर्लभ अवस्था का अनुभव कराया था।

स्वामी विवेकानंद को समाधि का दो बार अनुभव हुआ था। जिसके बाद श्री रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र से कहा था कि अब तुम्हारे इस समाधि का अनुभव ताले में बंद रहेगा जिसकी चाभी मेरे पास रहेगी और जब तुम संसार कल्याण के लिए मेरा काम पूरा कर लोगे तभी तुम्हें दोबारा इस समाधि का अनुभव प्राप्त होगा। इसके अलावा श्री रामकृष्ण परमहंस यह भी जानते थे कि जब स्वामी विवेकानंद माँ काली का कार्य खत्म कर लेंगे और दोबारा से समाधि की अवस्था में जाकर अपने आप को पहचान लेंगे तो वे अपने शरीर का त्याग कर देंगे।

नरेंद्र को ध्यान की उच्च अवस्था में कलकत्ता के काशीपुर के बगीचे में अद्वैत वेदान्त की उच्चतम अवस्था निर्विकल्प समाधि का अनुभव हुआ था। अपनी समाधि की अवस्था का वर्णन स्वामी विवेकानंद ने स्वयं किया है। एक दिन काशीपुर के बगीचे में नरेंद्र ने श्री रामकृष्ण परमहंस से समाधि की अवस्था का अनुभव कराने के लिए अत्यंत गंभीरता पूर्वक प्रार्थना की। उस दिन शाम को नरेंद्र बगीचे में ध्यान में चले गए और एक घंटे के ध्यान के बाद उनके शरीर की चेतना खत्म हो गयी। ध्यान की इस अवस्था में उन्हे महसूस हुआ की उनके पास शरीर है ही नहीं। उन्होने महसूस किया कि सूर्य, चंद्रमा, अंतरिक्ष, समय, ईथर, और सभी कुछ किसी एकरूप द्रव्यमान में बदल गए थे और फिर दूर अज्ञात में मानो पिघल गए; शरीर – चेतना लगभव गायब हो गयी थी।

नरेंद्र को समाधि की इस अवस्था में अनुभव हुआ कि वे लगभग ब्रह्म में विलीन हो गए थे। नरेंद्र के अनुसार “मेरे पास केवल अहंकार (अस्तित्व) की भावना की एक रेखा मात्र थी इसलिए मैं फिर से समाधि से सापेक्षता की दुनिया में लौट सकता था।“ समाधि की इस स्थिति में “मैं” और “ब्रह्म” के बीच का अंतर खत्म हो जाता है, सब कुछ “एक” में सिमट जाता है जैसे अनंत महासागर का पानी – हर जगह पानी, बाकी कुछ भी मौजूद नहीं है-वहाँ – भाषा और विचार, कुछ कार्य नहीं करते। तब केवल “मन और वाणी से परे” वह अवस्था अपनी वास्तविकता में ज्ञात होती है।

अन्यथा, जब तक एक ब्रह्मवेत्ता यह सोचता या कहता है, अहम् ब्रह्मास्मि यानि कि “मैं ब्रह्म हूं” – “मैं” और “ब्रह्म”, ये दो भिन्न अस्तित्व बने रहते हैं – तब तक इसमें द्वैत भाव का समावेश  रहता है।

इस घटना के बाद नरेंद्र ने बार-बार प्रयत्न किया कि समाधि की इस अवस्था का दोबारा अनुभव किया जाए किन्तु उन्हे सफलता नहीं मिली। इस अति दुर्लभ समाधि की अवस्था को दोबारा अनुभव न कर पाने के बारे में जब नरेंद्र ने श्री रामकृष्ण परमहंस से कहा तो उन्होने नरेंद्र से कहा कि यदि तुम दिन-रात उसी अवस्था में रहोगे तो माँ काली का कार्य पूरा नहीं होगा। जब तक तुम मेरा कार्य पूरा नहीं कर लोगे तुम्हें इस समाधि की अवस्था का दोबारा अनुभव नहीं होगा। इस प्रकार नरेंद्र, जो बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से मशहूर हुए, को निर्विकल्प समाधि की अवस्था का अनुभव हुआ था।

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