कबीरदास की मृत्यु कैसे हुई थी।

पंद्रहवीं शताब्दी के निर्गुण संत कवि कबीरदास का जन्म जितना रहस्यमय है उतनी ही उनकी मृत्यु और मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर हुआ विवाद भी है। कबीरदास जीवन भर काशी के कबीर चौरा नामक जगह पर रहे किन्तु अपने जीवन के अंतिम समय में वे काशी छोड़कर वर्तमान संत कबीर नगर जिले में स्थित मगहर नाम की जगह पर चले गए। किन्तु कबीर काशी छोड़कर मगहर क्यों गए और कबीर की मृत्यु कैसे हुई, इस विषय में इतिहासकारों की अलग-अलग राय है। आइए जानते हैं की आखिर वो कौन से कारण थे जिनके कारण कबीरदास को मगहर जाना पड़ा और कबीरदास ने अपनी जीवन लीला कब समाप्त की ?

kabir das ki mrityu kaise hui

यदि हम कबीरदास के काव्य पर दृष्टि डालें तो यह सहज ही पता चलता है कि कबीरदास निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे और जीते जी ही वे ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त कर चुके थे। और यदि ऐसा था तो मोक्ष प्राप्त कर चुके कबीर के लिए किसी भी स्थान का कोई विशेष महत्व नहीं था फिर चाहे वो काशी हो या मगहर।

कबीर जब काशी से मगहर आए –

प्राचीन काल से ऐसी मान्यता है कि काशी में यदि मृत्यु हो तो मनुष्य मुक्त हो जाता है। लेकिन दूसरी ओर मगहर के विषय में यह मान्यता है कि जिसकी मृत्यु मगहर में होती है उसकी मुक्ति नहीं होती तथा उसका गधे का जन्म होता है। कबीरदास की मृत्यु के विषय में जो बात सबसे ज्यादा प्रचलित है वह यह है कि उन्होने मगहर के विषय में लोगों के बीच जो अंधविश्वास था उसे तोड़ने के लिए अपने प्राण मगहर में त्यागे। कबीरदास पूरी जिंदगी अपने काव्य और जीवन के माध्यम से धार्मिक अंधविश्वासों और रीति रीवाजों कि आलोचना करते रहे।

कबीर का कहना था कि जिसने जीवन भर ईश्वर चिंतन किया हो उसे फिर काशी या किसी अन्य स्थान में शरीर त्याग करने की क्या आवश्यकता। यदि काशी में मृत्यु होने से ही मुक्ति मिल जाती हो तो जीवन भर राम-नाम जपने और ध्यान-साधना करने की क्या आवश्यकता। इसी कारण से कबीर ने मृत्यु से करीब तीन वर्ष पहले मगहर में जाकर अपने प्राण त्यागे थे। मगहर में कबीरदास की समाधि-स्थल मौजूद है जहां दर्शनार्थियों का मेला लगा रहता है।

कबीर ने खुद ही कहा है:

लोका मति के भोरा रे, जो काशी तन तजै कबीरा, तौ रामहि कौन निहोरा रे”

1518 इसवीं में मगहर में कबीर दास की मृत्यु के बाद उनके हिन्दू और मुस्लिम शिष्यों के बीच विवाद हो गया कि उनके शव को दफनाया जाएगा या जलाया जाएगा। मगहर के नवाब बिजली शाह और बनारस के राजा वीर सिंह बघेला के बीच कबीर के अंतिम संस्कार को लेकर मतभेद भी हुआ। किन्तु कबीर दास के शव को जिस चद्दर से ढका गया था उसे हटाने पर उनके शरीर के बदले केवल दो फूल मिले। इस चमत्कारी घटना के बाद दोनों संप्रदाय के लोगों ने उन फूलों को आपस में बाँट लिया।

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