स्वामी विवेकानंद के गुरु कौन थे उनका नाम क्या था।

स्वामी विवेकानंद के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस थे। श्री रामकृष्ण परमहंस कोलकाता के दक्षिणेश्वर में स्थित काली मंदिर के पुजारी थे। स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व जितना अद्भुत और क्रांतिकारी था उससे भी अधिक विलक्षण उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस थे। वे एक संत, भक्त, ब्रह्म ज्ञानी, सन्यासी, तपस्वी, सभी धर्मों को जानने वाले, सभी संप्रदायों के हितैषी, सरल, आध्यात्मिक ज्ञान बांटने के लिए तत्पर और माँ काली के अनन्य उपासक थे। स्वामी विवेकानंद की श्री रामकृष्ण परमहंस से पहली मुलाक़ात सन 1881 के अंतिम दिनों में हुई थी।

श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म बंगाल के कामारपुकुर नामक गाँव में 18 फ़रवरी 1836 के दिन एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही आध्यात्मिक अनुभव करने लगे थे और उन्हे इस बात का पूरा यकीन हो गया था कि उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है। श्री रामकृष्ण परमहंस  को संसारी शिक्षा और लोक व्यवहार के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे तो केवल ईश्वर के ध्यान और प्रेम में मग्न रहने वालों में से थे। उनका स्वभाव एकदम बालकों जैसा था। इनके बचपन का नाम गदाधर था और इनके बड़े भाई रामकुमार थे।

swami vivekanad ke guru ka naam

अपने पिता की मृत्यु के बाद गदाधर अपने बड़े भाई रामकुमार के साथ कोलकाता आ गए। यहाँ कोलकाता के दक्षिणेश्वर में गंगा नदी के किनारे रानी रासमणि के बनवाए हुए माँ काली के मंदिर में रामकुमार को प्रधान पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था। इस दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में श्री रामकृष्ण भी रहते थे और माँ काली की पूजा-आराधना किया करते थे। इसी मंदिर के परिसर में उन्हे ना केवल माँ काली के दर्शन हुए थे बल्कि उन्होने वेदान्त के अंतिम लक्ष्य निर्विकल्प समाधि का भी अनुभव किया था। हालांकि श्री रामकृष्ण परमहंस ऐसे विलक्षण व्यक्ति थे कि वे जब चाहते समाधि की अवस्था में चले जाते थे। उन्होने सभी धर्मों और संप्रदायों के अनुसार साधना की थी और यह अनुभव किया था कि सबका लक्ष्य एक ही है।

दक्षिणेश्वर के इसी काली मंदिर में स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के चरणों में बैठकर ईश्वर संबंधी ज्ञान पाया था और भारत समेत पूरे विश्व में वेदान्त और ईश्वरीय ज्ञान का प्रचार-प्रसार कने का जिम्मा उठाया था। अपने गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए स्वामी विवेकानंद ने धर्म को जीवन का अंग बना कर जीवन जीने की प्रेरणा दी थी। उनका मानना था कि जीव सेवा ही ईश्वर सेवा है क्योंकि ईश्वर का जीवों में सबसे अधिक प्राकट्य होता है और ईश्वर सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं।

स्वामी विवेकानंद अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के साथ लगभग पाच वर्षों 1882 से लेकर 1886 तक रह सके। 16 अगस्त 1886 को विवेकानंद के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपना शरीर त्याग दिया था। किन्तु शरीर त्यागने के बाद भी श्री रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद के साथ हमेशा मौजूद थे। इस बात को खुद स्वामी विवेकानंद ने स्वीकार किया है। शास्त्रों के अनुसार जो योगी निर्विकल्प समाधि की अवस्था तक पहुँच जाते हैं वे जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्यों ने उन्हे ईश्वर के अवतार के रूप में मान्यता दी है। स्वामी विवेकानंद द्वारा शुरू किए गए श्रीरामकृष्ण मिशन के मठों और मंदिरों में श्री रामकृष्ण परमहंस की प्रतिदिन पूजा की जाती है।

स्वामी विवेकानंद ने श्री रामकृष्ण परमहंस के बारे में एक बार कहा था कि यदि वे चाहें तो अपनी दृष्टि मात्र से एक क्षण में ही हजारों विवेकानंद पैदा कर सकते हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस का हृदय एक पवित्र भक्त का हृदय था और उनका मन विलक्षण प्रतिभा युक्त तीक्ष्ण बुद्धि वाला ब्रह्म ज्ञानी का मस्तिष्क था। श्री रामकृष्ण परमहंस का विवाह श्रीमती शारदा देवी से हुआ था किन्तु वे विवाह के बाद भी जीवन पर्यंत सन्यासी और ब्रह्मचारी बने रहे।

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