पृथ्वी का जन्म या पृथ्वी का निर्माण कैसे हुआ ?

पृथ्वी सौरमंडल का एकमात्र ग्रह है जिस पर वायुमंडल और जल दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। पृथ्वी की इन्ही खूबियों के चलते इस ग्रह पर अलग-अलग किस्म के जीवों का जन्म हुआ है। ऐसे में पृथ्वी का जन्म और उसकी उत्पत्ति तथा पृथ्वी की संरचना के विषय में प्राचीन काल से ही मनुष्यों ने कई तरह के अनुमान लगाए हैं।

आधुनिक काल में वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक प्रयोगों (Radio Carbon Dating) से यह सिद्ध कर दिया है कि पृथ्वी की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष है। यह अनुमान ऑस्ट्रेलिया में प्राप्त हुई अब तक की सबसे प्राचीन एक जिरकोन की चट्टान (ancient zircon rock found in Australia) के रेडियो कार्बन डेटिंग के द्वारा निर्धारित किया गया है।

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पृथ्वी का जन्म कैसे हुआ? यह एक ऐसी पहेली है जिसका पूरी तरह से और सही-सही उत्तर नहीं दिया जा सका है। पृथ्वी का निर्माण 4.6 अरब वर्ष पहले हुआ है किन्तु आपको यह जानकार हैरानी होगी कि पृथ्वी के जन्म और उसकी उत्पत्ति संबन्धित कई सिद्धान्त, परिकल्पनाएँ और तर्क दिये गए हैं। हालांकि कुछ सिद्धान्त समय के साथ गलत साबित हो गए तो कुछ अभी भी स्वीकार्य हैं।

पृथ्वी का जन्म सौरमंडल के जन्म के बाद हुआ है

पृथ्वी सौर मण्डल का एक हिस्सा है इसलिए पृथ्वी का निर्माण कैसे हुआ, इस विषय में जानने के लिए हमें यह अवश्य जानना होगा कि हमारे सौरमंडल का निर्माण कैसे हुआ है। वस्तुतः सौरमंडल का निर्माण पृथ्वी के जन्म से बहुत पहले हुआ है। इसी कारण से सौरमंडल के जन्म को जाने बिना पृथ्वी के जन्म के बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।

Theories of the Origins of the Earth

पृथ्वी और अन्य ग्रहों के निर्माण के संबंध में जो आधुनिक परिकल्पनाएँ ( Theories) दी गईं हैं उनमें कोर अक्रिसन ( Core Accretion Model), डिस्क इंस्टबिलिटी (Disc Instability Model) इत्यादि प्रमुख है। पहला और सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत सिद्धांत, मूल अभिवृद्धि या कोर अक्रिसन, पृथ्वी जैसे स्थलीय ग्रहों के निर्माण को अच्छी तरह से समझाता है लेकिन बृहस्पति और अन्य विशाल ग्रहों के निर्माण के बारे में यह समाधान प्रस्तुत नहीं कर पता है। । दूसरा सिद्धान्त जिसे डिस्क अस्थिरता या डिस्क इंस्टबिलिटीका सिद्धान्त कहा जाता है, इन विशाल ग्रहों के निर्माण के लिए सही कल्पना प्रस्तुत करता है।

पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में सौर नेबुला परिकल्पना (The Solar Nebula Hypothesis) के अनुसार लगभग 4.6 अरब (4.6 Billion Years Ago) साल पहले हमारे सौर मंडल में पृथ्वी का निर्माण गैस और धूल के एक बादल से हुआ था। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी, सूर्य और और सौर मण्डल के निर्माण से पहले केवल धूल और गैस के बादल थे जो घूमते रहते थे। इस परिकल्पना के अनुसार प्रारम्भिक ब्रह्मांड में ऊर्जा और पदार्थ का वितरण एक समान नहीं था। 

इस कारण अलग-अलग क्षेत्रों में पदार्थ के घनत्व में भिन्नता ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति या बल में भिन्नता को जन्म दिया होगा। इसी गुरुत्वाकर्षण बल की भिन्नता ने पदार्थ को संकेंद्रित और संकुचित करना आरंभ किया होगा। इन क्रियाओं के कारण पदार्थ अलग-अलग जगहों पर एकत्रित होना शुरू हुआ होगा।

इन्ही एकत्रित हुए पदार्थों में गुरुत्वाकर्षण के बल के कारण आकाशगंगाओं ( Galaxies) का निर्माण होना शुरू हुआ होगा। आकाशगंगाओं का निर्माण मुख्यतः हाइड्रोजन गैस (Hydrogen Gas) के विशाल बादलों से हुई है जो संचयित हो कर या गुरुत्वाकर्षण के बल के कारण द्रवीभूत होकर इन आकाशगंगाओं को जन्म देते हैं। हाइड्रोजन के इन विशाल बादलों को जिनसे आकाशगंगा का निर्माण हुआ है निहारिका (Nebula) कहा जाता है। हाइड्रोजन गैस के अलावा इन बादलों में निम्न मात्रा में हीलियम (Helium) गैस भी मौजूद थी।

इन विशाल हाइड्रोजन गैस से बनी निहारिकाओं में गुरुत्वाकर्षण की भिन्नता के कारण गैस के अलग-अलग झुंड विकसित हुए। ये गैस के झुंड समय के साथ गुरुत्वाकर्षण बल की अधिकता के कारण विभिन्न तारों में परिवर्तित होना शुरू हुए। अन्तरिक्ष में मौजूद प्राचीन गैसों का अध्ययन करने से पता चलता है कि इन तारों का निर्माण लगभग 5 से 5.6 अरब वर्ष पहले हुआ है। 

पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास-विभिन्न चरण Formation of the Earth-Different Stages

पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास निहारिकाओं के अंदर बने गैस के सूर्य (तारा) में हुआ है। पृथ्वी की तरह ही अन्य ग्रहों  का जन्म भी सूर्य के चारों तरफ फैले धूल और गैस के द्वारा हुआ है। पृथ्वी के जन्म में निम्नलिखित अवस्थाओं का वर्णन किया जा सकता है-

  • निहारिकाओं ( Galaxies) के अंदर सर्वप्रथम तारों का निर्माण हुआ जिनके केंद्र में अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के चलते एक घनीभूत क्रोड का निर्माण हुआ। सूर्य इसी प्रकार का एक तारा है जो मिल्की वे ( Milky Way) नाम की आकाश गंगा में स्थित है। इसके बाद सूर्य के केंद्र के चारों ओर गैस और धूलकणों की घूमती हुई तश्तरी ( Rotating Disc) का निर्माण हुआ। पदार्थ का सर्वाधिक संकेन्द्रण केंद्र में था जो सूर्य बना।
  • पृथ्वी के जन्म के अगले चरण में सूर्य के चारों ओर बने गैसीय बादल का संघनन शुरू हुआ और गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा पदार्थों के छोटे-छोटे गोलों का निर्माण हुआ। पदार्थों के ये छोटे-छोटे गोले परस्परिक आकर्षण के बल के द्वारा खगोलीय पिंडों में बादल गए जिन्हे ग्रहाणु (Planetesimals) कहा जाता है। गैसीय बादल या डिस्क में छोटे छोटे थक्कों में एकत्र किया हुआ पदार्थ बाद में प्रोटो-ग्रहों या ग्रहाणु के रूप में परिवर्तित हो गए। इन प्रोटो-ग्रहों का निर्माण द्रव्यमान के केंद्र की ओर गिरने वाले पदार्थ के अभिवृद्धि द्वारा हुआ है।
  • पृथ्वी के निर्माण की अंतिम अवस्था में इन छोटे-छोटे ग्रहाणुओं या प्रोटो ग्रहों के आपस में सहवर्धित या संघटित होने के परिणामस्वरूप बड़े पिंड ग्रहों का निर्माण हुआ जिनमें पृथ्वी भी एक है।

पृथ्वी के निर्माण में सौर वायु (Solar Wind) का योगदान

जैसे-जैसे सूर्य के केंद्र में पदार्थ (हाइड्रोजन गैस) संकेंद्रित होती गयी, वैसे-वैसे सूर्य का तापमान और द्रव्यमान बढ़ता गया। सूर्य के केंद्र में दबाव और तापमान इतना बढ़ गया कि दो हाइड्रोजन नाभिक मिलकर हीलियम बनाने लगे। दूसरे शब्दों में हाइड्रोजन गैस नाभिकीय क्रिया ( Nuclear Reaction) द्वारा हीलियम गैस में परिवर्तित होने लगी। इस नाभिकीय क्रिया या न्यूक्लियर रिएक्शन से अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न हुई और सूर्य एक आग के गोले की भांति चमकने लगा। अगले चरण में सूर्य से निकलने वाली अत्यधिक तीव्र सौर वायु ( Solar Wind) ने भीतरी ग्रहों या आंतरिक सौर मंडल में ग्रहों के निर्माण के बाद शेष बचे धूल और पदार्थ को उड़ा दिया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सौर वायु सूर्य के पास के ग्रहों पर ज्यादा प्रभावशाली या तीव्र थी।

तीव्र सौर वायु द्वारा शेष गैस और धूल कणों को हटाने के बाद भीतरी ग्रहों (Inner Planets) में केवल ठोस पिंड ही बचे। इन भीतरी ग्रहों में बुध ग्रह, शुक्र ग्रह, पृथ्वी और मंगल ग्रह शामिल हैं। पृथ्वी की तरह ही ठोस शैल और धातुओं से निर्मित होने के कारण इन चार भीतरी ग्रहों को पार्थिव (Terrestrial) ग्रह भी कहा जाता है। इनके बाद अन्य चार ग्रह बाहरी ग्रह (Outer Planets) कहलाते हैं।

ये गैस से बने विशाल ग्रह हैं जिन्हे जोवियन (Jovian Planets) कहा जाता है। सौर वायु या पवन जोवियन ग्रहों पर उतनी शक्तिशाली नहीं थी जिसके कारण इन ग्रहों से विशाल गैसों को हटा नहीं पाई। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि सौर मण्डल के सभी ग्रहों का निर्माण लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले एक समय में ही हुआ है।

पृथ्वी में अलग-अलग परतों का निर्माण

  1. पृथ्वी की संरचना एक बराबर ना होकर बल्कि परतदार है।
  2. पृथ्वी के जन्म के आरंभ के वर्षों में यह गरम थी और चट्टानों से बनी थी।
  3. इसके वायुमंडल में केवल हाइड्रोजन और कुछ मात्रा में हीलियम गैस मौजूद थी। पृथ्वी का वायुमंडल आज की तरह घना नहीं था। यह अत्यधिक विरल था।
  4. पृथ्वी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में अत्यधिक ताप के चलते आंशिक रूप से द्रव्य अवस्था में स्थित रही जिसके कारण भारी पदार्थ जैसे कि लोहा पृथ्वी के केंद्र में चले गए और हल्के पदार्थ इसकी सतह में ऊपर की ओर आ गए।
  5. पृथ्वी के निर्माण में भारी और हल्के घनत्व वाले पदार्थों के अलग-अलग होने या पृथक होने की इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक लोग विभेदन (Differentiation) की प्रक्रिया कहते हैं।

पृथ्वी में सदैव निर्माण और विनाश की प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं। धरती के भीतर होने वाली इन प्रक्रियाओं के कारण और पृथ्वी के वायुमंडल में घटने वाली घटनाओं के कारण ही वर्तमान रूप में यह ग्रह हमारे सामने है। पृथ्वी के जन्म और निर्माण की कहानी अत्यंत रोचक है किन्तु इसका सही-सही अनुमान लगाना एक अत्यंत जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया है। सौभाग्य से हमारे पास प्रचुर मात्रा में साक्ष्य और उदाहरण मौजूद हैं जो इसके विकास संबंधी अवधारणाओं को समझने में सहायता प्रदान करते हैं। 

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