उत्तर भारत के उप हिमालय के क्षेत्र के सहारे फैले मैदान का क्या नाम है ?

उत्तर भारत के उप हिमालय क्षेत्र के सहारे फैले मैदान को भाबर कहते हैं। भाबर हिमालय और शिवलीकी पहाड़ियों के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र उत्तराखंड के पूर्व में चम्पावत से लेकर पश्चिम तक एक पट्टी के रूप में फैला हुआ है। यह देश के उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में आता है। यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित है। भाबर की चौड़ाई लगभग 8 से 10 किलोमीटर है।

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भाबर को अच्छी तरह समझने के लिए पहले उत्तर भारत के मैदान को समझना होगा तो आइए पहले जानते हैं उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र के बारे में।

उत्तर भारत के उप हिमालय का संक्षिप्त परिचय

शिवलीकी क्षेत्र के दक्षिणी भाग से पर्वतीय क्षेत्र खत्म हो जाता है और यहां से मैदानी क्षेत्र शुरू हो जाता है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र का निर्माण गंगा, सिंधु ब्रह्मपुत्र और सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाए जलोढ़ निक्षेप (मिट्टी के कण इत्यादि) से हुआ है। यह मैदान पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी से लेकर पश्चिम के सतलज नदी तक फैला हुआ है। इस मैदान की पश्चिम से पूर्व तक की लंबाई लगभग 32000 किलोमीटर है। इसकी औसतन चौड़ाई 150 से 300 किलोमीटर के बीच है। इसकी कुल गहराई 1000 मीटर से 2000 मीटर तक है। उत्तरी मैदान कृषि के लिए बहुत उपजाऊ माना जाता है। यहां लगभग हर प्रकार की फसल उगायी जाती है। गेंहू धान, मक्का, और गन्ना यहां की मुख्य फसलें हैं।

उत्तर से दक्षिण दिशा तक इस पूरे मैदानीय क्षेत्र को उसकी मिट्टी की अलग अलग विशेषताओं के अनुसार तीन भागों में बांटते है जो इस प्रकार है।

  1. भाबर
  2. तराई
  3. जलोढ़ या मैदानी क्षेत्र

जलोढ़ या मैदानी क्षेत्र को पुनः दो भागों में बांटा गया है

  • खादर
  • बांगर

भाबर क्षेत्र के बारे में संक्षिप्त परिचय

भाबर शिवलीकी और हिमालय पहाड़ी के दक्षिण में बसा एक क्षेत्र है। भाबर की कुल चौड़ाई 8 से 16 किलोमीटर तक है। जो भारत के राज्य उत्तराखंड में पश्चिम से पूर्वी दिशा में फैला हुआ है। इस मैदान पर छोटे बड़े कंकर पत्थर इत्यादि बिछे हुए है। इसलिए इसकी छिद्रलिता ( Porosity) के कारण कोई भी नदी जब इससे लगती है तो ऐसा लगता है कि वो विलुप्त हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस मैदान पर पत्थर बिछे होते है अतः पत्थर के बीच में या नीचे इतनी जगह होती है कि नदी का पानी पास हो जाता है। इसलिए ऐसा लगता है कि इस क्षेत्र में नदियां विलुप्त हो जाती है। भाबर मैदान कृषि के योग्य नहीं होता है। क्योंकि इसकी सतह पर कंकर और पत्थर बिछे रहते हैं। यहां सिर्फ कुछ क्षेत्र में जंगली पौधे और प्राकृतिक वनस्पतियों के पौधें उगते है। वर्षा के मौसम में यह क्षेत्र Dry River की तरह लगती है। यहां पर बता दें कि Dry river एक प्रकार की नदी होती है जहां किसी मैदान या अन्य जगहों पर सैकड़ों की संख्या में waterholes होते हैं। इन waterholes द्वारा लगातार पानी का प्रवाह होता रहता है। इसे ही Dry River बोलते है। ये मुख्य रूप से northern Territory of Australia में ज़्यादा पाई जाती है।

  • कैसे होता है भाबर का निर्माण ?

भाबर का निर्माण नदियों के छोटे बड़े कंकर और पत्थरों से होता है। जब नदियां पर्वतीय भाग से नीचे उतरती है तो अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण बल लगने के कारण ये अपने साथ भारी कंकर पत्थर इत्यादि को लेकर आ जाती है लेकिन जैसी जैसे ये नदियां नीचे आती है तो गुरुत्वाकर्षण भी कम होने लगता है जिसके कारण ये नदियां अपने साथ लाए कंकर पत्थर इत्यादि को नदी के किनारे ही छोड़ देती है जिससे भाबर का निर्माण होता है।

  • तराई क्षेत्र के बारे में संक्षिप्त परिचय

तराई क्षेत्र भाबर के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है। इसकी चौड़ाई 10 से 20 किलोमीटर तक है। यह क्षेत्र उत्तराखंड के उत्तरी हरिद्वार दक्षिणी पौरीगढ़वाल दक्षिणी नैनिताल,  और उधमनगर के जिलों में फैला हुआ है। इसका निर्माण मिट्टी के हल्के कणो और रेत से होता है। ये वो कण या मिट्टी होते हैं जिसे नदियां हल्के होने के कारण भाबर क्षेत्र में नहीं बिछा पाती है। नदियां इन कणों को तराई क्षेत्र में बिछाती हुई चलती रहती है। नदियों की ये निक्षेपन प्रक्रिया डेल्टा बनाने तक या समुद्र में गिरने तक यूं ही चलती रहती है। जिससे तराई क्षेत्र का  निर्माण होता है। तराई क्षेत्र कृषि के लिए उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है खासकर ऐसी फसलों की उपज़ इस क्षेत्र में ज़्यादा होती है जिसे पानी की ज़्यादा आवश्यकता होती है। जैसे धान, मक्का, गन्ना इत्यादि।

तराई क्षेत्र की एक और खूबी ये है कि जो नदियाँ भाबर क्षेत्र में विलुप्त हो जाती है वो तराई क्षेत्र में पुनः दिखाई देने लगती है। ऐसा इसलिए होता है के भाबर क्षेत्र में पत्थरों के होने के कारण इनके बीच या इनके नीचे इतनी जगह होती है जहां से नदियाँ बह सकती है। लेकिन तराई क्षेत्र में मिट्टी होने के कारण पानी सिर्फ इसकी सतह से ही गुज़र सकती है। यही कारण है की भाबर क्षेत्र में नहीं दिखने वाली नदियाँ तराई क्षेत्र में पुनः दिखने लगती है।

जलोढ़ क्षेत्र या मैदानी क्षेत्र के बारे में संक्षिप्त परिचय

जलोढ़ को मैदानी क्षेत्र भी कहते है। यह उत्तर भारत के पश्चिम में पंजाब से लेकर सम्पूर्ण उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र को लेते हुए गंगा नदी के डेल्टा क्षेत्र तक फैली हुई है। इसका निर्माण तब होता है जब नदियां अपने साथ लायी  मिट्टी के कण किसी समतल क्षेत्र में छोड़ देती है तो जलोढ़ मैदान का निर्माण होता है। जलोढ़ मैदान के मिट्टी को कांप मिट्टी भी बोलते हैं। जो कृषि के लिए बहुत उपजाऊ होता है।

भारत के कुछ प्रमुख जलोढ़ मैदान

  • गंगा नदी के मैदान
  • सिंधु नदी के मैदान
  • ब्रह्मपुत्र नदी के मैदान, इत्यादि।

मिट्टी के विशेषताओं पर जलोढ़ मैदान को पुनः दो भागों में विभाजित करते है। बांगर और खादर।

  • खादर

खादर उसे कहते हैं जो नई कांप मिट्टी या जलोढ़ मिट्टी से बना होता है। ऐसे क्षेत्र जहां बाढ़ का पानी नियमित अंतराल पर अपने साथ लाए मिट्टी को निक्षेपित कर जलोढ़ मिट्टी पर नई परत बना देता है उसे ही खादर कहते हैं। यह मुख्य रूप से नदी तट, डेल्टा,  और बाढ़ स्तर तक स्थित जगहों पर होता है। ऐसी मिट्टी का रंग हल्का होता है और ये कृषि के लिए आदर्श मिट्टी माना जाता है।

  • बांगर

पुराने मिट्टी से बने क्षेत्र को बांगर कहते है। उत्तर भारत के सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र का ज़्यादातर हिस्सा बांगर ही है। ये क्षेत्र बाढ़ के स्तर से ऊपर के क्षेत्र होते हैं। ऐसे क्षेत्र में बाढ़ का पानी आने की संभावना बहुत ही कम रहती है। ये मिट्टी खादर मिट्टी के अपेक्षाकृत कम उपजाऊ होते हैं। ये एक कैल्सियम युक्त मिट्टी है। और इसमें चुना पत्थर भी मिले रहते हैं।

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