महात्मा गांधी की जीवनी – Mahatma Gandhi Biography In Hindi

महात्मा गांधी जिन्हें सत्य का प्रहरी और भारत के राष्ट्रपिता के रूप में पूरी दुनिया में जाना पहचाना जाता है। आज उन्हीं के बारे में अर्थात महात्मा गांधी की जीवनी (Mahatma Gandhi biography in hindi) के बारे में discuss करेंगे। जिसमें हम महात्मा गांधी का जीवन परिचय के साथ महात्मा गांधी की हत्या, असहयोग आंदोलन और विदेश यात्रा के बारे में भी विस्तृत रूप से जानेंगे।

-: महात्मा गाँधी – सत्य का प्रहरी :-

भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए इस बात पर विश्वास करना कठिन हो जाएगा कि महात्मा गांधी जैसा हाड़ मांस का व्यक्ति भी कभी इस दुनिया पर चला था – अल्बर्ट आइंस्टाइन

mahatma gandhi biography in hindi
1. नाम मोहनदास करमचंद गांधी
2. जन्म 2 अक्टूबर 1869
3. मृत्यु 30 जनवरी 1948
4. शिक्षा बैचलर ऑफ लॉ
5. पिता करमचंद गाँधी
6. माता पुतलीबाई
7. पत्नी कस्तूरबा बाई
8. संताने (children)हरिलाल, मणिलाल, रामदास, देवदा

महात्मा गांधी का जीवन परिचय – Mahatma Gandhi biography and history in hindi

महात्मा गाँधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था। मोहनदास करमचंद गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। गाँधी जी के पिता का नाम करमचंद गाँधी था जो उस समय के पोरबंदर रियासत के दीवान थे। गाँधी जी की मां का नाम पुतलीबाई था जो कि करमचंद गाँधी की चौथी पत्नी थी।  सन 1874 में गाँधी जी का परिवार पोरबंदर छोड़कर राजकोट में स्थापित हो गया। इस परिवार के यहां आने के कुछ समय पश्चात इसके मुखिया करमचंद गाँधी को राजकोट के दीवान का पद मिल गया। गाँधी जी की शुरुआती शिक्षा इसी राजकोट के विभिन्न स्कूलों में हुई। गाँधी जी अपने शुरुआती शैक्षणिक जीवन में एक औसत छात्र थे। सन 1883 में 13 वर्ष की उम्र में गाँधी जी का विवाह 14 वर्षीय कस्तूरबाबाई माखनजी कपाड़िया से हुआ,जिन्हे बाद में सिर्फ कस्तूरबा गाँधी के नाम से जाना गया।

गाँधी जी ने बाद में अपनी शादी को याद करते हुए एक बार कहा था कि “हम तो इतने छोटे थे कि हमारे लिए शादी का मतलब नए कपड़े पहनना, मिठाई खाना और अपने रिश्तेदारों के साथ खेलना था

सन 1885 में गाँधी जी के पिता का निधन हो गया और इसी वर्ष गाँधी जी को अपनी पहली औलाद हुई जो कि केवल कुछ ही दिनों तक जीवित रह सकी अर्थात 1885 का साल गाँधी परिवार के लिए मृत्यु का साल रहा। इसके पश्चात गाँधी जी  को चार और संतान हुई 1888 में हरिलाल,  1892 में मणिलाल, 1897 में रामदास और 1900 में देवदास।

महात्मा गाँधी 1888 में बैरिस्टर की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड चले गए। वहां गाँधी जी के शुरुआती दिन काफी कठिनाई भरे बीते। उन्हें कई रातों तक भूखा सोना पड़ा क्योंकि उनके मकान मालिक जो मांसाहारी खाना  दिया करती थी वह गाँधी जी को कतई पसंद नहीं था। इसके पश्चात गाँधी जी ने लंदन के कुछ शाकाहारी भोजनालयों को ढूंढ निकाला जिससे उनके पेट की तृष्णा शांत हो सके। गाँधी जी ने लंदन में अपने शुरुआती दिनों में अंग्रेजी चाल ढाल में बदलने का प्रयास किया , यहां तक कि उन्होंने डांसिंग की क्लास भी ली , परंतु उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि यह अंग्रेजी  चाल ढाल उनके लिए नहीं थी। लंदन में गाँधी जी ने हेनरी साल्ट के लेखों से प्रभावित होकर वेजीटेरियन सोसायटी जॉइन कर ली और कुछ ही समय बाद इसकी एग्जीक्यूटिव कमिटी का हिस्सा भी बन गए। यहां उनकी मुलाकात  थियोसॉफिकल सोसायटी के कुछ सदस्यों से हुई यह वह सोसाइटी थी जो वैश्विक भाई चारे के लिए कार्य करती थी, जिसका बौद्धिक एवं हिंदू  साहित्य पर काफी ध्यान था । इसी संगत की वजह से गाँधी जी ने भगवद गीता पढ़ना चालू कर दिया। सन 1891 में बैरिस्टर बनने के पश्चात उन्होंने इंग्लैंड से भारत की ओर प्रस्थान किया।

भारत पहुंचकर उन्हें पता चला कि जब वे इंग्लैंड में थे तब उनकी मां की मृत्यु हो गई थी  एवं इस बात से  उनको  अनभिज्ञ  रखा गया था।  इसके पश्चात गाँधी जी ने  उस समय के बॉम्बे में अपनी लॉ प्रैक्टिस स्थापित करने का असफल प्रयास किया। इस असफलता के पश्चात वे राजकोट लौट आए और वहीँ  अपनी लॉ प्रैक्टिस करने लगे जिससे उन्हें ठीक-ठाक कमाई होने लगी। परन्तु उनकी इस कमाई पर भी तब रोक लग गई जब गाँधी जी की स्थानीय ब्रिटिश अधिकारी सैम सनी  से तनातनी हो गई।इसी समय काठियावाड़ के एक मुस्लिम व्यापारी दादा अब्दुल्ला ने गाँधी जी से संपर्क किया, दादा अब्दुल्लाह साउथ अफ्रीका में एक सफल शिपिंग कारोबार चलाते थे साउथ अफ्रीका में उनके किसी रिश्तेदार को एक वकील की जरूरत थी और उनका मानना था कि वह किसी काठियावाड़ी को इसके लिए तरजीह  देंगे, फलस्वरुप गाँधी जी को 105 पाउंड के वेतन के साथ इस नौकरी का  प्रस्ताव दिया गया। गाँधी जी ने यह सोचते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया  कि यह केवल 1 साल के लिए है और साउथ अफ्रीका में है जो कि ब्रिटिश साम्राज्य की ही एक और कॉलोनी है।

मोहनदास करमचंद गाँधी का महात्मा गाँधी बनने की शुरुआत :-

साउथ अफ्रीका प्रवास :-

एक औसत  बैरिस्टर के शांति दूत महात्मा गाँधी बनने की शुरुआत गाँधी जी के साउथ अफ्रीका प्रवास से होती है। जैसा कि हम जानते ही हैं कि नौकरी के इस प्रस्ताव को गाँधी जी ने केवल इसलिए स्वीकार किया था क्योंकि  उन्हें लगता था कि यह नौकरी उन्हें केवल 1 वर्ष के लिए ही करनी है पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। 1893 में 23 वर्षीय गाँधी जब साउथ अफ्रीका आए तो उन्हें इस बात का कतई अंदाजा नहीं था कि वह अपने अगले 21 वर्ष यहीं बिताने वाले हैं। यही 21 वर्ष  गाँधी जी की  राजनीतिक शिक्षा के वर्ष थे  और इस शिक्षा  की शुरूआत उनके आने के साथ ही हो गई जब उन्हें रंगभेद का सामना करना पड़ा। रंगभेद की ऐसी कई घटनाएं हैं जिनका सामना गाँधी जी को साउथ अफ्रीका में करना पड़ा उनमें से कुछ इस तरह है, एक बार गाँधी जी को यूरोपीय यात्री के बाजू में बैठने से मना कर दिया गया और जब इन्होंने इसका विरोध किया तो उनके साथ मारपीट की गई, और उन्हें ट्रैन से बाहर फेंक दिया गया । एक बार अंग्रेज व्यक्ति के घर के पास से गुजर रहे थे तो उन्हें ऐसा करने की जुर्रत करने के लिए गटर में फेंक दिया गया। यह सारी घटनाएं इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गाँधी जी  संपन्न परिवार में जन्मे थे, उन्हें वह शिक्षा मिली जो केवल संपन्न परिवार के लिए संभव थी यहां तक कि जब वे साउथ अफ्रीका आए तो वे अपने आप को पहले ब्रिटिश मानते थे फिर भारतीय मानते थे, परंतु रंगभेद की घटनाओं ने उन्हें एहसास करा दिया कि संपन्नता के इस अनुक्रम में वे आखिरी स्थान में है और इस आखिरी स्थान क सबसे प्रमुख कारण उनका गोरा न होना है या सरल शब्दों में कहें तो उनका भारतीय होना है।

राजनीति की ओर पहले कदम :-

जिस अब्दुल्ला केस की वजह से गाँधी जी साउथ अफ्रीका में थे 1894 में वह खत्म हो चुका था और गाँधी जी अपने देश लौटने की तैयारी कर रहे थे इसी वक्त उन्हें पता चला कि स्थानीय नटाल गवर्नमेंट एक भेदभाव पूर्ण प्रस्ताव लाने वाली है इसके तहत वोट डालने का अधिकार केवल यूरोपीय नागरिकों के लिए सुरक्षित रहेगा। गाँधी जी ने इस प्रस्ताव का विरोध करने के लिए कुछ दिन और साउथ अफ्रीका में रहने का निर्णय लिया और यहां से उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई। उन्होंने भारतीयों के साउथ अफ्रीका में अधिकारों की रक्षा के लिए बनने वाली नटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना में मदद की, और इसी संस्था की मदद से उन्होंने साउथ अफ्रीका में रहने  वालों भारतीयों को एक राजनीतिक ताकत बना दिया। 1897 में गाँधी जी जब डरबन में आए तो उन पर एक भीड़ ने हमला कर दिया वह एक पुलिस ऑफिसर की पत्नी की मदद से  इस  भीड़  से  जैसे तैसे अपनी जान बचा पाए  परंतु इसके बात भी उन्होंने पुलिस में  किसी भी दोषी व्यक्ति के खिलाफ  रिपोर्ट करने से मना कर दिया इससे ज्ञात होता है कि उस समय भी उनका अहिंसा पर कितना विश्वास था।

गाँधी जी ने सत्याग्रह के साथ अपना पहला प्रयोग सन 1996 जोहानेसबर्ग में किया, ट्रांसवाल सरकार ने एक प्रस्ताव लाया जिसके तहत भारतीय एवं चाइनीज आबादी को  पंजीकृत करना आवश्यक हो गया । गाँधी जी ने इसके विरोध के लिए अहिंसक आंदोलन का सहारा लिया। गाँधी जी ने लोगों को इस नए कानून का बहिष्कार करने के लिए कहा और इसकी सजा भुगतने के लिए भी कहा। यही सब वे तौर-तरीके थे जो गाँधी जी भारत को आजाद कराने के लिए काम आने वाले  वाले थे।

गाँधीजी के अहिंसा के इन सब प्रयोगों की वजह से  वे दुनिया के उन सारे मुल्कों में जो अपनी आजादी के लिए लड़ रहे थे काफी विख्यात हो चुके थे और अब इस बात की तैयारी थी कि वह अपने मुल्क लौट कर उसके स्वतंत्रता संग्राम में अपना सहयोग देंगे।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत की अंतिम स्वतंत्रता लड़ाई की शुरुआत

गाँधी जी की भारत बापसी :-

गोपाल कृष्ण गोखले के बुलावे में गाँधी जी  सन 1915 में भारत वापस आए। गाँधी जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जॉइन की,  गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें  भारत की समस्याओं से अवगत कराया । गोपाल कृष्ण गोखले उस समय कांग्रेस के सबसे महत्वपूर्ण नेता थे और उनके बारे में माना जाता था कि वह व्यवस्था के अंदर रहकर ही काम करना चाहते थे। परंतु गाँधी जी का विश्वास था कि वह भारत की समस्याओं को तभी जान पाएंगे जब  भारत की यात्रा करेंगे तो ऐसा करने के लिए गाँधी जी ने भारत की लंबी रेल यात्रा की। अगले 5 वर्षों तक गाँधी जी  धीरे-धीरे भारतीय  राजनीतिक परिदृश्य में अपने पैर पसारने लगे और उनकी प्रसिद्धि हर दिन बढ़ती गई ।1920 तक वह समय आ गया था जब यह माना जाने लगा था कि गाँधी जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अघोषित लीडर हैं। गाँधी जी के नेतृत्व वाली  कांग्रेस पुरानी कांग्रेस नहीं थी जो व्यवस्था के अंदर रहकर ही कार्य करना चाहती थी, गाँधी जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस लगातार अपनी मांगों में वृद्धि करती रही और इसकी परिणति सन 1930 में हुई जब  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने  पूर्ण स्वराज की मांग की। 1915 में गाँधी जी के भारत आने से लेकर 1930 में जो भारत में पूर्ण स्वराज की मांग के बीच कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई जो कि इस तरह से हैं।

गाँधी जी  ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ पहला बड़ा आंदोलन बिहार के चंपारण में किया। चंपारण का आंदोलन स्थानीय किसानों के पक्ष में एवं स्थानीय जमीदार जो कि मूलतः ब्रिटिश थे के खिलाफ था। यहां पर किसानों को मजबूर किया जा रहा था कि वह नील की खेती करें और उसे एक निश्चित दाम पर अपने जमीदारों को दें, किसान ऐसा करने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि ऐसा करने की वजह से उन्हें लगातार नुकसान हो रहा था, किसानों ने गाँधी जी  से याचना की कि वे यहां पर आए और उनके इस आंदोलन का नेतृत्व करें। स्थानीय प्रशासन गाँधी जी के इस कदम से पूर्णतः  अचंभित रह गया एवं उन्हें किसानों की काफी सारी मांगों को मानना पड़ा।

गाँधी जी का अगला बड़ा आंदोलन खेड़ा गुजरात में था। खेड़ा के किसान बाढ़ एवं सूखे से काफी पीड़ित थे एवं ब्रिटिश साम्राज्य से भी टैक्स में छूट चाहते थे ।गाँधी जी ने खेड़ा आकर इस आंदोलन का नेतृत्व किया एवं इसके लिए उन्होंने असहयोग की नीति अपनाई इसके तहत अंग्रेज सरकार को किसी भी तरह के टैक्स से वंचित रखने का कदम उठाया गया। इसके लिए गाँधी ने पूरे देश से समर्थन की याचना की, अंग्रेजी  प्रशासन इस आंदोलन को कुचलने का पूरा प्रयास करता रहा परंतु अंत में  5 महीने के अंतराल के पश्चात गाँधी जी की विजय हुई और  अंग्रेजी प्रशासन ने यह माना कि जब तक सूखा खत्म  नहीं हो जाता है किसी भी तरह का टैक्स नहीं लिया जाएगा। इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें आजादी के दो  सबसे बड़े नेताओं  ने एक साथ मिलकर काम किया एक तो थे महात्मा गाँधी और दूसरे थे सरदार वल्लभभाई पटेल।

गाँधी जी का अगला कदम था खिलाफत आंदोलन की मदद करना। गाँधी जी इस बात से भली-भांति परिचित थेकि अंग्रेजो ने भारत में राज्य के लिए बांटो और राज करो की नीति अपनाई थी इसके तहत उन्होंने हमेशा हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लगातार प्रयास किए क्योंकि उन्हें पता था जब तक कि भारत के दो सबसे बड़े धर्म एक दूसरे के खिलाफ हैं इन पर शासन करना आसान है। अंग्रेजों की इस नीति का सामना करने के लिए गाँधी जी  ने प्रयत्न किया कि यह दोनों धर्म एक दूसरे के करीब आ सकें और इसी के तहत उन्होंने खिलाफत आंदोलन जोकि एक मुस्लिम आंदोलन था का भरपूर समर्थन किया, जिसके लिए उन्हें मुस्लिम समाज से काफी साधुवाद मिला।

असहयोग आंदोलन :-

भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई के परिपेक्ष में तीन सबसे प्रमुख आंदोलन हैं इनमें सबसे पहला असहयोग आंदोलन है। असहयोग आंदोलन के बीज तब पड़े जब गाँधी जी की कई याचनाओं  के बावजूद ब्रिटिश रोलेट एक्ट पास कर दिया गया । गाँधी जी ने इसके विरोध के लिए पूरे मुल्क में सत्याग्रह का आवाहन किया। इस आंदोलन के दौरान एक भयावह घटना सामने आई जो कि अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुई थी। जलियांवाला बाग में रोलेट एक्ट के विरोध के लिए एक भीड़ इकट्ठी हो गई थी, जनरल डायर ने इस भीड़  पर अंधाधुंध गोली चलाने के आदेश दे दिए जिसके फलस्वरूप सैकड़ों मासूम जानी चली गई। इसी आंदोलन के दौरान गाँधी जी  ने अपनी सत्याग्रह को और भी बृहद बनाते हुए यह आह्वान किया कि सारे ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार किया जाए। गाँधी जी भारतीय परिपेक्ष्य  में बहुत ऊंचा दर्जा प्राप्त कर चुके थे और उनके ब्रिटिश उत्पादों के बहिष्कार के आव्हान को सारी जनता ने सुना और  और ऐसे सभी उत्पादों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया जो भारत में नहीं बने थे। इस दौर में बहुत बार ऐसा हुआ की  ब्रिटिश दमन की वजह से  कभी कभी जनता नाराज होकर हिंसा का रास्ता अपनाने लगी परंतु गाँधी जी ने उन्हें ऐसा करने से रोका और सविनय अवज्ञा का मार्ग कभी नहीं छोड़ा।

नमक सत्याग्रह :-

1928 के कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार से यह मांग की कि वे उन्हें डोमिनियन स्टेटस डे दें अगर ऐसा नहीं होता है तो वे अपने अगले आंदोलन की और बढ़ेंगे। जब गाँधी जी को यह समझ में आ गया कि ब्रिटिश उनकी किसी भी बात को नहीं मानने वाले हैं तो उन्होंने नमक सत्याग्रह का आवाहन किया। उन्होंने कहा कि दांडी में नमक बनाकर प्रतीकात्मक रूप से ब्रिटिश कानून का उल्लंघन करेंगे और इसके लिए उन्होंने दांडी यात्रा प्रारंभ की और इसके अंत में नमक बनाकर ब्रिटिश कानून का उल्लंघन किया जिसके लिए उन्हें जल्द ही गिरफ्तार कर लिया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन :-

द्वितीय विश्व युद्ध के समय गाँधी जी ने इसमें भारत के किसी भी तरह के सहयोग से मना कर दिया उनके इस कदम से कुछ बड़े नेता जैसे कि सरदार बल्लभ भाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद सहमत नहीं थे। गाँधी जी का मानना था कि भारत ऐसे किसी भी युद्ध में शामिल ना हो  जो लोकतंत्र के नाम पर हो रहा है परंतु इसमें शामिल भारत में  लोकतंत्र नहीं है  यह कैसे संभव है। इसके साथ ही साथ उन्होंने फासीवाद का भी पुरजोर विरोध किया। गाँधी जी ने मुंबई एक भाषण दिया जिसके तहत उन्होंने भारत  के लिए  पूर्ण स्वराज की मांग की  और इसके लिए एक नए आंदोलन का आवाहन किया । इसके साथ ही साथ उन्होंने यह बात भी साफ कर दी कि अंग्रेजो के खिलाफ किसी भी तरह की हिंसा ना की जाए परंतु आजादी के सिपाही अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मरने के लिए तैयार रहें और इसके लिए उन्होंने करो या मरो का नारा दिया । इसके पश्चात गाँधी जी सहित कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार गाँधी जी दो वर्ष  जेल में रहे इसी दौरान 1944 में उनके पर्सनल सेक्रेट्री महादेव देसाई एवं उनकी पत्नी कस्तूरबा बाई का निधन हो गया।

भारत की आजादी  एवं विभाजन :-

सन 1946 आते-आते तो यह निश्चित हो गया था कि भारत 1947 में आजाद हो जाएगा परंतु इसके साथ ही साथ यह भी निश्चित हो गया था कि आजादी के पश्चात एक नहीं बल्कि दो देश बनेंगे  एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य भारत एवं दूसरा इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान। इन दोनों बातों का मतलब था कि गाँधी जी  का एक सपना भारत की आजादी के साथ पूरा हो रहा था वही दूसरा सपना हिंदू मुस्लिम एकता टूट रहा था। गाँधी जी अंतिम वक्त तक  प्रयास करते रहे कि किसी तरह भारत-पाकिस्तान के विभाजन को टाला जा सके परंतु उनके सारे प्रयास असफल रहे। 15 अगस्त 1947 को वह दिन आ गया जिसका हर भारतवासी दशकों से इंतजार कर रहा था परंतु गाँधी जी इस दिन खुश नहीं थे  इसका कारण भारत में चल रहे भयंकर मजहबी  दंगे थे। उन्होंने इन दंगों को रोकने के लिए यात्रा प्रारंभ की और बहुत हद तक इन्हें रोकने में सफलता पाई।

उन्होंने पाकिस्तान के बनने की सच्चाई को तो स्वीकार कर लिया था परंतु वे अपने हिंदू मुस्लिम भाईचारे  को बनाए रखने  के कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटे।  इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गाँधी जी ने अपना अंतिम उपवास  सिर्फ इस बात के लिए किया था कि पाकिस्तान को पाकिस्तान के हिस्से की रकम भारत के खजाने से मिल सके।

गाँधी जी की हत्या एवं उनकी विरासत :-

महात्मा गाँधी ने इस दुनिया में 78 वर्ष बिताए  परंतु उनकी सत्य अहिंसा की विरासत इस दुनिया को सदियों तक सही रास्ता दिखाती रहेगी।

अहिंसा के पुजारी के जीवन का अंतिम दिन हिंसा से भरा हुआ था। 30 जनवरी 1948 की शाम 5 : 17 पर नाथूराम गोडसे नामक युवक ने गाँधी जी पर तीन गोलियां चलाई और अहिंसा का यह सेवक हे राम ! कहते हुए इस दुनिया से चला गया।

गाँधी जी अपनी मृत्यु के समय तक एक व्यक्ति ना होकर विचार बन गए थे इसका उदाहरण आगे के वर्षों में मिलता है जब अमरीका में मार्टिन लूथर किंग गाँधी के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं वही नेल्सन मंडेला भी गाँधी के बनाए रास्ते पर चलते हैं। गाँधी जी  की जीवनी का  नाम माय एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ अर्थात मेरे सत्य के साथ प्रयोग है। अहिंसा का यह सिपाही इस दुनिया में अपने विचार छोड़ गया  जिन विचारों का उपयोग करते हुए कई देशों ने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की, कई इंसानो ने अपनी इंसानियत प्राप्त किया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि गाँधी का केवल शरीर मरा विचार नहीं  उनके विचार आज भी जिंदा है जो समय समय पर हमें रास्ता दिखाते हैं और बताते हैं कि अहिंसा का रास्ता कठिन भले ही है पर सबसे उचित है।

महात्मा गांधी से हमें बहुत सारी शिक्षा मिलती है आपको यह महात्मा गांधी की जीवनी पढ़कर कौन सी शिक्षा मिली इसके बारे में हमें comment करके जरूर बताएं और अगर आप इस लेख महात्मा गांधी का जीवन परिचय (mahatma gandhi biography in hindi) के बारे में अन्य जानकारी देना चाहते हैं तो वह भी हमे कमेंट के माध्यम से बताऐ हम गांधी जी से संबंधित जानकारी को इस पोस्ट में जल्द से जल्द जोड़ने का प्रयास करेंगे। धन्यवाद!

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