माइक्रोसॉफ्ट के King के नाम से किसे जाना जाता है ?

बिल गेट्स को  माइक्रोसॉफ्ट के किंग के नाम से जाना जाता है । अब जब आपने यह जान लिया कि  किसे माइक्रोसॉफ्ट के किंग के नाम से  जाना जाता है? तो आगे चलकर माइक्रोसॉफ्ट एवं  बिल गेट्स दोनों के बारे में थोड़ी जानकारी से आपको अवगत कराते हैं ।

माइक्रोसॉफ्ट , Computer Systems के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है।  दुनिया के लगभग लगभग 85% कंप्यूटर माइक्रोसॉफ्ट का बनाया हुआ ऑपरेटिंग सिस्टम ही उपयोग में लाते हैं। माइक्रोसॉफ्ट के वर्तमान चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर सत्य नडेला है जो कि भारतीय मूल के एक व्यक्ति हैं। माइक्रोसॉफ्ट का ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ ही साथ  इलेक्ट्रॉनिक गेम की दुनिया में भी बड़ा नाम है।

इस कंपनी की शुरुआत 1975 में बिल गेट्स और उनके मित्र पौल एलेन ने की थी। इसकी शुरुआत बेसिक जैसी प्रोग्रामिंग लैंग्वेज को तब के मेनफ्रेम कंप्यूटर में उपयोग में लाए जाने लायक बनाने के साथ हुई थी।  इसके बाद  इस कंपनी ने पहला बड़ा समझौता एप्पल कंप्यूटर के साथ किया और उसके बाद तत्कालीन आईबीएम के साथ ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार करने का समझौता किया जिसके बाद इस कंपनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।  इन्होंने पहले एमएस डॉस जिसे  माइक्रोसॉफ्ट डिस्क ऑपरेटिंग सिस्टम भी कहते हैं बनाया , यह ऑपरेटिंग सिस्टम कमांड प्रॉन्प्ट पर काम करता था । उसके बाद विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम बनाया जो कि Graphical user interface पर काम करता था, आज तक माइक्रोसॉफ्ट विंडोज के ही नए वर्जन  बना रही है।

वैसे तो माइक्रोसॉफ्ट कंपनी कई क्षेत्रों में सफल रही है परंतु उसे कई क्षेत्रों में  एप्पल एवं गूगल जैसी कंपनियों से हार का सामना करना पड़ा है। माइक्रोसॉफ्ट का वर्तमान में वैल्यूएशन 1 ट्रिलियन डॉलर के आसपास का है भारतीय परिदृश्य में कहा जाए तो लगभग 7 लाख करोड रुपए के आसपास का।

Microsoft King बिल गेट्स का जन्म एवं  शिक्षा की जानकारी

बिल गेट्स का जन्म 28 अक्टूबर 1955 को अमेंरिका  के  सीएटल शहर में हुआ था , उनके पिता का नाम विलियम गेट्स  एवं माता का नाम मैरी गेट्स  है। बिल गेट्स हमेशा से  पढ़ाई में काफी अच्छे थे इसीलिए उन्हें अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध कॉलेज हावर्ड में दाखिला मिल गया।  परंतु  बिल गेट्स हमेशा से Entrepreneur बनना चाहते थे , और उन्हें लगता था कि उनके पास इसके लिए सारी काबिलियत है और कॉलेज में वे ऐसा कुछ भी नहीं पढ़ रहे हैं जो उन्हें नहीं आता है।

इसीलिए उन्होंने इस बात का निर्णय लिया कि कॉलेज में और समय  व्यर्थ करने की वजाय अपने सपनों की तरफ आगे बढ़ा जाए।  इसीलिए उन्होंने अपने दोस्त पौल एलेन के साथ मिलकर माइक्रोसॉफ्ट नाम की कंपनी की शुरुआत की। इस कंपनी की शुरुआत बेसिक जैसी लैंग्वेज को अल्टेयर सिस्टम में काम करने लायक बनाने के  साथ हुई ।  परंतु माइक्रोसॉफ्ट अभी एक छोटी कंपनी ही थी और यह छोटी कंपनी ही रहने वाली थी जब तक कि इसका तत्कालीन बिजनेस जॉइंट आईबीएम के साथ समझौता नहीं हुआ था जिसके बारे में हम आगे चलकर पड़ेंगे।

डील ऑफ द सेंचुरी / Deal of the century: माइक्रोसॉफ्ट और आईबीएम के बीच ऑपरेटिंग सिस्टम को लेकर जो डील हुई थी उसे डील ऑफ द सेंचुरी कहा जाता है। हुआ कुछ यूं कि   आईबीएम  ने उस समय एक नई इलेक्ट्रॉनिक चिप बनाई थी और इसका इस्तेमाल वे पर्सनल कंप्यूटर बनाने में करना चाहते थे। परंतु इस पर्सनल कंप्यूटर के लिए आईबीएम के पास कोई ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं था, ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस तरह के पर्सनल कंप्यूटर के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने के लिए प्रसिद्ध था जब उससे मिलने आईबीएम के अधिकारी गए तो वह हवाई जहाज उड़ा रहा था और आईबीएम के अधिकारियों से नहीं मिल पाया ( कई विशेषज्ञ कहते हैं कि उसकी मुलाकात आईबीएम के कर्मचारियों से हुई जरूर पर ,वे उससे संतुष्ट नहीं थे )। ठीक इसी समय आईबीएम एक छोटी मोटी कंपनी जिसका नाम माइक्रोसॉफ्ट था के साथ बेसिक लैंग्वेज पर काम कर रही थी तभी इस कंपनी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर बिल गेट्स ने आईबीएम  के कर्मचारियों को यह बात कहते सुना कि उन्हें एक ऑपरेटिंग सिस्टम की  जरूरत है ।

बिल गेट्स यह मौका नहीं खोना चाहते थे पर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिल गेट्स के पास  आईबीएम को देने के लिए कोई ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं था फिर भी उन्होंने आईबीएम के अधिकारियों से मिलकर उन्हें  यह बताया कि माइक्रोसाफ्ट के पास ऑपरेटिंग सिस्टम है जो वे आईबीएम को सही कीमत पर दे सकते हैं ।  जब आईबीएम ने इस ऑपरेटिंग सिस्टम को देखने की मांग की तो बिल गेट्स ने कुछ समय मांगा और इस समय में उन्होंने इस ऑपरेटिंग सिस्टम की तलाश शुरू कर दी । जब बिल गेट्स को यह ऑपरेटिंग सिस्टम मिल गया तो  उन्होंने इसके लिए एक नया एम्पलाई  हायर किया जिसने इस ऑपरेटिंग सिस्टम को आईबीएम के लायक बना दिया।  आईबीएम ने जब इस ऑपरेटिंग सिस्टम को देखा तो वे काफी संतुष्ट नजर आए।

तब बिल गेट्स ने आईबीएम को  ऑपरेटिंग सिस्टम देने के लिए यह शर्त रखी  कि वह केवल $50000 में आईबीएम को इस ऑपरेटिंग सिस्टम का लाइसेंस देने को तैयार है, ध्यान रहे कि आईबीएम ऑपरेटिंग सिस्टम खरीदना चाहती थी  ना कि सिर्फ operating system का लाइसेंस, परंतु जैसे-तैसे बिल गेट्स ने ऑपरेटिंग सिस्टम के लाइसेंस के लिए आईबीएम को मना लिया ताकि   बिल गेट्स आईबीएम के अलावा अन्य कंपनियों को भी इस ऑपरेटिंग सिस्टम का लाइसेंस दे सके ताकि वे अपने कंप्यूटर में एमएस डॉस का उपयोग कर सकें । इसी  समझौते ने ही माइक्रोसॉफ्ट के बड़ी कंपनी बनने के  लिए दरवाजे खोलें ।

स्टीव जॉब्स  वर्सेस  Microsoft kind बिल गेट्स

एमएस डॉस ने माइक्रोसॉफ्ट को अच्छी शुरुआत तो दे दी थी पर इस कंपनी को असली बड़ी कंपनी बनाने के पीछे विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम था।  विंडोस  एक Graphical User interface  वाला ऑपरेटिंग सिस्टम था, अब  बिल गेट्स को इस तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने का विचार कहां से मिला, यही  माइक्रोसॉफ्ट और एप्पल या फिर कहें बिल गेट्स और  स्टीव जॉब्स के बीच लड़ाई का कारण था ।

 माइक्रोसॉफ्ट एक बड़ी कंपनी बनती है उससे पहले ही एप्पल बहुत बड़ी कंपनी बन चुकी थी।  एप्पल के लिए सॉफ्टवेयर बनाने वाली कई कंपनियां काम करती थी उन्हीं में से एक कंपनी थी माइक्रोसॉफ्ट।  एप्पल Graphical User interface   वाला एक नया ऑपरेटिंग सिस्टम बना रही थी  जिसे एप्पल ने मैकिनटोश नाम दिया था, इस ऑपरेटिंग सिस्टम के पहले दुनिया के सारे ऑपरेटिंग सिस्टम  काली स्क्रीन पर कमांड प्रॉन्प्ट पर काम करते थे । 

इसीलिए ग्राफिकल यूजर इंटरफ़ेस वाले ऑपरेटिंग सिस्टम का विचार क्रांतिकारी था। एप्पल इस तरह के कंप्यूटर बनाने की टेक्नोलॉजी हासिल कर चुका था और जब उसने नए ऑपरेटिंग सिस्टम पर बनने वाले कंप्यूटर का विचार रखा तो इसके लिए जिन सॉफ्टवेयर वेंडर्स को बुलाया गया उनमें से बिल गेट्स भी एक थे।  बिल गेट्स इस ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए ऑफिस की तरह का एक सॉफ्टवेयर बना रहे थे।  जब बिल गेट्स ने ग्राफिकल यूजर इंटरफेस के महत्व को समझा तो उन्होंने अपनी कंपनी में वापस आ कर एक नए  ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने का विचार रखा जिसे उन्होंने विंडोज नाम दिया, यह सिस्टम  कई विशेषज्ञों की नजर में  एप्पल के मैकिनटोश  ऑपरेटिंग सिस्टम की नकल था । स्टीव जॉब्स इसी बात को लेकर बिल गेट्स से नाराज हो गए  और उनकी लड़ाई कई वर्षों तक चलती रही ।

 बिल गेट्स एवं स्टीव जॉब्स की दुश्मनी, 90 के दशक के अंत में तक खत्म हुई जब स्टीव जॉब्स वापस से एप्पल के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर बने और माइक्रोसॉफ्ट ने एप्पल में लगभग 150 मिलियन डालर का निवेश किया । एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट के बीच की कहानी भी बड़ी अजीब है, जब  80 के दशक की शुरुआत में एप्पल अपने आप में बहुत बड़ी कंपनी थी तब माइक्रोसॉफ्ट एक बहुत छोटी कंपनी थी, ठीक उसी तरह 90 के दशक के अंत में माइक्रोसॉफ्ट एक बहुत बड़ी कंपनी थी जिसके मुकाबले एप्पल बहुत छोटी कंपनी थी। 

परंतु 2000 के बाद एप्पल ने तरक्की का वह दौर देखा जब वह माइक्रोसॉफ्ट से लगभग लगभग दोगुने आकार की हो गई थी।  परंतु पिछले कुछ वर्षों में सत्य नडेला के नेतृत्व में माइक्रोसॉफ्ट ने अपना खोया हुआ स्थान वापस से पाया है और अब वैल्यूएशन के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एप्पल नहीं बल्कि माइक्रोसॉफ्ट है ।

परोपकारी  या philanthropist बिल गेट्स

बिल गेट्स एवं उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स के  द्वारा शुरू किया गया   बिल एंड मेलिंडा फाउंडेशन गरीब देशों में लोगों की मदद के कई कार्य कर रही है । विशेषज्ञों का मानना है कि इस फाउंडेशन के माध्यम से बिल गेट्स लगभग 36 बिलियन डॉलर दान कर चुके हैं।  ऐसा माना जाता है कि यह फाउंडेशन प्रति वर्ष 4.6 बिलीयन डॉलर के परोपकारी काम करती है।  बिल गेट्स एवं मेलिंडा गेट्स के इस फाउंडेशन ने केवल मलेरिया के इलाज के लिए 2 बिलियन डॉलर की मदद का आश्वासन दिया है।

2014 में जब अफ्रीका में ईबोला की बीमारी बड़े पैमाने पर फैली थी तब इस फाउंडेशन ने 50 मिलियन डॉलर का दान दिया था इस बीमारी से लड़ने के लिए। इस फाउंडेशन ने  10 बिलियन डॉलर से ऊपर की रकम पोलियो से इलाज के लिए खर्च की है जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत में खर्च किया गया है शायद इसीलिए भारत से आज पोलियो पूरी तरह समाप्त हो चुका है । बिल गेट्स अमीर व्यक्तियों के उस ग्रुप का हिस्सा है जिन्होंने अपनी कम से कम 50% संपत्ति दान करने का आश्वासन दिया है इसमें उनके मित्र वारेन बफेट भी शामिल है ।

बिल गेट्स एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके विषय में कुछ लोगों के विचार अच्छे हैं तो कुछ लोगों के विचार बुरे हैं।  परंतु यह विचार उनकी जिंदगी के उस हिस्से के लिए ही है जहां पर वह बिजनेसमैन थे।  फिलैंथरोपिस्ट  बिल गेट्स के विषय में सभी एकमत हैं कि उन्होंने जो काम किया है वह सराहनीय है ।

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