Indian Economy in Hindi – भारतीय अर्थव्यवस्था की पूरी जानकारी।

भारतीय गणराज्य जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था का भी मालिक है। सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर भारत दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है वही अगर हम Purchasing Power Parity अर्थात खरीदने की क्षमता की बात करें तो इसमें भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था लागू है। भारत के पास दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ सेवा क्षेत्र अर्थात सर्विस सेक्टर है । इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था का अवलोकन करना आसान कार्य नहीं है इसलिए हमने इस लेख को कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों में बांट कर रखा है, सर्वप्रथम हम भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास के बारे में बात करेंगे, इसके पश्चात हम भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ अर्थात इसके  सबसे ज्यादा  भार उठाने वाले क्षेत्रों के विषय में बात करेंगे, इसके पश्चात हम भारतीय रिजर्व बैंक  का अवलोकन करेंगे उसके पश्चात हम और फिर अंत में हम विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं पर एक तीव्र नजर डालेंगे।

Indian economy in hindi

  • सकल घरेलू उत्पाद :- 2.69  ट्रिलियन डॉलर
  • सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर :- 7.23%
  • प्रति व्यक्ति आय :- ₹113000 प्रति वर्ष
  • श्रम शक्ति :- लगभग 52 करोड श्रमिक
  • महंगाई दर :- लगभग 2%
  • बेरोजगारी की दर :- 3.7%
  • प्रमुख  निर्यात किए जाने वाले देश :- यूरोपियन यूनियन, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड अरब अमीरात, हांगकांग एवं चाइना।
  • प्रमुख आयात किए जाने वाले देश :- चाइना, यूरोपियन यूनियन, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड अरब अमीरात, सऊदी अरब आदि
  • स्टैंडर्ड चार्टर्ड क्रेडिट रेटिंग :- BBB-
  • मूडी  क्रेडिट रेटिंग :- BAA+
  • फिच क्रेडिट रेटिंग :- BBB-

भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न कालों पर एक नजर

  • प्राचीन काल में भारतीय अर्थव्यवस्था:

भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रथम विवरण हमें सिंधु घाटी की सभ्यता का अवलोकन करते समय मिलता है। ऐसा माना जाता है कि यह सिंधु घाटी की सभ्यता ईसा पूर्व 2800 से लेकर ईसा पूर्व 1800 के बीच के काल की है।भारत में इस समय एक फलती फूलती अर्थव्यवस्था का सबूत इस बात से मिलता है कि इस सभ्यता के जो भी अवशेष मिले हैं उनसे यह ज्ञात होता है कि इस समय के सारे शहर बहुत ही अच्छे तरीके से पूर्व नियोजित  थे ।विशेषज्ञों का यह मानना है कि सन 0001 से लेकर अगले 1700 वर्षों तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहा और इसका दुनिया की अर्थव्यवस्था  में हिस्सा 30% से 40% तक था। इतने पुराने समय में अर्थव्यवस्था के आंकड़े जानने में इस बात की समस्या आती है कि उस समय  अभिलेख इतने संभाल कर नहीं रखे जाते थे फिर भी कई अभिलेख आज भी उपलब्ध है जो भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाते हैं।

ऐसे ही कई अभिलेख हमें रोमन साम्राज्य के द्वारा सहज कर रखे गए अभिलेखों से मिलते हैं। अभिलेखों के अनुसार रोमन साम्राज्य भारत से वस्त्र, हाथी दांत, मसाले एवं गहनों का आयात करता था और भारत से आयातित इस तरह के मामलों के लिए रोमन साम्राज्य भुगतान सोने के सिक्कों से करता था इसके सबूत हमें केरल के कुछ पुराने मंदिरों में मिलते हैं जहां पर रोमन काल के सोने के सिक्के आज भी उपलब्ध हैं। रोमन  सीनेट में होने वाली बहसों के अभिलेख से हमें कई दिलचस्प बातें पता चलती हैं जैसे कि एक बहस में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि भारत के प्रति रोमन साम्राज्य का वित्तीय घाटा बहुत ज्यादा है अर्थात भारत बहुत बड़ी मात्रा में रोमन साम्राज्य को निर्यात करता है जिसके बदले में  रोमन साम्राज्य छोटी मात्रा में भारत को निर्यात करता है। वैसी ही एक बहस यह भी कहती है कि रोमन साम्राज्य का सारा सोना खत्म हुआ जा रहा है क्योंकि इसका उपयोग भारत से आने वाले सामान के भुगतान में किया जा रहा है। ऐसे भी कुछ सबूत मिलते हैं जो यह बताते हैं कि भारत को की जाने वाली भुगतान की राशि  उगाहने  के लिए रोमन साम्राज्य नए-नए करो की व्यवस्था की।

इन सभी सबूतों के अवलोकन से यह पता चलता है कि प्राचीन काल में भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत ही सक्रिय अर्थव्यवस्था थी एवं इसकी पहुंच दुनिया के हर  महाद्वीप में थी।

  • मुगल काल

भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में अगले अभिलेख मुग़ल काल से प्राप्त होते हैं। जो यह दर्शाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था मुगल काल में काफी फल-फूल रही थी और इसका सबसे बड़ा कारण सुरक्षा  था ।विशेषज्ञों का मानना है कि मुगल काल में भारत मूल तौर पर बाहरी आक्रमण से सुरक्षित रहा इसी कारण से उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में स्थिरता का समय था जिसमें व्यापार फला  फूला। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय एवं चीनी अर्थव्यवस्था का दुनिया  के कुल सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 60 से 70% का हिस्सा था।इस काल में सोने चांदी एवं कॉपर के सिक्के प्रचलित थे। इस काल में करो की व्यवस्था केंद्रीकृत थी इस कारण से व्यापारियों को अलग अलग कर नहीं देने पड़ते थे और चूंकि मुगल साम्राज्य भारत के बहुत बड़े क्षेत्र पर अधिकार रखता था इस कारण से  पूरे देश के व्यापारियों को लगभग एक जैसे कर देना पड़ता था जिससे व्यापार का कार्य अत्यंत आसान हो जाता था।इसी मुगल काल  के दौरान कर वसूली की जो व्यवस्था थी  उसके अवशेष हमें आज भी देखने को मिलते हैं उदाहरण के तौर पर पटवारी, तहसीलदार जैसे पद उस समय कर वसूल करने के लिए बनाए गए थे जो आज भी भारतीय राजस्व  व्यवस्था का एक हिस्सा है। मुगल काल के दौरान ऐसा माना जाता है कि भारतीय निर्यात का स्तर नई ऊंचाइयों तक पहुंचा यही नहीं विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारतीय कृषि व्यवस्था उस समय की यूरोपियन कृषि व्यवस्था से कहीं ज्यादा उन्नत थी।विशेषज्ञों का मानना है कि 1750 ईस्वी तक दुनिया भर के निर्माण का लगभग 25% हिस्सा केवल भारत से आता था  भारत में निर्मित सामान का ज्यादातर हिस्सा निर्यात कर दिया जाता था। इनमें सबसे प्रमुख क्षेत्र वस्त्र निर्माण, जहाज निर्माण एवं  लोहे से संबंधित उत्पाद थे।  भारतीय अर्थव्यवस्था कितनी उन्नत थी इस बात का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटेन के द्वारा एशिया से आयात की जाने वाली वस्तुओं का 95% हिस्सा केवल भारत से आयात किया जाता था यही नहीं इसके बदले भारत में ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों के द्वारा बनाए उत्पाद का बहुत कम आयात किया जाता था अर्थात भारत एवं यूरोपीय देशों के बीच में  वित्तीय घाटा यूरोपीय देशों के हिस्से आता था।

भारत से इस काल के दौरान व्यापार करने के लिए यूरोप में बहुत  सारी कंपनियों का उदय हुआ इनका मुख्य कार्य  भारत से सामान खरीदकर यूरोप एवं दुनिया के अन्य हिस्सों में बेचना था इन कंपनियों में सबसे प्रमुख कंपनियां थी डच ईस्ट इंडिया कंपनी एवं ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी। भारत उस समय कितनी बड़ी अर्थव्यवस्था था इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि एक समय डच ईस्ट इंडिया कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी थी वही उसके पश्चात ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी थी।

  • ब्रिटिश राज

भारत में ब्रिटिश राज के दो हिस्से हैं पहला हिस्सा जब भारत के  बहुत बड़े क्षेत्र में ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिपत्य था वही दूसरा हिस्सा जब 1857 के विद्रोह के पश्चात भारत  सीधे ब्रिटेन के अंतर्गत आ गया।

ब्रिटिश राज के दौर में भारत की  अर्थव्यवस्था में अवनति का दौर देखा भारत का दुनिया की अर्थव्यवस्था में हिस्सा लगातार गिरते रहा और तो और वह भारत  जो दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक था एक आयातक देश बन गया। ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश राज के शुरुआती चरणों में भारत में दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का 25% था वही जब ब्रिटिश राज भारत छोड़कर गया तो इसके पास लगभग 2% हिस्सा ही था। यही नहीं जब ब्रिटिश राज भारत से गया तक दुनिया में प्रति व्यक्ति आय के आधार पर भारत सबसे गरीब देशों में से एक था।

ब्रिटिश राज ने भारत में कई नीतियों को लागू किया उनमें से कृषि पर उनकी एक नीति थी जो यह कहती थी कि नगद फसल को उगाने पर जोर दिया जाए ताकि इसे बेचकर फायदा कमाया जाए, जब ऐसी नीति लागू की गई तो नगदी फसलें ज्यादा हो गई वहीं  भारत को अन्न प्रदान करने वाली फसलों में कमी आ गई जिसके फलस्वरूप भारत को कई बार भुखमरी का सामना करना पड़ा।ब्रिटिश राज ने भारतीय अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने में कोई ध्यान नहीं दिया जिसके फलस्वरूप, भारत से बने बनाए माल का निर्यात कम होता रहा और भारत बने बनाए माल का आयात करने वाला देश बन गया ऐसा होने से पूंजी लगातार भारत से इंग्लैंड की ओर जाती रही और भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर होती रही। इसका एक उदाहरण इस बात से मिलता है कि अंग्रेजों के आने से पूर्व भारत जहां पूरी दुनिया को  वस्त्र  निर्यात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश था वही अंग्रेजों के राज में आने के बाद भारत बने हुए वस्त्रों का आयात करने लगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था के कमजोर होने के पीछे ब्रिटिश राज की कुछ नीतियां थी जैसे कि ब्रिटिश राज ने विदेशियों को भारत में प्रॉपर्टी अधिकार दे दिए, भारत में फ्री ट्रेड को बढ़ावा दिया, भारत में मुद्रा विनिमय की दर निश्चित कर दी गई जिनमें किसी भी तरीके का मोलभाव नहीं किया जा सकता था।

जब भारत में रेलवे का आगमन हुआ तो ब्रिटिश राज  ने रेलवे पटरी वहीं पर बिछाए जहां पर उनके लिए आर्थिक रूप से यह लाभकारी थी। सरल शब्दों में कहें तो भारतीय रेलवे का कार्य व्यक्तियों को एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाने का कम बल्कि निर्यात  के माल को बंदरगाहों तक ले जाना एवं आयात के माल को बंदरगाहों से पूरे भारत तक फैलाना ज्यादा था। इसीलिए ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहां ऐसे शहर हैं जिनकी आबादी काफी ज्यादा थी परंतु वहां तक रेलवे पटरी पहुंचाने में काफी समय लगा जबकि ऐसे कई शहर थे जो आबादी कम होने के बावजूद कुछ ऐसा बनाते थे जिसका निर्यात किया जा सके  वहां  रेलवे पटरी पहुंचाने को प्राथमिकता दी गई।

सरल शब्दों में कहा जाए तो ब्रिटिश राज भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए  एक बुरे सपने की तरह था जिससे उबरने के लिए भारत को स्वतंत्रता के पश्चात कई दशक लगने वाले थे।

  • उदारीकरण से पूर्व का काल

उदारीकरण से पूर्व का कार्य 1947 से  1991 तक का माना जाता है। भारत जब आजाद हुआ तब पूरी दुनिया में शीत युद्ध का समय था उस समय पूरी दुनिया अर्थव्यवस्थाओं के आधार पर दो महत्वपूर्ण हिस्सों में बटा हुआ था। प्रथम उस तरह की अर्थव्यवस्था में थी जो पूंजीवाद  पर विश्वास रखती थी जिसका उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका है। दूसरी वह अर्थव्यवस्था  थी जो समाजवाद पर विश्वास रखती थी इन का उदाहरण  तत्कालीन सोवियत रूस था। वैसे तो इस बात का तर्क दिया जाता है कि भारत ने समाजवादी अर्थव्यवस्था का रास्ता चुना परंतु भारत की घोषित अर्थव्यवस्था हमेशा से मिश्रित अर्थव्यवस्था थी। इस तरह की अर्थव्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण स्तंभ थे जैसे कि सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी कंपनियों की स्थापना जैसे कि बीएचईएल, एस ए आई एल,  भारतीय पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड, ओएनजीसी आदि।  इस समय रेगुलेशन अर्थात  विनियमन पर बहुत ध्यान दिया गया  जिसके परिणाम स्वरुप भारत एक लाइसेंस राज  वाला देश बन गया जहां के  व्यापारियों पर  रेगुलेशन के नाम पर बहुत सारी बेड़िया डाल दी गई जिसके फलस्वरूप भारत का विकास बहुत  धीमा रहा। भारत में विकास की योजनाओं के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का सहारा लिया जहां पर अगले 5 वर्ष को दृष्टि में रखकर योजनाएं बनाई जाती।

साठ के दशक के शुरुआती दौर में भारत को भयंकर सूखे का सामना करना पड़ा, भविष्य में अनाज की कमी को दूर करने के लिए हरित क्रांति के अंतर्गत बहुत सारे कदम उठाए गए जिसके फलस्वरूप आज भारत अन्य उत्पादन के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर है। उदारीकरण के पूर्व की अर्थव्यवस्था के विषय में यह कहा जाता है कि यह बहुत ही धीमी अर्थव्यवस्था थी और भारतीय सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि की दर को पूरी दुनिया हिंदू वृद्धि दर कहता था।

  • उदारीकरण के पश्चात का काल

उदारीकरण के पश्चात का  काल 1991 से लेकर आज तक का काल माना जाता है। उदारीकरण के पश्चात के काल के बारे में जानने से पूर्व हमें उस घटना के विषय में समझना होगा जिसके फलस्वरूप भारत में उदारीकरण का आगमन हुआ और यह घटना थी 1991 का वित्तीय संकट।

एक ऐसा विचार जिसका समय आ गया है उसे आने से कोई नहीं रोक सकता।” – मनमोहन सिंह (तत्कालीन वित्त मंत्री)

1991 में आए वित्तीय संकट के बहुत सारे कारण हैं। इन कारणों में से एक प्रमुख कारण सोवियत रूस का विघटन था,  भारत और सोवियत रूस आपस में बहुत बड़े व्यापारिक साझेदार थे और सोवियत रूस के विभिन्न देशों में भी विघटित होने  के पश्चात भारत को आर्थिक रूप से काफी नुकसान उठाना पड़ा।  भारत में आयात निर्यात में वित्तीय घाटे का दौर था और इस वित्तीय घाटे को दूर करने के लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत पड़ती थी और इस विदेशी मुद्रा का एक बड़ा हिस्सा, खाड़ी देशों से आता था जहां पर  भारतवासी बड़े संख्या बढ़ी संख्या में कार्य करते थे और अपने देश में विदेशी मुद्रा का एक बहुत बड़ा हिस्सा लाते थे परंतु जब  इराक  ने कुवैत पर हमला कर दिया तो यह सारी व्यवस्था बिगड़ गई और उसके पश्चात जब अमेरिका ने इराक  पर हमले की घोषणा की तो यह व्यवस्था और भी ज्यादा नेस्तनाबूद हो गई। भारत को इस आर्थिक संकट से बचने के लिए अपना सोना तक गिरवी रखना पड़ा।यही नहीं अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी  ने भारत की रेटिंग कम कर दी जिससे भारत के लिए कर्जा लेना और भी कठिन हो  गया। यही नहीं  इंटरनेशनल मोनेटरी फंड जैसी अंतरराष्ट्रीय  संस्थाओं ने भारत की मदद के बदले भारत में उदारीकरण की पहल करने की शर्त रखी। यहां पर ध्यान देने योग्य बात है कि यह समय प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का समय था  और वह एक केयरटेकर गवर्नमेंट चला रहे थे इसीलिए उनके पास अर्थव्यवस्था को लेकर निर्णय लेने के पूरे अधिकार उपलब्ध नहीं थे और यह कार्य अगली सरकार करने वाली थी।

चंद्रशेखर की सरकार के बाद नरसिम्हा राव की सरकार आई और नरसिम्हा राव ने किसी राजनीतिक व्यक्ति की जगह डॉ मनमोहन सिंह को जो कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रह चुके थे वित्त मंत्री नियुक्त किया। डॉ मनमोहन सिंह ने अपने पहले बजट के साथ भारत में  उदारीकरण की शुरुआत की जिसके बाद भारत ने आधुनिक अर्थव्यवस्था के दौर  में अपना पहला कदम रखा। डॉ मनमोहन सिंह के द्वारा दिए गए कुछ मुख्य कदम इस तरह से थे।

  • लाइसेंस राज की समाप्ति।
  • इंटरेस्ट रेट कम कर दिया  गया।
  • बहुत से क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों को सीधे निवेश करने की आजादी दी गई।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों की मोनोपली समाप्त कर दी गई, और उन क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा दिया गया।

मनमोहन सिंह के द्वारा किए गए इन सुधारों के पश्चात  भारतीय अर्थव्यवस्था ने नए दौर में कदम रखा। भारत के  सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर लगातार बढ़ती रही। 1991 के संकट के बाद मनमोहन सिंह के द्वारा उठाए गए कदम शुरुआत थी आने वाली सरकारों ने उदारीकरण की इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और भारत में व्यापार करने की प्रक्रिया को आसान करने का कार्य किया। भारतीय अर्थव्यवस्था नें  अपना अगला संकट 1998 में देखा जब भारत ने परमाणु विस्फोट किया  जिसके उत्तर में पश्चिम के देशों ने भारत में के प्रतिबंध लगाएं एवं इसका बुरा प्रभाव भारत की क्रेडिट रेटिंग को भी देखना  पड़ा। परंतु अब तक भारत की अर्थव्यवस्था काफी मजबूत हो चुकी थी और वह ऐसे झटको से उबरने एवं आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह सक्षम थी। आपको यह जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान केवल कुछ अर्थव्यवस्था एसी थी दुनिया  में जो 7% से अधिक दर से बढ़ी भारतीय अर्थव्यवस्था उनमें से एक थी।

भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास के साथ ही साथ भारत का राजनीतिक इतिहास समझना भी उतना ही आवश्यक है तभी आप असली भारत को समझ पायेंगे ।

भारतीय अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्र

  • कृषि

भारतीय सकल घरेलू उत्पाद में कृषि एवं इससे जुड़े विषयों का  हिस्सा साल लगभग 17% के बराबर है। कृषि क्षेत्र भारत की  श्रम शक्ति के लगभग 49% हिस्से को रोजगार देने का कार्य करता है। हरित क्रांति के पश्चात भारत  अन्न  उत्पादन के क्षेत्र में ना केवल आत्मनिर्भर हुआ बल्कि  अनाज के निर्यात में अपना हिस्सा बढ़ाने में भी सफल रहा। भारत के कृषि उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, पश्चिम बंगाल गुजरात एवं महाराष्ट्र का है।  भारत  दूध, जूट  एवं दलों  का सबसे बड़ा उत्पादक है।भारत में पशुधन की संख्या लगभग 17 करोड़ के आसपास है। भारत चावल, गेहूं, गन्ना, कपास एवं  मूंगफली का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।

  • निर्माण क्षेत्र

निर्माण क्षेत्र भारतीय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग  26% है एवं श्रम शक्ति का लगभग 22% है। भारत निर्माण क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान के आधार पर दुनिया  की छठवीं बड़ी आर्थिक शक्ति है। निर्माण  के आधार पर सबसे प्रमुख क्षेत्र कुछ इस तरह से हैं रक्षा, इलेक्ट्रिसिटी, इंजीनियरिंग या अभियांत्रिकी, ज्वेलरी, आधारभूत संरचना या इंफ्रास्ट्रक्चर, पेट्रोलियम उत्पाद एवं केमिकल, फार्मास्यूटिकल, वस्त्र निर्माण,पल्प  एवं पेपर।

किसी भी निर्माण क्षेत्र का आधार होता है कच्चा माल, इसके लिए भारत की खनिज संपदा का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है|

  • सेवा क्षेत्र

सेवा क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान देता है। सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का प्रतिशत 57% के आसपास है। यह क्षेत्र भारत के 27% श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है।भारत में सेवा क्षेत्र के इस उन्नति का सबसे बड़ा कारण  पढ़ी-लिखी आबादी है।सेवा क्षेत्र के प्रमुख क्षेत्र को जिस तरह से हैं  एविएशन, बैंकिंग एवं फाइनेंसियल सर्विस, फाइनैंशल टेक्नोलॉजी, इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी, इंश्योरेंस, रिटेल, टूरिज्म, मीडिया एवं इंटरटेनमेंट उद्योग,  स्वास्थ्य सेवाएं, प्रिंटिंग एवं टेलीकम्यूनिकेशन आदि।

  • भारतीय रिजर्व बैंक
दिनांकरेपो दररिवर्स रेपो दरसीआरआरएसएलआर
फ़र, 20196.25%6%4%19.5%
दिसंबर 20186.5%6.25%4%19.5%
अक्टू 20186.5%6.25%4%19.5%
अगस्त 20186.5%6.25%4%19.5%
जून 20186.25%6%4%19.5%
अप्रैल 20186%5.75%4%19.5%
फरवरी 20186%5.75%4%19.5%
अक्टूबर 20176%5.75%4%19.5%
अगस्त 20176%5.75%4%20%
जून 20176.25%6%4%20%
अप्रैल 20176.25%6%4%20.5%
जनवरी 20176.25%5.75%4%20.5%
अक्टूबर 20166.25%5.75%4%20.75%
अप्रैल 20166.5%6%21.25%
Sep 20156.75%5.75%कोई परिवर्तननहीं परिवर्तन
जून 20157.25%6.25%कोई परिवर्तननहीं
मार्च 20157.5%6.5%4%21.5%
जनवरी 20157.75%6.75%4%22%

भारतीय रिजर्व बैंक  भारत का केंद्रीय बैंक है।भारतीय रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर शक्तिकांत दास है|भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934 के तहत की गई थी। जब इसकी स्थापना की गई थी तो इसके  सभी शेयर होल्डर निजी थे परंतु  1 जनवरी 1949 को भारतीय रिजर्व बैंक का  राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

आपने बोलचाल की भाषा में या समाचार पत्रों में यहां सुना होगा कि रिजर्व बैंक ने रेपो रेट या  रिवर्स रेपो रेट या सीआरआर में कमी या  बढ़ोतरी कर दी चलिए इन सब चीजों को धीरे से समझतें  है। रेपो रेट दर है जिस दर के तहत बैंक रिज़र्व बैंक से कर्ज लेते हैं। रिवर्स रेपो रेट दर है जिसके तहत रिजर्व बैंक अन्य बैंकों से कर्ज लेता है। सीआरआर का मतलब कैश रिजर्व रेश्यो है अर्थात यह वह प्रतिशत है जितना प्रतिशत राशि बैंकों को हमेशा अपने खाते में रखनी पड़ेगी। अब आप सोच रहे होंगे कि रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट का आपकी जिंदगी से क्या संबंध है चलिए तो इसे सरल शब्दों में समझने की कोशिश करते हैं।

रिजर्व बैंक इन सभी तरीकों से मुद्रा के  प्रवाह  पर  नियंत्रण रखता है। मान लीजिए कि महंगाई दर बढ़ रही है तो रिजर्व बैंक रेपो रेट एवं रिवर्स रेपो रेट को बढ़ा देता है जिससे कि कर्ज महंगे हो जाते हैं  और कर्ज के महंगे होने से मांग घट  जाती है और मांग के घट जाने से  से महंगाई घट जाती है। इसके ठीक उलट जब आर्थिक मंदी का दौर चल रहा होता है तो रिजर्व बैंक रेपो रेट रिवर्स रेपो रेट को कम कर देता है जिससे कि  कर्ज़ लेना आसान हो जाता है जिसके फलस्वरूप मांग बढ़ जाती है और मंदी का दौर खत्म हो जाता है। अर्थात रिजर्व बैंक को यह ध्यान रखना होता रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट इतनी अधिक हो की महंगाई ना बढे  एवं इतनी कम हो की आर्थिक मंदी ना आए। रिजर्व बैंक को महंगाई एवं आर्थिक स्थिति के बीच समन्वय बनाकर चलना पड़ता है।

रिजर्व बैंक नोट को छापने का  कार्य करता है इसीलिए आपने नोटों में रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर देखे होंगे। रिजर्व बैंक ना सिर्फ दूसरे बैंकों को कर्ज देने का कार्य करता है बल्कि  सरकार को भी रिजर्व बैंक कर्जा देता है।   भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार के संरक्षक का कार्य भी करता है । इसके साथ ही साथ रिजर्व बैंक यह भी देखता है कि भारतीय मुद्रा का विदेशी मुद्राओं के मुकाबले की  दर  एक निश्चित स्थिति में बनी रहे । इस स्थिति को हम एक उदाहरण के द्वारा समझते हैं अगर रिजर्व बैंक को लगता है कि भारतीय रुपए की स्थिति डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रही है तो रिजर्व बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलरों को बेचना चालू कर देता है जिससे बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ जाती है और उसकी दर घट जाती है फलस्वरुप रुपए वापस से मजबूत होना चालू कर देता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के अलावा आगे चलकर भारत सरकार ने कई अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।

भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था है एवं इसके सभी पहलुओं को छूना लगभग असंभव है परंतु हमने एक ईमानदार प्रयास किया है कि आपको भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में  अधिक से अधिक ज्ञान  दिया जाए। हम उम्मीद करते हैं कि हमारा प्रयास सफल होगा।

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