जय जवान जय किसान नारा किसने और कब दिया था ?

“जय जवान जय किसान” एक ऐसा नारा है जो  जब दिया गया था तब से लेकर आज तक लगातार कहीं ना कहीं सुनने को मिल जाता है । कभी कोई प्रधानमंत्री “जय जवान ,जय किसान ,जय विज्ञान” कहता है।  तो कभी कोई बिजनेसमैन “जय किसान, जय जवान, जय विज्ञान, जय विद्वान,”। “ जय जवान जय किसान” का नारा भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था । लाल बहादुर शास्त्री के यह नारा देने के पीछे दो प्रमुख कारण थे।

पहला कारण यह था कि उस समय  भारत एवं पाकिस्तान के बीच तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया था और कुछ ही दिनों में युद्ध शुरु होने वाला था इसीलिए नारे का पहला हिस्सा था जय जवान। दूसरा कारण यह था कि उसी समय भारत गंभीर खाद्य संकट से गुजर रहा था, भारत में  इस कमी को दूसरे देशों की मदद से पूरा किया जा रहा था ऐसे समय में लाल बहादुर शास्त्री भारत को खाद्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर देखना चाहते थे इसीलिए इस नारे का दूसरा वाक्य है जय किसान। अब जब आपने  इस सवाल का जवाब जान लिया कि जय जवान जय किसान नारा किसने दिया था?  तो आगे चलकर इस नारे को देने वाले लाल बहादुर शास्त्री के विषय में कुछ जानते हैं ।

jay javan jay kisan ka nara kisne diya tha

जय जवान जय किसान का नारा देने वाले शस्री जी का जन्म एवं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ जो वाराणसी जिले के अंतर्गत आता  है। उस समय उत्तर प्रदेश को यूनाइटेड प्रोविंस कहा जाता था। उनके पिता का नाम शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एवं माता का नाम राम दुलारी देवी था । उनके पिता का देहांत तभी हो गया था जब वे केवल 2 वर्ष के थे। इन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा मुगलसराय में ही प्राप्त की और बाद की शिक्षा के लिए अपने मामा के पास वाराणसी चले गए। 1915 के आसपास महात्मा गांधी  के एक भाषण से प्रभावित होकर लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान देने का निर्णय लिया।

वे स्वतंत्रता संग्राम में इतने  जुट गए कि इससे उनकी पढ़ाई पर फर्क पड़ा। 1930 आते-आते तक वह कांग्रेस के पायदान में ऊपर चढ़ना चालू कर चुके थे इस समय तक उन्हें इलाहाबाद कांग्रेस कमेटी का प्रेसिडेंट तक नियुक्त कर दिया गया था। 1947 में हुए Provincial election (प्रांतीय चुनाव) में लाल बहादुर शास्त्री यूनाइटेड प्रोविंस से चुनकर आए ।

लाल बहादुर शास्त्री को अंग्रेजों का विरोध करने के लिए कई बार जेल भेजा गया इनमें से सबसे प्रमुख  समय 1942 का था जब उन्हें कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं के साथ भारत छोड़ो आंदोलन की पूर्व संध्या पर जेल में डाल दिया गया। लाल बहादुर शास्त्री स्वतंत्रता संग्राम के लिए कितने महत्वपूर्ण थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश  के आजाद होते  ही कभी वे यूनाइटेड प्रोविंस की कैबिनेट का हिस्सा रहे तो कभी  केंद्रीय सरकार की कैबिनेट का हिस्सा रहे।

समाज सुधारक लाल बहादुर शास्त्री

आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे जब  लाल बहादुर शास्त्री के पिता का नाम शारदा प्रसाद श्रीवास्तव है तो लाल बहादुर शास्त्री का नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव क्यों नहीं  है । इसका प्रमुख कारण यह है कि लाल बहादुर शास्त्री इस बात पर विश्वास करते थे कि भगवान ने सभी को एक जैसा बनाया है इसीलिए सभी को एक जैसा सम्मान मिलना चाहिए और जाति व्यवस्था ऐसा कभी होने नहीं देगी इसीलिए उन्होंने कॉलेज जाने से पहले ही अपना सरनेम हमेशा के लिए त्याग दिया था, पूरे कॉलेज के दौरान वे केवल लाल बहादुर के नाम से जाने जाते थे।

जब उन्होंने काशी विद्यापीठ में अपनी पढ़ाई पूरी कर फिलॉसफी में डिग्री प्राप्त की तो इसके बाद उन्हें शास्त्री भी कहा जाने लगा। इस प्रकार से लाल बहादुर श्रीवास्तव को आप लाल बहादुर शास्त्री के नाम से जानते हैं। लाल बहादुर शास्त्री  हमेशा देश के गरीबों के विषय में सोचते रहते थे, गरीबों की समस्याओं के प्रति वे  कितना जागरूक थे इसका उदाहरण एक घटना से मिलता है, एक बार जब लाल बहादुर शास्त्री को अंग्रेजों ने जेल में बंद कर दिया तो उनकी पत्नी को ₹50 प्रति माह की पेंशन दी जाती थी , उनकी पत्नी ने बताया कि घर के खर्चे निकालने के बाद उनके पास हर महीने ₹10 बच जाते हैं, इस बात से लाल बहादुर शास्त्री अत्यंत क्रोधित हुए और अपनी पत्नी से कहा कि जितने भी ₹10 तुमने बचाएं हैं सभी सरकार को वापस भेज दो, इसके बाद उन्होंने सरकार को खत लिखा कि उनका घर केवल 40 रुपए में चल जाता है इसीलिए ₹10 किसी और जरूरतमंद व्यक्ति को दे दिये जाए।

लाल बहादुर शास्त्री बड़े नेता होने के नाते किसी भी तरह की तरजीह देने के खिलाफ थे, एक बार जब उनकी बेटी की बीमारी के वजह से उन्हें जेल से 15 दिनों की पैरोल मिली तो वे अपनी बेटी की सेवा के लिए आए, परंतु कुछ ही दिनों में बीमारी की वजह से उनकी बेटी चल बसी, तो उसका अंतिम संस्कार कर लाल बहादुर शास्त्री वापिस जेल  चले गए उन्होंने 15 दिन खत्म होने का इंतजार नहीं किया ।

लाल बहादुर शास्त्री एक मंत्री के रूप में

जैसा कि हम आपको बता ही चुके हैं कि लाल बहादुर शास्त्री राज्य एवं केंद्र सरकार दोनों में मंत्री रह चुके हैं। इसकी शुरुआत यूनाइटेड प्रोविंस से हुई जहां पर तब के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने उन्हें पुलिस एवं transport का मंत्री बनाया । लाल बहादुर शास्त्री को इसलिए याद किया जाता है कि उन्होंने पुलिस से डंडों का उपयोग ना कर पानी  की बौछार का उपयोग करने का आदेश दिया। यही नहीं भारत के अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश भी 1947 के आसपास दंगों की आग में लिपटा हुआ था, इस समय पुलिस विभाग के मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को इन दंगों को शांत कराने का श्रेय दिया जाता है ।

लाल बहादुर शास्त्री जब केंद्र में रेलवे मंत्री बने तो एक भयंकर  रेलवे दुर्घटना में कई नागरिक मारे गए तो इसकी जिम्मेदारी लेते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया, तब से लेकर बहुत लंबे समय तक भारत में इस बात की रीति रही कि अगर आपके मंत्रालय में किसी तरह  कि कोई दुर्घटना होती है तो आप इस्तीफा दे देते हैं परंतु पिछले 20 वर्षों से या देखा गया है कि यह रीति रिवाज भी बंद हो गया है। अब तो मंत्री बड़ी बड़ी दुर्घटनाओं के बाद भी अपने विभाग में डटे रहते हैं और इस्तीफा देना तो दूर इस्तीफा देने का प्रस्ताव भी नहीं देते।

लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने की कहानी

नेहरू जी की मृत्यु के पश्चात गुलजारीलाल नंदा को अस्थाई प्रधान मंत्री बना दिया गया था और कांग्रेस पार्टी में नई प्रधानमंत्री की खोज चालू हो गई थी। इस समय प्रधानमंत्री बनने के सबसे बड़े उम्मीदवार थे मोरारजी देसाई, परंतु कांग्रेस का एक बड़ा गुट उन्हें पसंद नहीं करता था क्योंकि मोरारजी देसाई का व्यवहार सभी से अच्छा नहीं था। इस गुट  का नेतृत्व कर रहे थे तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष कामराज और इस गुट को  सिंडिकेट कहा जाता था।  वे लोग नहीं चाहते थे कि मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और इसके लिए उन्होंने पहले इंदिरा गांधी को मनाने की कोशिश की जब उन्होंने मना कर दिया तो इसके लिए उन्होंने  लाल बहादुर शास्त्री को तैयार कर लिया और कांग्रेस की तरफ से लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे पूर्णकालिक प्रधानमंत्री बने ।

लाल बहादुर शास्त्री हमेशा दूसरों से वही काम करने को कहते जो वे खुद कर सकते थे, इसीलिए जब देश में गंभीर खाद्य संकट चल रहा था तब उन्होंने सोचा कि राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक से इस बात का अनुरोध किया जाए कि वे हफ्ते में एक दिन उपवास रहे, परंतु  ऐसा करने से पहले लाल बहादुर शास्त्री ने महीने भर उपवास रखकर  यह देखा कि आम नागरिक इसे सहन कर  पाएंगे कि नहीं एक बार ऐसा कर लेने के बाद ही उन्होंने आम जनता से अपील की। 

एक बार लाल बहादुर शास्त्री को पता चला कि उनके बेटे का प्रमोशन शायद लाल बहादुर शास्त्री  के बेटे होने की वजह से मिला, जब यह जानकारी उनके पास पहुंची तो उन्होंने संबंधित विभाग को प्रमोशन वापस लेने का आदेश दिया। लाल बहादुर शास्त्री के पास प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कार नहीं थी, और वे अपनी  सरकारी कार  को किसी और को उपयोग  में नहीं लेने देते थे।  जब उनके परिवार ने उनसे अनुरोध किया कि वे भी एक कार खरीद  ले, तो उन्होंने पता लगाया कि एक कार कितने की आती है तो उन्हें पता चला कि ₹12000 के आसपास की कीमत होगी, लाल बहादुर शास्त्री के बैंक अकाउंट में उस समय केवल ₹7000 थे तो उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक में ₹5000 के लोन के लिए  आवेदन दे दिया। 

दो-तीन दिन में ही लाल बहादुर शास्त्री का लोन पास हो गया और जब यह जानकारी उनके पास पहुंची तो उन्होंने कहा कि पिछले 10 साल का रिकॉर्ड निकाला जाए और यह देखा जाए कि आम आदमी का लोन  पास होने में कितना समय लगता है, उन्हें यह जानकारी मिली कि आम आदमी का लोन पास होने में कम से कम 1 महीने का समय लगता है इस पर उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारियों को बुलाकर डांट पिलाई और लोन के लिए फिर से अप्लाई  किया।

लाल बहादुर शास्त्री अपनी मृत्यु के पूर्व तक इस लोन को नहीं चुका पाए थे, जब उनकी मृत्यु के पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस लोन को माफ करने का प्रस्ताव दिया तो उनकी पत्नी ने कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकती वह उनकी पेंशन से इस लोन को समय रहते  लौटा देंगी।

भारत पाकिस्तान युद्ध

लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री काल  का  सबसे सुनहरा समय वह था जब  भारत ने 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध में विजय प्राप्त की, इस युद्ध में  लाल बहादुर शास्त्री ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

1960 के दशक में भारत शुरुआत में चाइना से एक युद्ध हार चुका था इस वजह से पाकिस्तान को इस बात की गलतफहमी थी कि भारत उसका मुकाबला करने की स्थिति में नहीं होगा ,इसलिए 1965   में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने भारत के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी  और शुरुआती चरणों में पाकिस्तान को काफी कामयाबी मिली, कश्मीर के बहुत सारे हिस्सों में पाकिस्तान की सेना आगे आ चुकी थी। तब सलाहकारों ने लाल बहादुर शास्त्री को सलाह दी कि क्यों ना पंजाब से दूसरा फ्रंट खोल दिया जाए।  यहां पर आपको यह समझना होगा कि कश्मीर में भारत और पाकिस्तान की सीमा को लाइन आफ कंट्रोल या एलओसी कहते हैं ,यह एक अस्थाई सीमा रेखा है और 1965 का युद्ध यहीं से शुरू हुआ था वहीं पंजाब राज्य में भारत और पाकिस्तान की सीमा अंतरराष्ट्रीय सीमा है, इसलिए लाइन आफ कंट्रोल को तोड़ना और अंतरराष्ट्रीय सीमा को तोड़ना दो अलग-अलग बातें हैं। 

जब लाल बहादुर शास्त्री को यह सलाह मिली कि अंतर्राष्ट्रीय सीमा को तोड़कर पाकिस्तान के खिलाफ पंजाब से एक नया   फ्रंट  खोल दिया जाए, तो विदेश विभाग ने यह कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने की वजह से विदेश में भारत का सहयोग कम हो सकता है, परंतु लाल बहादुर शास्त्री इस कदम को सही मानते थे इसीलिए उन्होंने सेना को आदेश दिया कि वह पंजाब से पाकिस्तान के खिलाफ एक नया फ्रंट खोलें।  अयूब खान को इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा भी पार कर सकता है, इसीलिए पंजाब वाले  फ्रंट  में  भारत को भारी कामयाबी मिली। भारत की कामयाबी का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि भारतीय आर्मी  लाहौर शहर तक पहुंच गई थी।  ऐसा होने पर अयूब खान ने अमेरिका की मदद से  जैसे तैसे सीजफायर करवाया।

जब कभी लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री काल के विषय में बात होगी तो भारत पाकिस्तान युद्ध को सुनहरे अक्षरों से लिखा जाएगा। इसी युद्ध के पश्चात भारत एवं पाकिस्तान के मध्य समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए लाल बहादुर शास्त्री ताशकंद गए हुए थे जहां पर उन्होंने अपनी अंतिम सांसें ली। 11 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में मृत्यु हो गई।  उनकी समाधि नई दिल्ली में विजय घाट में है।

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