मध्यप्रदेश में कुंभ मेला कहां लगता है।

हिन्दू धर्म के सबसे बड़े आयोजनों में से एक आयोजन कुंभ मेला है। इस मेले में भारत समेत विश्व के दूसरे हिस्सों में मौजूद लोग आस्था के इस महाकुंभ में भाग लेने के लिए आते हैं। कुंभ मेला भारत के चार अलग अलग राज्यों में प्रत्येक 12 साल पर आयोजित की जाती है। इन चार स्थानों में से एक स्थान मध्यप्रदेश में भी पड़ता है। यह मेला मध्यप्रदेश के उज्जैन में आयोजित होता है।

madhya pradesh me kumbh ka mela kaha lagta hai

कुंभ मेले का आयोजन ग्रहों की दिशा के आधार पर प्रत्येक 12 साल पर आयोजित की जाती है। अगला कुंभ मेला अगले साल यानी 2019 में इलाहाबाद ( अब प्रयागराज) में होने वाला हैं। 2019 कुंभ मेला लगभग 50 दिन तक चेलगा। मध्यप्रदेश के उज्जैन में पिछली बार कुम्भ मेले का आयोजन 2016 में हुआ था। अब उज्जैन में अगला कुंभ मेला 2028 मे आयोजित किया जाएगा।

कुंभ मेले का इतिहास

हिन्दू धर्म में कुंभ मेले की शुरुआत को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। उन्ही में से एक कथाओं के अनुसार जब पृथ्वी पर असुरों यानी राक्षसों का प्रकोप काफी बढ़ गया और वह देवताओं पर अत्याचार करने लगे तो देवताओं ने भगवान को मनाने के लिए तपस्या शुरू कर दी। इसके पश्चात प्रसन्न होने पर समुन्द्र से कई चीज़े प्रकट हुई। इस घटना को समुन्द्र मंथन के नाम से भी जाना जाता है।  इसी क्रम में समुन्द्र से एक मटकी भी प्रकट हुआ। कथाओं के अनुसार उस मटकी में अमृत भड़ा हुआ था। इस अमृत के बारे में कहा जाता है की यह दैवीय शक्ति से  युक्त था। इस अमृत के लिए दैत्यों और देवताओं के बीच युद्ध हुआ। इसी क्रम में उस मटकी से अमृत की कुछ बूंद चार अलग अलग जगहों पर गिरी। इसमें एक जगह मध्यप्रदेश का उज्जैन शहर भी है। इसी कारण उज्जैन समेत सभी चारों स्थानों पर कुंभ मेला मनाया जाता है।

कुंभ मेले की शुरुआत को ले कर कोई एक राय नही है। इतिहासकारों का मानना है की ऐसे किसी मेले की चर्चा हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रन्थों में देखने को नही मिलता है। कुंभ मेले को ले कर ऐसी भी मान्यता है की सबसे पहले इसकी शुरुआत धर्म संसद के रूप शुरू की गयी थी। इस मेले का उद्देश्य हिंदुओ को एकत्र करना था। एक समय हिन्दू धर्म को बौद्ध और जैन धर्म से कड़ी चुनौती मिलने लगी थी। और हिन्दू धर्म सिमटने लगा था। तब आठवी सदी की शुरुआत में ही आदिशंकर नाम के एक बड़े दार्शनिक ने हिन्दू धर्म को फिर से जोड़ने का काम शुरू किया। इस लिए ही उन्होंने इस मेले का आयोजन किया। धीरे धीरे यह मेला लोकप्रिय होता गया और हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग बन गया।

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